लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति को और मजबूत करना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में पार्टी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा की तेजतर्रार नेताओं में शामिल स्मृति ईरानी को एक बार फिर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी सीट से हार के बाद स्मृति ईरानी की राजनीतिक भूमिका को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन भाजपा के इस फैसले के बाद उन चर्चाओं पर विराम लग गया है।

स्मृति ईरानी को पार्टी की नई जिम्मेदारी देना भाजपा की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, भाजपा ने स्मृति ईरानी के जरिए एक साथ कई सियासी समीकरण साधने की कोशिश की है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जहां युवाओं, महिलाओं और सामाजिक समीकरणों की भूमिका बेहद अहम होती है, वहां स्मृति ईरानी की लोकप्रियता और आक्रामक राजनीतिक शैली पार्टी के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

स्मृति ईरानी की पहचान केवल एक राजनेता के रूप में ही नहीं, बल्कि एक ऐसी महिला नेता के तौर पर भी बनी है, जिन्होंने टीवी जगत से राजनीति तक लंबा सफर तय किया है। लोकप्रिय धारावाहिक ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ से घर-घर में पहचान बनाने वाली स्मृति ईरानी ने राजनीति में कदम रखने के बाद अपनी अलग छवि बनाई। संसद में भी वह भाजपा की मुखर आवाज के रूप में सामने आती रहीं और विपक्ष पर तीखे हमले करती रही हैं।

2019 के लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को उनके पारंपरिक गढ़ अमेठी में हराकर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा संदेश दिया था। इस जीत के बाद भाजपा में उनका कद और बढ़ा था। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें अमेठी से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन पार्टी में उनकी भूमिका को लेकर चर्चाएं लगातार जारी रहीं।

भाजपा का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश की राजनीति कई नई चुनौतियों से गुजर रही है। पार्टी के सामने युवा मतदाताओं को साधने, विपक्ष के पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) समीकरण का जवाब देने और महिलाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत रखने की चुनौती है। ऐसे में स्मृति ईरानी को आगे करना भाजपा की महिला वोट बैंक और शहरी-मध्यम वर्ग के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी और महिला मतदाताओं की बढ़ती भूमिका को देखते हुए भाजपा स्मृति ईरानी की छवि का इस्तेमाल करना चाहती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की महिला केंद्रित योजनाओं को जनता तक पहुंचाने और आधी आबादी के बीच पार्टी का संदेश मजबूत करने में स्मृति ईरानी अहम भूमिका निभा सकती हैं।

वहीं, कांग्रेस के खिलाफ भाजपा के हमलावर चेहरे के रूप में भी स्मृति ईरानी को देखा जाता है। राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी में मिली जीत ने उन्हें भाजपा के लिए एक मजबूत राजनीतिक चेहरा बनाया था। कांग्रेस पर हमला करने के दौरान उनकी आक्रामक शैली और तथ्यों के साथ जवाब देने की क्षमता पार्टी के लिए फायदेमंद मानी जाती है।

उत्तर प्रदेश में आगामी चुनाव भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। राज्य की राजनीति में छोटी से छोटी रणनीति भी चुनावी परिणामों पर असर डाल सकती है। भाजपा जहां अपनी सरकार की उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जाएगी, वहीं विपक्ष महंगाई, रोजगार और सामाजिक मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश करेगा। ऐसे माहौल में स्मृति ईरानी जैसे नेताओं की भूमिका और बढ़ जाती है।

भाजपा के इस कदम से यह भी संकेत मिलता है कि पार्टी पुराने और अनुभवी नेताओं के साथ-साथ ऐसे चेहरों को भी आगे बढ़ाना चाहती है, जिनकी जनता के बीच अलग पहचान है। स्मृति ईरानी का राजनीतिक सफर संघर्ष और लगातार सक्रियता से जुड़ा रहा है। वह संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर जिम्मेदारियां संभाल चुकी हैं।

अब देखना होगा कि यूपी चुनाव की तैयारियों में स्मृति ईरानी को किस तरह की भूमिका दी जाती है और वह पार्टी के लिए कितना प्रभावी अभियान चला पाती हैं। हालांकि इतना तय है कि भाजपा ने उन्हें जिम्मेदारी देकर यह संदेश जरूर दिया है कि 2024 की हार के बाद भी पार्टी में उनका महत्व कम नहीं हुआ है।

आने वाले समय में स्मृति ईरानी उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा के प्रमुख चेहरों में शामिल रह सकती हैं। महिला मतदाताओं, युवाओं और कांग्रेस विरोधी रणनीति के बीच पार्टी उन्हें एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में दिखाई दे रही है।

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