पश्चिम बंगाल: राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर कथित बगावत और सांसदों के अलग रुख को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति तेज कर दी है। सायोनी घोष समेत करीब 20 सांसदों वाले कथित बागी टीएमसी गुट को लेकर बीजेपी की ओर से पहला राजनीतिक दांव चलने की बात सामने आ रही है। हालांकि इस पूरे मामले में आगे की स्थिति कई संवैधानिक और राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगी।
दरअसल, टीएमसी के भीतर सांसदों के एक समूह के अलग रुख की खबरों ने बंगाल की सियासत में चर्चाएं बढ़ा दी हैं। अगर किसी दल के सांसद बड़ी संख्या में अलग होकर कोई नया राजनीतिक कदम उठाते हैं तो उस पर दल-बदल कानून और संसद के नियमों का असर पड़ सकता है। इसी वजह से बीजेपी और एनडीए की रणनीति को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।
बीजेपी की ओर से लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि वह विपक्षी दलों में चल रही अंदरूनी खींचतान पर नजर बनाए हुए है। पार्टी नेताओं का मानना है कि अगर किसी दल में टूट होती है तो उसका असर संसद के समीकरणों पर पड़ सकता है। हालांकि किसी भी सांसद के पाला बदलने या अलग गुट बनाने की स्थिति में कानूनी प्रक्रिया और संवैधानिक प्रावधानों का पालन जरूरी होगा।
राजनीतिक चर्चा का केंद्र फिलहाल एनडीए के दो तिहाई बहुमत वाले दांव पर है। दल-बदल कानून के तहत किसी पार्टी के विधायकों या सांसदों के समूह को अलग मान्यता मिलने के लिए कुछ शर्तें होती हैं। ऐसे में केवल संख्या बल ही नहीं, बल्कि कानूनी स्थिति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी पार्टी के सांसद सामूहिक रूप से अलग रुख अपनाते हैं तो सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या वह गुट कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त कर पाएगा। क्योंकि दल-बदल कानून में पार्टी छोड़ने और अलग गुट बनाने को लेकर स्पष्ट नियम हैं।
सायोनी घोष का नाम इस पूरे घटनाक्रम में चर्चा में आने के बाद टीएमसी और बीजेपी के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो सकती है। तृणमूल कांग्रेस पहले भी कई मौकों पर बीजेपी पर उसके नेताओं को तोड़ने की कोशिश करने का आरोप लगाती रही है। वहीं बीजेपी विपक्षी दलों के अंदरूनी मतभेदों को राजनीतिक बदलाव का संकेत बताती रही है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी और बीजेपी के बीच मुकाबला लंबे समय से जारी है। विधानसभा चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावों तक दोनों दल एक-दूसरे पर लगातार हमलावर रहे हैं। ऐसे में सांसदों से जुड़ी कोई भी हलचल राज्य की राजनीति में बड़ा असर डाल सकती है।
बीजेपी के लिए संसद में संख्या बल और विपक्षी दलों की स्थिति हमेशा महत्वपूर्ण रही है। वहीं टीएमसी के लिए अपने सांसदों को एकजुट रखना बड़ी चुनौती हो सकती है। पार्टी नेतृत्व की नजरें अब इस बात पर होंगी कि क्या किसी तरह की वास्तविक बगावत होती है या फिर यह केवल राजनीतिक अटकलों तक सीमित रहती है।
एनडीए के दो तिहाई वाले समीकरण को लेकर भी विशेषज्ञों का कहना है कि यह आसान रास्ता नहीं है। इसके लिए पर्याप्त संख्या में सांसदों का समर्थन, कानूनी मंजूरी और संसदीय प्रक्रिया का पालन जरूरी होगा। किसी भी तरह की जल्दबाजी राजनीतिक और कानूनी विवाद को जन्म दे सकती है।
फिलहाल टीएमसी, बीजेपी और एनडीए की रणनीतियों पर सबकी नजर बनी हुई है। आने वाले दिनों में अगर सांसदों की स्थिति स्पष्ट होती है तो बंगाल की राजनीति और संसद के समीकरणों पर इसका असर देखने को मिल सकता है।
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