धर्म : कई बार व्यक्ति मेहनत करता है, घर में सुख-सुविधाओं की कमी नहीं होती और परिवार का माहौल भी सामान्य रहता है, लेकिन इसके बावजूद करियर और आर्थिक मामलों में मनचाही प्रगति महसूस नहीं होती। वास्तु शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार ऐसी स्थिति में घर की दिशाओं और विशेष रूप से **नैऋत्य कोण यानी दक्षिण-पश्चिम दिशा** की व्यवस्था पर ध्यान देने की सलाह दी जाती है।
वास्तु में नैऋत्य कोण को स्थिरता और मजबूती से जोड़कर देखा जाता है। इसे पृथ्वी तत्व से संबंधित माना गया है। मान्यता है कि घर का यह हिस्सा मजबूत, व्यवस्थित और अन्य हिस्सों की तुलना में थोड़ा भारी होना चाहिए। इस दिशा में खालीपन, अव्यवस्था या वास्तु के विपरीत निर्माण होने पर घर की स्थिरता प्रभावित होने की बात कही जाती है।
क्या होता है नैऋत्य कोण?
घर की दक्षिण और पश्चिम दिशा के बीच का हिस्सा दक्षिण-पश्चिम या नैऋत्य कोण कहलाता है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार पृथ्वी तत्व से जुड़े होने के कारण यह दिशा ठहराव, जिम्मेदारी, मजबूती और स्थिरता का प्रतिनिधित्व करती है।
यही कारण है कि इस हिस्से को बहुत ज्यादा खुला या खाली रखने के बजाय मजबूत रखने की सलाह दी जाती है। घर बनाते समय भी वास्तु में दक्षिण-पश्चिम हिस्से को उत्तर-पूर्व की तुलना में भारी और ऊंचा रखने की परंपरागत सलाह मिलती है।
मुखिया का बेडरूम यहां रखना माना जाता है अच्छा
वास्तु के अनुसार घर के मुखिया या दंपती के मास्टर बेडरूम के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा को उपयुक्त माना जाता है। मान्यता है कि इस दिशा में बेडरूम होने से परिवार में जिम्मेदारी और स्थिरता का भाव बना रहता है।
बेडरूम में बहुत अधिक अव्यवस्था नहीं रखनी चाहिए। टूटे हुए फर्नीचर और लंबे समय से इस्तेमाल न होने वाले सामान को जमा करने से भी बचने की सलाह दी जाती है।
भारी फर्नीचर रखने की सलाह
अगर घर का नैऋत्य कोण खाली पड़ा है तो वास्तु मान्यताओं के मुताबिक वहां भारी अलमारी, सोफा या दूसरा उपयोगी फर्नीचर रखा जा सकता है। इसका उद्देश्य दक्षिण-पश्चिम हिस्से को अपेक्षाकृत भारी बनाए रखना है।
हालांकि भारी रखने का मतलब यह नहीं है कि इस हिस्से को कबाड़ से भर दिया जाए। जगह साफ और व्यवस्थित रखना भी जरूरी माना गया है। बेकार सामान और गंदगी को वास्तु में सकारात्मक वातावरण के अनुकूल नहीं माना जाता।
पानी का स्रोत रखने से बचने की मान्यता
वास्तु के पारंपरिक नियमों में दक्षिण-पश्चिम दिशा में बोरिंग, कुआं या बड़ा भूमिगत जल स्रोत बनाने से बचने की सलाह दी जाती है। इसके पीछे वास्तु का तर्क यह है कि नैऋत्य पृथ्वी तत्व से संबंधित और भारी दिशा है, जबकि पानी के स्रोत इस हिस्से को वास्तु की दृष्टि से हल्का कर सकते हैं।
इसी तरह इस हिस्से में बड़ा गड्ढा या जमीन का ज्यादा नीचे होना भी वास्तु में अनुकूल नहीं माना जाता।
पूजा घर और रसोई के लिए दूसरी दिशा चुनने की सलाह
वास्तु मान्यताओं के अनुसार पूजा घर के लिए ईशान यानी उत्तर-पूर्व दिशा को प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए नैऋत्य कोण में मंदिर या पूजा स्थान बनाने से बचने की सलाह मिलती है।
इसी तरह दक्षिण-पश्चिम दिशा को रसोईघर के लिए भी पहली पसंद नहीं माना जाता। रसोई के लिए वास्तु में सामान्य तौर पर दक्षिण-पूर्व यानी अग्नि कोण को बेहतर बताया जाता है।
तिजोरी रखते समय ध्यान दें
अगर भारी तिजोरी या लॉकर दक्षिण-पश्चिम हिस्से में रखा गया है तो वास्तु में इसे मजबूत दीवार के पास स्थिर तरीके से रखने की सलाह दी जाती है। कुछ वास्तु मान्यताओं में लॉकर का दरवाजा उत्तर दिशा की ओर खुलना अच्छा माना गया है।
ध्यान रखें कि आर्थिक तरक्की का वास्तविक आधार आय, खर्च का प्रबंधन, बचत, निवेश, कौशल और करियर से जुड़े फैसले होते हैं। वास्तु से जुड़े ये नियम धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं का हिस्सा हैं। इसलिए घर में बड़े संरचनात्मक बदलाव केवल तरक्की की उम्मीद में करने के बजाय व्यावहारिक जरूरतों और विशेषज्ञ सलाह को भी ध्यान में रखना चाहिए।
Tags: