Pradosh Vrat: पहली बार करने जा रहे हैं प्रदोष व्रत, जानिए पूजा विधि से उद्यापन तक के नियम

Update: 2025-06-06 06:05 GMT
Pradosh Vrat: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को अत्यंत पावन और फलदायी माना गया है। यह व्रत हर मास की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है, इसलिए इसे त्रयोदशी व्रत भी कहा जाता है। मान्यता है कि यह व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे प्रभावी उपाय है। कहा जाता है कि इस उपवास को करने से मनुष्य की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और शिवजी के साथ-साथ माता पार्वती की कृपा भी प्राप्त होती है। यदि आप पहली बार प्रदोष व्रत रखने जा रहे हैं, तो आइए जानते हैं इसकी सही विधि।
प्रदोष व्रत की शुरुआत कैसे करें:
व्रत के दिन प्रातः काल जल्दी उठें और स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को साफ करके भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करें। शिवलिंग पर जल, बेलपत्र, फूल और फल अर्पित करें। इसके बाद प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें और शिव चालीसा का पाठ करें। यदि संभव हो तो किसी मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल और बेलपत्र चढ़ाएं।
संध्या समय विधिपूर्वक भगवान शिव की पूजा करें, आरती करें और भोग लगाएं। प्रदोष काल में रुद्राभिषेक करना अति फलदायी माना जाता है। इसका बाद कथा और आरती के साथ व्रत को पूर्ण करें। व्रती को दिनभर उपवास रखना चाहिए और संध्या पूजा के बाद अथवा अगले दिन व्रत खोलना चाहिए।
प्रदोष व्रत के दिन आप फलाहार स्वरूप कुछ चीजें खा सकते हैं, जैसे साबूदाने की खीर, कुट्टू के आटे के पकौड़े, उबले आलू, ताजे फल, दूध, दही, सिंघाड़े का हलवा, समा के चावल, नारियल पानी, केले के चिप्स, और फलों की चाट आदि।
प्रदोष व्रत कब से शुरू करें:
प्रदोष व्रत किसी भी माह के शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से आरंभ किया जा सकता है, लेकिन सावन और कार्तिक माह में इसका आरंभ विशेष फलदायी माना गया है।
कितने प्रदोष व्रत रखें:
मान्यताओं के अनुसार व्यक्ति को कम से कम 11 या अधिकतम 26 त्रयोदशी व्रत करने चाहिए। इसके बाद उद्यापन अवश्य करना चाहिए, जिससे भगवान शिव की कृपा स्थायी बनी रहती है।
उद्यापन से एक दिन पहले भगवान गणेश की पूजा करें और रात्रि जागरण करें। प्रातःकाल स्नान कर पूजा के लिए मंडप सजाएं।शिव-पार्वती की मूर्ति स्थापित कर विधिपूर्वक पूजन करें। हवन और कीर्तन करें। हवन में खीर की आहुति दें। ब्राह्मणों को भोजन करवाएं, उन्हें वस्त्र और दक्षिणा देकर आशीर्वाद लें। इसके बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत का समापन करें।
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