दिल्ली: देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों की मानसिक स्थिति को लेकर एक सर्वे में कई अहम बातें सामने आई हैं। सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित नेशनल टास्क फोर्स यानी NTF के सर्वे में करीब 9% छात्रों ने बताया कि उन्हें अक्सर आत्महत्या का विचार आता है। वहीं 34% छात्रों ने कहा कि वे अपने ही कैंपस में खुद को बाहरी महसूस करते हैं। इस सर्वे में 2.43 लाख से ज्यादा छात्रों के जवाब शामिल किए गए। इनमें करीब 67% छात्र SC, ST और OBC श्रेणी से थे। रिपोर्ट को 31 अक्टूबर तक सुप्रीम कोर्ट में जमा किए जाने की उम्मीद है।
15% छात्रों ने लंबे तनाव और एंग्जाइटी की बात कही
सर्वे में करीब 15% छात्रों ने बताया कि पिछले छह महीनों के दौरान ऐसा समय आया, जब वे बहुत ज्यादा तनाव में रहे या कई हफ्तों तक एंग्जाइटी का सामना किया। यह आंकड़ा उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई के दौरान छात्रों की मानसिक स्थिति से जुड़ी एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने रखता है। हालांकि, सर्वे में सभी प्रतिक्रियाएं नकारात्मक नहीं थीं। करीब 56% छात्रों ने कहा कि गंभीर समस्याओं को निष्पक्ष तरीके से संभालने के मामले में उन्हें अपने संस्थान के प्रशासन पर भरोसा है।
सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में बनाया था NTF
छात्र आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों और उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की मेंटल हेल्थ तथा वेल-बीइंग से जुड़े मुद्दों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया था।
इस टास्क फोर्स की अध्यक्षता जस्टिस एस. रवींद्र भट कर रहे हैं। देशभर में छात्रों से मिले जवाबों के आधार पर तैयार की जा रही रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किया जाना है।
सर्वे में अलग-अलग सामाजिक वर्गों से आने वाले छात्रों की भागीदारी रही है। इसमें SC, ST और OBC श्रेणी के छात्रों की हिस्सेदारी 67% रही।
मनोवैज्ञानिक ने शुरुआती संकेत पहचानने पर दिया जोर
साइकोलॉजिस्ट डॉ. जेपी अग्रवाल के अनुसार छात्रों में आत्महत्या के जोखिम को कम करने के लिए शुरुआती चेतावनी संकेतों को समय रहते पहचानना जरूरी है। इसके लिए शिक्षकों, काउंसलरों और हॉस्टल वार्डन को गेटकीपर ट्रेनिंग प्रोग्राम के जरिए प्रशिक्षण देने की बात कही गई है।
इस तरह की ट्रेनिंग में छात्रों को भी शामिल किया जा सकता है। इसमें तनाव, अवसाद और आत्महत्या के जोखिम से जुड़े शुरुआती संकेतों को पहचानने की जानकारी दी जा सकती है।
डॉ. अग्रवाल ने छात्रों को ‘टेलीमानस’ हेल्पलाइन और ‘मनहित’ ऐप जैसी सहायता सेवाओं के बारे में जानकारी देने की जरूरत भी बताई। उन्होंने छात्रों की आत्महत्या के अलग-अलग कारणों को समझने के लिए साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी को अनिवार्य किए जाने की जरूरत पर भी बात की।
दाखिले बढ़े, लेकिन सुसाइड रेट में भी बढ़ोतरी
आंकड़ों के मुताबिक 2011 से 2022 के बीच हायर एजुकेशन में छात्रों के दाखिले 2.92 करोड़ से बढ़कर 4.33 करोड़ हो गए। इसी अवधि में प्रति एक लाख छात्रों पर सुसाइड रेट भी 26.37 से बढ़कर 30.02 हो गया।
हाल के मामलों में IIT बॉम्बे का सितंबर का मामला भी सामने आया। 18 सितंबर 2026 को सेकेंड ईयर के छात्र साहिल वाकोडे ने हॉस्टल के कमरे में फंदे से आत्महत्या कर ली थी। वह एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। घटना के बाद करीब 400 छात्रों ने कैंपस में विरोध प्रदर्शन किया।
सर्वे और सामने आए मामलों के बीच उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की मानसिक सेहत, संस्थागत सहायता और समस्याओं की समय पर पहचान को लेकर चर्चा बढ़ी है। नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश होने के बाद इस मुद्दे पर आगे की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
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