ड्रग नेटवर्क पर डिजिटल वार हॉटस्पॉट की GIS मैपिंग की तैयारी
GIS मैपिंग से टूटेगा नशे का जाल संवेदनशील इलाकों की होगी पहचान
देहरादून: नशे के अवैध कारोबार और तस्करी नेटवर्क पर शिकंजा कसने के लिए अब तकनीक का सहारा लिया जाएगा। उत्तराखंड में नशे के लिहाज से संवेदनशील इलाकों और हॉटस्पॉट की जीआईएस (Geographic Information System) मैपिंग करने की तैयारी की गई है। इसके जरिए नशीले पदार्थों की बिक्री, तस्करी और इससे जुड़ी गतिविधियों वाले क्षेत्रों की पहचान कर संबंधित एजेंसियों को कार्रवाई की रणनीति बनाने में मदद मिलेगी। जीआईएस मैपिंग से यह पता लगाने की कोशिश होगी कि किन इलाकों में नशीले पदार्थों से जुड़े मामले लगातार सामने आ रहे हैं, तस्करी के कौन से रास्ते ज्यादा सक्रिय हैं और किन स्थानों पर विशेष निगरानी की जरूरत है। डेटा के आधार पर तैयार होने वाले डिजिटल मानचित्र से संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान आसान हो सकेगी।
नशे के हॉटस्पॉट होंगे चिह्नित
इस व्यवस्था में पूर्व में सामने आए नशीले पदार्थों के मामलों, बरामदगी वाले स्थानों और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े क्षेत्रों के डेटा का विश्लेषण किया जा सकता है। इसके आधार पर हॉटस्पॉट चिह्नित कर निगरानी बढ़ाई जाएगी। विशेष रूप से स्कूल-कॉलेजों, शिक्षण संस्थानों, पर्यटन क्षेत्रों और ऐसे स्थानों पर नजर रखने पर जोर दिया जा रहा है, जहां युवाओं के नशे की चपेट में आने का खतरा अधिक रहता है। संवेदनशील इलाकों की पहचान होने के बाद वहां नियमित निगरानी और जागरूकता अभियान भी चलाए जा सकेंगे।
तस्करी के नेटवर्क तक पहुंचने में मिलेगी मदद
नशे के कारोबार में केवल छोटे स्तर पर बिक्री करने वालों के बजाय इसके पीछे सक्रिय पूरे नेटवर्क तक पहुंचना बड़ी चुनौती होती है। जीआईएस तकनीक अलग-अलग मामलों के बीच भौगोलिक संबंध समझने में मदद कर सकती है। लगातार किसी खास मार्ग या क्षेत्र से मामले सामने आने पर उस स्थान को प्राथमिकता के आधार पर निगरानी में लिया जा सकेगा। इसके साथ ही अंतरराज्यीय तस्करी के संभावित रास्तों पर भी नजर मजबूत करने में तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। सीमावर्ती क्षेत्रों में नशीले पदार्थों की आवाजाही रोकने के लिए संबंधित एजेंसियों के बीच सूचनाओं के बेहतर समन्वय पर जोर रहेगा।
युवाओं को नशे से बचाना बड़ी चुनौती
नशीले पदार्थों की उपलब्धता रोकने के साथ सरकार के सामने युवाओं को नशे से दूर रखना भी बड़ी चुनौती है। इसलिए प्रवर्तन के साथ जागरूकता, पुनर्वास और उपचार को भी नशामुक्ति अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
जीआईएस मैपिंग से मिलने वाले आंकड़ों का इस्तेमाल भविष्य में नशा विरोधी अभियान की रणनीति बनाने में किया जा सकता है। इससे संसाधनों को उन क्षेत्रों में केंद्रित करना आसान होगा, जहां समस्या ज्यादा गंभीर है। तकनीक आधारित निगरानी की यह पहल प्रभावी ढंग से लागू होती है तो नशे के हॉटस्पॉट की पहचान से लेकर तस्करी नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने तक संबंधित एजेंसियों को महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है।