Indira Ekadashi Katha: इंदिरा एकादशी का पावन पर्व इस साल 17 सितंबर 2025 को मनाया जा रहा है। इस एकादशी पर भगवान शालिग्राम की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं अनुसार जो कोई इंदिरा एकादशी का व्रत रखता है उसके सात पीढ़ियों तक के पितरों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। बता दें एकादशी व्रत सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक रखा जाता है। यहां हम आपको बताएंगे इंदिरा एकादशी की पावन कथा।
इंदिरा एकादशी व्रत कथा:
इंदिरा एकादशी की व्रत कथा अनुसार महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा रहता था जो अपनी प्रजा से बेहद प्यार करता था। वह राजा भगवान विष्णु का परम भक्त था। एक दिन राजा जब अपनी सभा में बैठे थे, तो महर्षि नारद उनके पास पाए। राजा ने उन्हें देखते ही हाथ जोड़ लिया और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य दिया।
नारद मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? आपकी बुद्धि धर्म में और आपका मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? राजा ने कहा: हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है। आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए। तब नारद मुनि ने कहा कि हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनें। मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया। उसी समय मैंने यमराज की सभा में आपके पिता को देखा। उन्होंने संदेशा दिया सो मैं तुम्हें कहता हूं।
उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में कई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूं सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्णा इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाएगी। ये सुनकर राजा ने महर्षि से इस व्रत की विधि पूछी। नारदजी ने कहा आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर फिर से दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें। फिर श्रद्धापूर्वक अपने पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें।
फिर प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करते हुए प्रतिज्ञा करें कि मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूंगा। हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूं, आप मेरी रक्षा करें। इस प्रकार नियमपूर्वक शालिग्राम भगवान की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार का भोजन कराएं और दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। पितरों के श्राद्ध से जो बच जाए उसको सूंघकर गौ को दें और ध़ूप, दीप, गंध, ‍पुष्प, नैवेद्य आदि सब सामग्री से फिर ऋषिकेश भगवान का पूजन करें।
रात्रि भर जागरण करें और इसके पश्चात द्वादशी के दिन प्रात:काल होने पर भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएं। इसके बाद भाई-बंधुओं, स्त्री और पुत्र सहित आप भी भोजन ग्रहण करें। आगे नारदजी कहने लगे कि हे राजन! इस विधि से यदि आप इंदिरा एकादशी का व्रत करोगे तो आपके पिता अवश्य ही स्वर्गलोक को जाएंगे।
राजा ने नारदजी के कथनानुसार अपने बांधवों और दासों सहित व्रत किया। जिससे आकाश से पुष्पवर्षा हुई और उस राजा का पिता गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को गया। साथ ही राजा इंद्रसेन भी एकादशी के व्रत के प्रभाव से निष्कंटक राज्य करके अंत में अपने पुत्र को सिंहासन की जिम्मेदारी सौंपकर स्वर्गलोक को गये। हे युधिष्ठिर! यह इंदिरा एकादशी के व्रत का माहात्म्य मैंने तुमसे कहा। इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाते हैं और सब प्रकार के भोगों को भोगकर बैकुंठ को प्राप्त होते हैं।
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