कोलकाता : जादवपुर यूनिवर्सिटी (JU) एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह कोई छात्र आंदोलन या राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की दीवारों पर वर्षों से नजर आने वाले राजनीतिक नारों और प्रतीकों को लेकर शुरू हुई कार्रवाई है। दीवारों पर बनी लेफ्ट विचारधारा से जुड़ी पेंटिंग्स और नारों को हटाने की प्रक्रिया के बाद विश्वविद्यालय परिसर का माहौल बदलता नजर आ रहा है। इसे लेकर पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी बहस तेज हो गई है।
दरअसल, जादवपुर यूनिवर्सिटी लंबे समय से वामपंथी छात्र राजनीति का मजबूत केंद्र मानी जाती रही है। विश्वविद्यालय की दीवारों पर अलग-अलग समय में वामपंथी संगठनों, छात्र आंदोलनों और राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े संदेश लिखे जाते रहे हैं। इन दीवारों को कई लोग विश्वविद्यालय की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा मानते थे, जबकि कुछ लोग इसे शैक्षणिक परिसर में राजनीतिक प्रभाव के रूप में देखते रहे हैं।
अब विश्वविद्यालय परिसर में दीवारों पर लिखे कई राजनीतिक संदेशों को हटाया जा रहा है। इस कदम को लेकर भाजपा नेताओं ने इसे लंबे समय से चले आ रहे एक राजनीतिक प्रभाव में बदलाव के तौर पर पेश किया है। वहीं वामपंथी संगठनों ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे विचारों को दबाने की कोशिश बताया है।
शुभेंदु अधिकारी के बयान के बाद तेज हुई चर्चा
पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने जादवपुर यूनिवर्सिटी को लेकर कई बार सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थानों में एकतरफा राजनीतिक प्रभाव नहीं होना चाहिए। उनके बयानों के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज हुई।
भाजपा नेताओं का कहना है कि शैक्षणिक संस्थान शिक्षा और शोध के केंद्र होने चाहिए, न कि किसी एक राजनीतिक विचारधारा के प्रचार स्थल। उनका दावा है कि दीवारों से राजनीतिक नारों को हटाना परिसर को तटस्थ बनाने की दिशा में कदम है।
जादवपुर यूनिवर्सिटी की राजनीतिक पहचान
जादवपुर यूनिवर्सिटी पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि पूरे देश में अपनी अकादमिक पहचान के साथ-साथ छात्र राजनीति के लिए भी जानी जाती है। यहां लंबे समय से छात्र संगठन सक्रिय रहे हैं और कई बड़े राजनीतिक आंदोलनों की शुरुआत भी इसी परिसर से हुई है।
वामपंथी छात्र संगठनों का विश्वविद्यालय में लंबे समय तक प्रभाव रहा है। यही वजह है कि परिसर की दीवारों पर भी वामपंथी विचारधारा से जुड़े नारे और कलाकृतियां दिखाई देती थीं। इन दीवारों को कई छात्र आंदोलन और सामाजिक मुद्दों की अभिव्यक्ति का माध्यम मानते रहे हैं।
भाजपा ने बताया बदलाव की शुरुआत
भाजपा नेताओं ने दीवारों से राजनीतिक संदेश हटाने को एक सकारात्मक बदलाव बताया है। उनका कहना है कि अब विश्वविद्यालय परिसर में सभी विचारों के लिए समान जगह होनी चाहिए और किसी एक राजनीतिक समूह का प्रभुत्व नहीं होना चाहिए।
भाजपा समर्थकों का दावा है कि लंबे समय से चली आ रही एक राजनीतिक संस्कृति को बदलने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि शिक्षा के केंद्रों में राष्ट्रहित, शोध और विकास से जुड़े विषयों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
वाम संगठनों ने उठाए सवाल
वहीं वामपंथी छात्र संगठनों और नेताओं ने इस कार्रवाई का विरोध किया है। उनका कहना है कि दीवारों पर लिखे संदेश केवल राजनीतिक नारे नहीं बल्कि छात्रों के सामाजिक और लोकतांत्रिक संघर्षों की अभिव्यक्ति हैं।
वाम नेताओं का आरोप है कि राजनीतिक दबाव में विश्वविद्यालय की पुरानी पहचान को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि किसी भी विचारधारा को केवल दीवारों से मिटाने से खत्म नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक लड़ाई का नया मैदान
जादवपुर यूनिवर्सिटी का यह मुद्दा अब केवल दीवारों तक सीमित नहीं रहा है। यह पश्चिम बंगाल में भाजपा और वाम दलों के बीच वैचारिक संघर्ष का नया मुद्दा बन गया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल की राजनीति में वामपंथ का प्रभाव भले पहले जैसा नहीं रहा हो, लेकिन विश्वविद्यालयों और छात्र राजनीति में उसकी पकड़ लंबे समय तक रही है। ऐसे में जादवपुर यूनिवर्सिटी में बदलाव को भाजपा अपने राजनीतिक विस्तार के संकेत के रूप में देख रही है।
शिक्षा और राजनीति के बीच बहस
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या विश्वविद्यालय परिसरों में राजनीतिक अभिव्यक्ति की जगह होनी चाहिए या शैक्षणिक संस्थानों को पूरी तरह राजनीतिक गतिविधियों से अलग रखा जाना चाहिए।
एक पक्ष का मानना है कि छात्र राजनीति लोकतंत्र का हिस्सा है और इससे युवाओं में नेतृत्व क्षमता विकसित होती है। वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि शिक्षा के माहौल को राजनीतिक विवादों से दूर रखना जरूरी है।
फिलहाल जादवपुर यूनिवर्सिटी की दीवारों से बदलती तस्वीर पश्चिम बंगाल की राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई है। भाजपा इसे बदलाव की शुरुआत बता रही है, जबकि वाम संगठन इसे विचारों पर हमला करार दे रहे हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा राज्य की राजनीति में और गर्माने की संभावना है।