बरेली। लगातार भारी बारिश और नदियों के बढ़ते जलस्तर ने बरेली के कई ग्रामीण इलाकों में मुश्किलें बढ़ा दी हैं। रामगंगा, किच्छा और भाखड़ा नदियों के किनारे कटान तेज होने से खेतों, धार्मिक स्थलों और सरकारी परियोजनाओं पर खतरा मंडरा रहा है। मीरगंज क्षेत्र के कपूरपुर गांव में रामगंगा की कटान की चपेट में आकर एक मंदिर नदी में समा गया, जबकि शेरगढ़ क्षेत्र के बैरमनगर में जल जीवन मिशन के तहत बन रही करीब **3.97 करोड़ रुपये की ओवरहेड पानी की टंकी** किच्छा नदी के कटान के कारण ढह गई। वहीं भाखड़ा नदी के किनारे बने एक दूसरे ओवरहेड टैंक की सुरक्षा को लेकर भी प्रशासन अलर्ट हो गया है।
बारिश के बाद नदियों का बदला रुख अब ग्रामीणों के लिए बड़ी चिंता बन गया है। कई स्थानों पर नदी खेतों को काटते हुए आबादी और सरकारी निर्माणों के करीब पहुंच रही है। प्रशासन और संबंधित विभागों की टीमें संवेदनशील इलाकों का निरीक्षण कर रही हैं।
रामगंगा में समाया मंदिर
मीरगंज तहसील क्षेत्र के कपूरपुर गांव में रामगंगा नदी पिछले कई दिनों से तेजी से कटान कर रही थी। नदी की धारा धीरे-धीरे गांव के बाहर स्थित मंदिर के बेहद करीब पहुंच गई थी।
ग्रामीणों के मुताबिक मंदिर को बचाने के प्रयास भी किए गए, लेकिन नदी की तेज धारा और लगातार कटान के सामने ये कोशिशें सफल नहीं हो सकीं।
मंगलवार रात मंदिर का बचा हुआ हिस्सा भी रामगंगा में समा गया। बुधवार सुबह जब ग्रामीण मंदिर की तरफ पहुंचे तो वहां मंदिर लगभग गायब था। इस घटना के बाद गांव में मायूसी का माहौल बन गया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना होती थी और आसपास के लोग भी यहां पहुंचते थे।
मंदिर के नदी में समाने से लोगों की धार्मिक आस्था को भी झटका लगा है।
पहले चबूतरा और गुंबद आए थे चपेट में
मंदिर अचानक एक ही बार में नदी में नहीं समाया। कटान का असर पिछले कुछ दिनों से लगातार दिखाई दे रहा था।
ग्रामीणों के अनुसार पहले मंदिर के चबूतरे का हिस्सा और छोटे गुंबद के पिलर नदी की चपेट में आए। इसके बाद नदी और करीब पहुंचती चली गई।
प्रशासन और बाढ़ खंड की टीम ने मंदिर के आसपास कटान रोकने की कोशिश की, लेकिन मंगलवार रात नदी का बहाव और कटान इतना तेज हुआ कि मंदिर का अधिकांश हिस्सा नदी में चला गया।
स्थानीय लोगों ने अब आसपास के खेतों और दूसरे निर्माणों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई है।
मंदिर कितना पुराना था इस पर अलग-अलग दावे
मंदिर को लेकर स्थानीय रिपोर्टों में अलग-अलग विवरण सामने आए हैं। कुछ रिपोर्ट इसे काफी पुराना और क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र बताती हैं, जबकि एक स्थानीय रिपोर्ट में ग्रामीणों के हवाले से इसका निर्माण करीब 15 साल पहले होने की बात कही गई है। इसलिए इसे निश्चित रूप से सदियों पुराना या अत्यंत प्राचीन बताना अभी उचित नहीं होगा।
इतना जरूर है कि मंदिर स्थानीय ग्रामीणों के लिए धार्मिक महत्व रखता था और उसके नदी में समाने से लोग मायूस हैं।
किच्छा नदी ने निगली करोड़ों की पानी की टंकी
बरेली में नदी के कटान से हुआ दूसरा बड़ा नुकसान शेरगढ़ ब्लॉक के बैरमनगर में सामने आया।
यहां जल जीवन मिशन के तहत बनाई जा रही ओवरहेड पानी की टंकी किच्छा नदी के तेज कटान की चपेट में आ गई।
इस पेयजल योजना की लागत करीब **3.97 करोड़ रुपये** बताई गई है। गांव में पाइपलाइन बिछाने और घरों तक नल कनेक्शन पहुंचाने का काम भी किया जा रहा था। लेकिन लोगों को योजना का पूरा लाभ मिलने से पहले ही निर्माणाधीन ओवरहेड टैंक नदी में गिर गया।
टंकी के नदी में गिरने का वीडियो भी सामने आया है।
वीडियो में विशाल निर्माण को कटान के बाद नदी की तरफ झुकते और गिरते देखा गया, जिसके बाद जल जीवन मिशन की इस परियोजना को लेकर सवाल उठने लगे।
टंकी का निर्माण करीब 30 प्रतिशत हुआ था
जल निगम की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक बैरमनगर पेयजल योजना में ट्यूबवेल, पंप हाउस और करीब 129 मीटर बाउंड्रीवॉल का काम पूरा हो चुका था।
325 किलोलीटर क्षमता और 16 मीटर स्टेजिंग वाले ओवरहेड टैंक का निर्माण करीब **30 प्रतिशत** हुआ था। पूरी योजना की प्रगति करीब **61.35 प्रतिशत** बताई गई है।
लेकिन नदी के कटान ने परियोजना को बड़ा नुकसान पहुंचाया।
टंकी के अलावा बाउंड्रीवॉल का हिस्सा भी प्रभावित हुआ और आसपास की कृषि भूमि तथा पेड़ों को नुकसान पहुंचने की बात सामने आई है।
67 हजार क्यूसेक से ज्यादा पानी छोड़े जाने का असर
जल निगम के मुताबिक पहाड़ी क्षेत्रों में भारी बारिश के बाद गौला बैराज से **67,000 क्यूसेक से अधिक पानी** छोड़ा गया था। इसके कारण सितंबर के पहले सप्ताह में किच्छा नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ा और नदी उफान पर आ गई।
विभाग का कहना है कि इस महीने किच्छा का जलस्तर पिछले कई वर्षों के उच्चतम स्तरों में से एक रहा।
तेज पानी के साथ नदी ने किनारों को काटना शुरू किया और कुछ ही समय में स्थिति गंभीर हो गई।
नदी पहले थी दूर फिर टंकी तक पहुंची धार
टंकी गिरने के बाद सबसे बड़ा सवाल इसके निर्माण स्थल को लेकर उठा।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि नदी के कटान का खतरा पहले से दिखाई दे रहा था और समय रहते सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम होने चाहिए थे।
दूसरी तरफ विभागीय अधिकारियों का कहना है कि जब योजना के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई और निर्माण शुरू हुआ, तब नदी का किनारा टंकी से काफी दूर था। अलग-अलग रिपोर्टों में शुरुआती दूरी के आंकड़े अलग हैं, लेकिन विभाग का मुख्य तर्क यही है कि बाद के वर्षों में नदी की धारा और तटरेखा तेजी से बदलकर निर्माण के करीब पहुंच गई।
विभाग ने निर्माण की गुणवत्ता में लापरवाही के आरोपों से भी इनकार किया है।
नींव के आसपास की मिट्टी बहने से गिरा टैंक
अधिकारियों की प्रारंभिक जांच के मुताबिक नदी के तेज कटान से टंकी की नींव के आसपास की मिट्टी बह गई थी।
इससे जमीन का सहारा कमजोर हुआ और निर्माण एक तरफ झुकने लगा। आखिरकार 8 सितंबर को निर्माणाधीन ओवरहेड टैंक नदी में गिर गया। स्थानीय विभागीय रिपोर्ट में घटना की प्रमुख वजह नदी के तेज कटान को बताया गया है।
हालांकि ग्रामीणों ने सुरक्षा इंतजामों और कटान रोकने के प्रयासों को लेकर सवाल उठाए हैं।
ऐसे में घटना ने यह बहस भी खड़ी कर दी है कि नदी किनारे बड़ी सरकारी परियोजनाओं के लिए स्थल चयन और दीर्घकालिक कटान जोखिम का आकलन किस तरह किया जाना चाहिए।
भाखड़ा के किनारे दूसरी टंकी पर भी खतरा
बैरमनगर की घटना के बाद प्रशासन ने आसपास के दूसरे संवेदनशील निर्माणों की जांच तेज कर दी है।
मीरगंज ब्लॉक के **पहुंचा बुजुर्ग गांव** में भाखड़ा नदी किनारे बने जल जीवन मिशन के एक अन्य ओवरहेड टैंक का अधिकारियों ने निरीक्षण किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक भाखड़ा नदी कटान करते हुए टंकी परिसर की बाउंड्री से करीब **8 से 10 मीटर** की दूरी तक पहुंच चुकी है।
स्थिति को देखते हुए एसडीएम मीरगंज निधि शुक्ला, जल जीवन मिशन और बाढ़ खंड के अधिकारियों ने मौके का जायजा लिया।
ग्रामीणों को आशंका है कि नदी का जलस्तर घटने के दौरान कटान और तेज हुआ तो टंकी को खतरा बढ़ सकता है।
गोशाला की गायों को सुरक्षित जगह पहुंचाने के निर्देश
भाखड़ा नदी की स्थिति देखते हुए प्रशासन ने एहतियाती कदम भी उठाने शुरू किए हैं।
अधिकारियों के निरीक्षण के दौरान गांव की गोशाला में मौजूद गायों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के निर्देश दिए गए। ग्रामीणों ने अधिकारियों को बताया कि नदी पिछले कई वर्षों से इस क्षेत्र में कटान कर रही है और पिछले वर्ष भी टंकी के आसपास की जमीन प्रभावित हुई थी।
अब बैरमनगर की टंकी गिरने के बाद प्रशासन दूसरी परियोजना को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरत रहा है।
खेत भी कटान की चपेट में
नदियों के उफान का असर केवल सरकारी निर्माण और मंदिर तक सीमित नहीं है।
कई ग्रामीणों की कृषि भूमि भी कटान की चपेट में आई है। किच्छा नदी के किनारे खेतों का हिस्सा बहने और पॉपलर समेत कई पेड़ों के नदी में गिरने की जानकारी सामने आई है।
किसानों के लिए यह दोहरी मार है।
एक तरफ भारी बारिश के कारण फसल प्रभावित होने का खतरा है, वहीं दूसरी तरफ नदी के कटान से जमीन ही कम होती जा रही है।
नदी किनारे रहने वाले परिवारों में इस बात की चिंता है कि अगर कटान इसी रफ्तार से जारी रहा तो आने वाले दिनों में आबादी वाले हिस्सों पर भी असर पड़ सकता है।
रिकॉर्ड बारिश के बाद बिगड़े हालात
बरेली में हाल के दिनों में असाधारण बारिश दर्ज की गई है। जल निगम के अधिकारियों के मुताबिक **7 सितंबर को बरेली में देश में सबसे अधिक बारिश दर्ज की गई थी**। इसी भारी बारिश और पहाड़ी क्षेत्रों से आए पानी ने स्थानीय नदियों पर दबाव बढ़ाया।
बारिश के बाद नदी का जलस्तर बढ़ना सामान्य है, लेकिन तेज प्रवाह के साथ होने वाला कटान ज्यादा खतरनाक साबित होता है।
नदी किनारे की मिट्टी लगातार बहने पर बड़े पेड़, सड़क, भवन या दूसरी संरचनाओं की नींव कमजोर हो सकती है।
बैरमनगर की पानी की टंकी और कपूरपुर का मंदिर इसी खतरे की दो बड़ी तस्वीरें बनकर सामने आए हैं।
अब कटान रोकना सबसे बड़ी चुनौती
प्रशासन के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती संवेदनशील स्थानों की पहचान कर वहां कटान को नियंत्रित करना है।
रामगंगा किनारे कपूरपुर में मंदिर को बचाने के लिए फ्लड फाइटिंग और कटानरोधी प्रयास किए गए थे, लेकिन नदी की धारा के सामने वे पर्याप्त साबित नहीं हुए।
अब दूसरे निर्माणों और आबादी वाले क्षेत्रों को बचाने के लिए समय रहते कदम उठाने की मांग बढ़ रही है।
ग्रामीण चाहते हैं कि केवल निरीक्षण तक कार्रवाई सीमित न रहे बल्कि जहां जरूरी हो वहां कटानरोधी ठोकरें, बोल्डर पिचिंग और दूसरे तकनीकी उपाय किए जाएं।
बारिश थमी तो भी खत्म नहीं होगा खतरा
नदी किनारे रहने वाले लोगों के लिए केवल बारिश रुकना राहत की गारंटी नहीं है।
कई बार नदी का जलस्तर नीचे जाने के दौरान किनारों पर कटान तेज हो जाता है। यही वजह है कि भाखड़ा नदी के पास स्थित दूसरे ओवरहेड टैंक को लेकर ग्रामीण अभी से चिंता जता रहे हैं।
प्रशासन को आने वाले दिनों में नदी के जलस्तर के साथ कटान की गति पर भी नजर रखनी होगी।
बरेली में फिलहाल तस्वीर चिंताजनक है—**रामगंगा की कटान ने गांव का मंदिर निगल लिया, किच्छा नदी के किनारे करीब 3.97 करोड़ रुपये की पेयजल परियोजना का निर्माणाधीन टैंक ढह गया और भाखड़ा नदी अब एक अन्य ओवरहेड टैंक के बेहद करीब पहुंच चुकी है।
इन घटनाओं ने साफ कर दिया है कि भारी बारिश के बाद नदी का उफान ही नहीं बल्कि लगातार होने वाला भू-कटान भी बड़ी आपदा बन सकता है।