सनातन धर्म में पूजा-पाठ, आरती और मांगलिक अवसरों पर शंख बजाने की परंपरा अति प्राचीन है। शंख की ध्वनि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा नहीं है, बल्कि वातावरण में फैली नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर सकारात्मकता का संचार करने का एक सशक्त माध्यम है। शंख को माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का अत्यंत प्रिय माना गया है, इसलिए जिस घर में नियमित रूप से शंख बजता है, वहां सुख-समृद्धि और आरोग्य का वास होता है।
धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं
पौराणिक कथाओं के अनुसार शंख की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी। समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में से शंख भी एक प्रमुख रत्न था।
मां लक्ष्मी का भ्राता स्वरूप: समुद्र मंथन से ही देवी लक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ था, इसलिए शंख को देवी लक्ष्मी का भाई माना जाता है। शंख की उपस्थिति और ध्वनि से घर में दरिद्रता का नाश होता है।
भगवान विष्णु का धारण: शंख (पांचजन्य) श्री हरि विष्णु का प्रमुख आयुध है। पूजा-पाठ में शंख की ध्वनि से देवताओं का आह्वान होता है और घर की नकारात्मक शक्तियां व बाधाएं दूर भागती हैं।
वास्तु दोष से मुक्ति: घर में शंख रखने और उसका जल छिड़कने से वास्तु दोष समाप्त होते हैं तथा घर का माहौल शांत और पवित्र बनता है।
वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण
शंख बजाने के पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि कई वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी तथ्य भी जुड़े हुए हैं, जो आधुनिक विज्ञान में स्वीकार किए गए हैं:
कीटाणुओं का नाश: शंख से निकलने वाली ध्वनि तरंगों (Sound Waves) में इतनी ऊर्जा होती है कि यह वातावरण में मौजूद सूक्ष्म जीवाणुओं और रोगाणुओं को नष्ट या निष्क्रिय कर देती है।
फेफड़ों के लिए व्यायाम: शंख बजाने के लिए गहरी सांस भरकर जोर से हवा फेंकनी पड़ती है। यह प्रक्रिया फेफड़ों की कार्यक्षमता को बढ़ाती है और श्वसन तंत्र (Respiratory System) को मजबूत बनाती है।
हृदय और पेट के लिए लाभकारी: शंख बजाते समय पेट की मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है, जिससे पाचन तंत्र सुधरता है और मलाशय से जुड़ी समस्याओं में आराम मिलता है। साथ ही यह योगासन की तरह हृदय की नसों को मजबूत करता है।
मानसिक तनाव से मुक्ति: शंख की 'ॐ' जैसी गूंज मस्तिष्क की तरंगों को शांत करती है। यह एकाग्रता बढ़ाने, मानसिक तनाव और डिप्रेशन को कम करने में मदद करती है।
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