ब्रह्मपुत्र के पानी पर भारत का दबाव चीन से मांगा पूरा डेटा

Update: 2026-08-08 15:51 GMT
चीन : भारत और चीन के बीच सीमा विवाद से जुड़े मुद्दों के साथ अब ब्रह्मपुत्र नदी के पानी और हाइड्रोलॉजिकल डेटा को लेकर भी बातचीत तेज हो गई है। शुक्रवार को नई दिल्ली में हुई भारत-चीन कार्य तंत्र की 36वीं बैठक में भारत ने चीन से ब्रह्मपुत्र नदी के जल प्रवाह से जुड़ा डेटा फिर से साझा करने की मांग की। भारत ने इस दौरान सीमा-पार बहने वाली नदियों से जुड़े मुद्दों को गंभीरता से उठाते हुए विशेषज्ञ स्तर के तंत्र की अगली बैठक जल्द बुलाने पर भी जोर दिया।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत और चीन के अधिकारियों के बीच हुई इस बैठक में सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने को लेकर भी चर्चा हुई। दोनों पक्ष मौजूदा राजनयिक और सैन्य माध्यमों के जरिए संवाद जारी रखने पर सहमत हुए। साथ ही दोनों देशों ने सीमा पर किसी भी तरह की गलतफहमी और गलत आकलन से बचने की जरूरत पर भी सहमति जताई। हालांकि, बैठक में ब्रह्मपुत्र नदी से जुड़े मुद्दे को विशेष महत्व मिला, क्योंकि चीन की ओर से नदी के जल प्रवाह का डेटा साझा किए जाने को लेकर भारत लंबे समय से चिंता जाहिर करता रहा है।
भारत की चिंता ऐसे समय में और बढ़ गई है, जब चीन की ओर से तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर एक बड़े बांध परियोजना के निर्माण की खबरें सामने आई हैं। यही नदी आगे चलकर भारत में ब्रह्मपुत्र के रूप में प्रवेश करती है। अरुणाचल प्रदेश से भारत में आने के बाद ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश तक जाती है और फिर समुद्र में मिलती है। इस नदी पर भारत और बांग्लादेश के लाखों लोगों की कृषि, पेयजल और अन्य जरूरतें निर्भर हैं।
बताया गया है कि चीन तिब्बत में ब्रह्मपुत्र की ऊपरी धारा पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक तैयार कर रहा है। रिपोर्ट्स में इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 1.2 ट्रिलियन युआन यानी लगभग 178 अरब डॉलर बताई गई है। प्रस्तावित परियोजना को लेकर भारत की मुख्य चिंता यह है कि बड़े पैमाने पर नदी के पानी को नियंत्रित किए जाने से डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों पर इसका असर पड़ सकता है। भारत यह भी चाहता है कि चीन नदी के पानी से जुड़ी परियोजनाओं और उनके संभावित प्रभावों के बारे में पारदर्शिता बनाए रखे।
ब्रह्मपुत्र नदी के पानी से संबंधित हाइड्रोलॉजिकल डेटा को लेकर भी दोनों देशों के बीच लंबे समय से व्यवस्था रही है। भारत सरकार के अनुसार, चीन ने जून 2023 के बाद से इस नदी से संबंधित हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा नहीं किया है। ऐसे में भारत ने शुक्रवार की बैठक में चीन से इस डेटा को दोबारा साझा करने पर जोर दिया। नदी के जल प्रवाह की जानकारी बाढ़ की स्थिति की निगरानी, जल प्रबंधन और आपदा से निपटने की तैयारियों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
बैठक में भारत ने सीमा-पार नदियों से संबंधित विशेषज्ञ स्तरीय तंत्र की अगली बैठक जल्द आयोजित करने की जरूरत भी दोहराई। यह तंत्र वर्ष 2006 में बनाया गया था। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच सीमा-पार बहने वाली नदियों से संबंधित मुद्दों पर बातचीत और तकनीकी स्तर पर जानकारी साझा करने का रास्ता तैयार करना है।
भारत और चीन के बीच नदी का मुद्दा दोनों देशों के व्यापक संबंधों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच करीब 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव काफी बढ़ गया था। इसके बाद सैन्य और राजनयिक स्तर पर लगातार बातचीत के जरिए स्थिति को सामान्य करने की कोशिश की जाती रही है।
अब दोनों देशों के बीच संवाद धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। ऐसे में ब्रह्मपुत्र नदी के पानी और चीन की जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर भारत की चिंताएं भी बातचीत के एजेंडे में प्रमुखता से शामिल हो रही हैं। भारत का जोर इस बात पर है कि नदी के जल प्रवाह से जुड़ी जानकारी नियमित रूप से उपलब्ध कराई जाए और चीन की ओर से बनाई जा रही परियोजनाओं के संभावित प्रभावों को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता बरती जाए।
ब्रह्मपुत्र केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर और बांग्लादेश के बड़े हिस्से के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। इसलिए इसके जल प्रवाह में किसी बड़े बदलाव का असर कृषि, पर्यावरण, बाढ़ प्रबंधन और लाखों लोगों की आजीविका पर पड़ सकता है। यही वजह है कि भारत इस मुद्दे को केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि इसे जल सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों से जोड़कर देख रहा है। आने वाले समय में भारत और चीन के बीच विशेषज्ञ स्तर की बातचीत में ब्रह्मपुत्र के पानी, हाइड्रोलॉजिकल डेटा और चीन की प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं पर चर्चा महत्वपूर्ण रहने की संभावना है।
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