Kaal Bhairav Jayanti puja: घर की सुरक्षा और आर्थिक वृद्धि के लिए इस विधि से करें काल भैरव जयंती की पूजा
Kaal Bhairav Jayanti puja: 12 नवम्बर 2025 को काल भैरव जयंती मनाई जा रही है। इस दिन घर पर की गई साधना, आरती और मंत्र जप अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती हैं। यहां बताई जा रही पूजा विधि पूरी तरह घर पर की जाने योग्य, सरल और शास्त्र सम्मत है। इसे बिना किसी जटिल तांत्रिक प्रक्रिया के किया जा सकता है। काल भैरव जयंती साधना से भय, कर्ज और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। शत्रु, दुष्ट प्रवृत्ति व ग्रहदोषों का नाश होता है। घर में स्थिरता, सुरक्षा और आर्थिक वृद्धि होती है।
काल भैरव जयंती साधना विधि:
सर्वश्रेष्ठ समय तिथि: 12 नवम्बर 2025 (बुधवार)
समय: रात्रि काल या प्रदोष काल (संध्या के बाद 8:00 पी.एम से 11:00 पी.एम के बीच)
काल भैरव जयंती पूजा दिशा: उत्तर या पश्चिम की ओर मुख करके पूजा करें।
काल भैरव जयंती पूजा सामग्री:
आसन के रूप में काला वस्त्र
भगवान काल भैरव की तस्वीर या प्रतिमा
काला तिल, उड़द दाल, सरसों तेल का दीपक
इमरती, दही-बड़ा, या तिल लड्डू का भोग
नींबू, काले फूल
धूप, अगरबत्ती, कपूर
जल, चावल, रोली, सिंदूर, पंचमेवा
काल भैरव जयंती पूजन विधि:
स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थल पर काला कपड़ा बिछाएं और भगवान काल भैरव की तस्वीर/प्रतिमा स्थापित करें।
दीपक में सरसों या तिल का तेल डालें और चार बत्ती जलाएं।
अब ॐ कालभैरवाय नमः कहते हुए जल, चावल, फूल, धूप, दीप अर्पित करें।
भगवान को इमरती, उड़द की खिचड़ी या तिल लड्डू का भोग लगाएं।
अंत में आरती करें और मंत्र जप प्रारंभ करें।
काल भैरव तंत्रोक्त बीज मंत्र साधना :
॥ ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः कालभैरवाय नमः ॥
जप संख्या: 108 बार (एक माला):
संकल्प: “हे काल भैरव, मैं अपने जीवन के समस्त भय, ऋण, और बाधाओं से मुक्ति के लिए यह जप कर रहा/रही हूं।”
जप करते समय ध्यान रखें कि मन एकाग्र रहे, और दीपक बुझने न पाए।
काल भैरव आरती:
जय काल भैरव देवा, जय काल भैरव देवा ।
संकट हरो सब जन के, भवसागर के मेवा ॥
दिगंबर रूप तुम्हारा, भाल विराजे त्रिपुरा चंदा ।
काली घटा-सा अंबर तन, सर्पमाला सुंदर बंधा ॥
खप्पर और त्रिशूल धरे हो, काशी के तुम रक्षक भोले ।
भूत, प्रेत सब दूर भगाओ, भक्तों के संकट टाले ॥
जय काल भैरव देवा, संकट हरो सब जन के ॥
काल भैरव जयंती साधना के बाद करें ये काम:
भोग भगवान को अर्पित करने के बाद थोड़ा सा प्रसाद स्वयं ग्रहण करें और परिवार को दें।
दीपक को स्वयं न बुझाएं, उसे स्वयं शांत होने दें।
यदि संभव हो, रात्रि में कालभैरवाष्टकम् पाठ करें, इससे अत्यंत शुभ फल प्राप्त होता है।