लखनऊ। समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा-एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी लागू करने की बात कहे जाने के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने भाजपा सरकार को पुराने चुनावी वादों की याद दिलाते हुए कहा कि पहले पुराने वादे पूरे किए जाएं, उसके बाद यूसीसी की बात की जाए।
अखिलेश यादव ने मंगलवार को यूसीसी के मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा पर तंज कसा। उन्होंने कहा कि हम तो बस इतना कहेंगे कि पहले पिछले वादे निभाओ और यूसीसी बाद में लाओ। उन्होंने सरकार पर नया राजनीतिक मुद्दा सामने लाकर जनता को बहकाने का आरोप भी लगाया।
अखिलेश की प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब अमित शाह के बयान के बाद यूसीसी को लेकर केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष ही नहीं बल्कि एनडीए के भीतर भी अलग-अलग राय सामने आ रही है।
अखिलेश ने क्या कहा?
यूसीसी को लेकर पूछे गए सवाल पर अखिलेश यादव ने कहा, **“हम तो बस इतना कहेंगे कि पहले पिछले वादे निभाओ, यूसीसी फिर बाद में लाओ।”**
उन्होंने भाजपा पर तंज कसते हुए कहा कि नया जुमला लेकर न आएं और जनता को न बहकाएं।
अखिलेश ने इसके साथ ही भाजपा के पुराने चुनावी वादों का जिक्र करते हुए लोगों के बैंक खातों में 15 लाख रुपये आने वाले पुराने राजनीतिक दावे को भी याद दिलाया।
सपा प्रमुख का पूरा हमला इस बात पर केंद्रित रहा कि भाजपा को नए मुद्दे उठाने से पहले अपने पुराने वादों का हिसाब देना चाहिए।
अमित शाह ने क्या कहा था?
इस पूरे विवाद की शुरुआत केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हालिया बयान के बाद हुई।
मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान अमित शाह ने कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की सरकार वाले सभी 21 राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में काम किया जाएगा।
उन्होंने यूसीसी को भाजपा के लंबे समय से चले आ रहे एजेंडे से जोड़ा।
भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में भी समान नागरिक संहिता का मुद्दा शामिल रहा है।
अमित शाह ने अपने बयान में अनुच्छेद 370 हटाने और तीन तलाक जैसे फैसलों का भी उल्लेख किया और यूसीसी को समान नागरिक अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
आखिर UCC है क्या?
यूनिफॉर्म सिविल कोड का सामान्य अर्थ देश के नागरिकों के लिए कुछ निजी नागरिक मामलों में धर्म से अलग समान कानून की व्यवस्था से है।
वर्तमान समय में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति और गोद लेने जैसे कई मामलों में अलग-अलग समुदायों के पर्सनल लॉ लागू होते हैं।
यूसीसी की अवधारणा इन मामलों में एक समान कानूनी ढांचा तैयार करने से जुड़ी है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के तहत कहा गया है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।
लेकिन इसे कैसे लागू किया जाए और धार्मिक तथा सांस्कृतिक विविधताओं को किस तरह सुरक्षित रखा जाए, इसे लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है।
भाजपा क्यों करती रही है UCC की वकालत?
यूसीसी भाजपा के प्रमुख वैचारिक मुद्दों में शामिल रहा है।
भाजपा का तर्क है कि अगर आपराधिक कानून सभी नागरिकों के लिए समान हो सकते हैं तो विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे नागरिक मामलों में भी समानता होनी चाहिए।
पार्टी इसे विशेष रूप से महिलाओं के अधिकार और लैंगिक समानता से जोड़कर पेश करती रही है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि अलग-अलग पर्सनल लॉ में मौजूद असमानताओं को दूर करने के लिए समान नागरिक कानून जरूरी है।
अमित शाह का हालिया बयान इसी राजनीतिक और वैचारिक दिशा को आगे बढ़ाता दिखाई देता है।
अखिलेश का फोकस पुराने वादों पर
अखिलेश यादव ने फिलहाल यूसीसी के कानूनी प्रावधानों पर विस्तृत टिप्पणी करने के बजाय भाजपा की राजनीतिक विश्वसनीयता को निशाने पर लिया।
उनका सवाल यह है कि भाजपा सरकार अपने पुराने वादों का क्या हुआ, इसका जवाब पहले दे।
उन्होंने रोजगार, किसानों और दूसरे मुद्दों को लेकर भी पहले भाजपा सरकार पर वादाखिलाफी के आरोप लगाए हैं।
यूसीसी के मुद्दे पर भी उनकी रणनीति इसी लाइन पर दिखाई दे रही है।
अखिलेश का संदेश है कि सरकार जनता के रोजमर्रा के मुद्दों और पुराने वादों से ध्यान हटाने के लिए नए राजनीतिक मुद्दे सामने ला रही है।
यूपी में भी UCC को लेकर हलचल
अमित शाह के बयान के बाद उत्तर प्रदेश में यूसीसी लागू करने की संभावना को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है।
उत्तर प्रदेश भाजपा के नेताओं ने इसे पार्टी के संकल्प का हिस्सा बताया है।
प्रदेश सरकार के मंत्री भी यूसीसी को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
यूपी में 2027 में विधानसभा चुनाव होना है। ऐसे में यूसीसी का मुद्दा चुनाव से पहले प्रदेश की राजनीति में बड़ा विषय बन सकता है।
राज्य की बड़ी आबादी और सामाजिक-धार्मिक विविधता को देखते हुए यहां यूसीसी पर होने वाली बहस का राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर पड़ सकता है।
2027 के चुनाव से पहले बड़ा मुद्दा?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा और समाजवादी पार्टी मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं।
एक तरफ भाजपा यूसीसी को समानता और सुधार के मुद्दे के रूप में आगे बढ़ा सकती है तो दूसरी तरफ सपा इसे भाजपा की चुनावी रणनीति बताते हुए रोजगार, महंगाई, किसान और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को सामने रख सकती है।
अखिलेश यादव की पहली प्रतिक्रिया से भी यही संकेत मिलता है।
उन्होंने सीधे यूसीसी के प्रावधानों की चर्चा करने के बजाय भाजपा से उसके पुराने वादों का हिसाब मांगा है।
इससे साफ है कि सपा इस मुद्दे को भाजपा के चुनावी वादों की विश्वसनीयता से जोड़ने की कोशिश कर सकती है।
विपक्ष के दूसरे नेताओं ने भी उठाए सवाल
यूसीसी पर केवल अखिलेश यादव ने ही प्रतिक्रिया नहीं दी है।
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी अमित शाह के बयान का विरोध किया है।
ओवैसी का आरोप है कि भाजपा जिस तरीके से यूसीसी को आगे बढ़ा रही है, उससे धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों से जुड़े सवाल पैदा होते हैं।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 समेत कई संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए भाजपा की नीति पर सवाल उठाए हैं।
वहीं शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत भी अमित शाह के बयान पर राजनीतिक हमला कर चुके हैं।
इस तरह यूसीसी एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बड़े राजनीतिक टकराव का विषय बन गया है।
NDA के भीतर भी एक राय नहीं
अमित शाह के बयान के बाद दिलचस्प स्थिति एनडीए के भीतर भी दिखाई दे रही है।
भाजपा के कुछ सहयोगी दल यूसीसी को लेकर समर्थन में हैं, जबकि कुछ दलों ने सावधानी बरतने और व्यापक चर्चा की जरूरत बताई है।
विशेष रूप से बिहार में जेडीयू नेताओं की प्रतिक्रिया ने राजनीतिक चर्चा बढ़ा दी है।
जेडीयू के कुछ नेताओं ने कहा है कि बिहार की सामाजिक संरचना को देखते हुए इस विषय पर सभी पक्षों से बातचीत जरूरी है।
वहीं टीडीपी और शिवसेना जैसे सहयोगी दलों की ओर से यूसीसी के सिद्धांत को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आई है।
इससे स्पष्ट है कि 21 एनडीए शासित राज्यों में एक समान तरीके से यूसीसी लागू करना राजनीतिक रूप से आसान प्रक्रिया नहीं होगी।
राज्यों के रास्ते आगे बढ़ रही भाजपा
यूसीसी को लेकर भाजपा की रणनीति फिलहाल राज्य-दर-राज्य आगे बढ़ने की दिखाई देती है।
राष्ट्रीय स्तर पर संसद से एक कानून लाने के बजाय अलग-अलग राज्यों में यूसीसी मॉडल तैयार किए जा रहे हैं।
इसका सबसे प्रमुख उदाहरण उत्तराखंड है।
उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता लागू करके भाजपा शासित दूसरे राज्यों के लिए एक मॉडल प्रस्तुत किया।
इसके बाद कई अन्य राज्यों में भी यूसीसी को लेकर समितियां, अध्ययन और राजनीतिक चर्चाएं शुरू हुईं।
अमित शाह का 2029 वाला बयान इसी रणनीति को व्यापक रूप देता है।
आदिवासी समुदायों का सवाल महत्वपूर्ण
यूसीसी लागू करने की चर्चा में सबसे जटिल मुद्दों में आदिवासी समुदायों की परंपराएं शामिल हैं।
देश के अलग-अलग हिस्सों में अनुसूचित जनजातियों की विवाह, विरासत और पारिवारिक व्यवस्था से जुड़ी अपनी पारंपरिक प्रथाएं हैं।
इसी वजह से यूसीसी के अलग-अलग मॉडल में आदिवासी समुदायों को छूट देने का मुद्दा सामने आता रहा है।
अमित शाह ने भी यूसीसी पर चर्चा के दौरान आदिवासी समुदायों की पहचान और परंपराओं की सुरक्षा की बात कही है।
इसलिए यह कहना कि यूसीसी लागू होते ही देश के हर नागरिक पर बिना किसी अपवाद के बिल्कुल समान नियम लागू हो जाएंगे, अभी सही नहीं होगा। वास्तविक व्यवस्था संबंधित राज्य के कानून और उसमें दी गई छूट पर निर्भर करेगी।
उत्तराखंड बना पहला बड़ा मॉडल
उत्तराखंड स्वतंत्र भारत में यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य बना।
वहां विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप समेत कई नागरिक मामलों के लिए नए नियम बनाए गए।
हालांकि अनुसूचित जनजातियों को कानून के दायरे से बाहर रखा गया।
उत्तराखंड के इसी मॉडल को लेकर देश के दूसरे भाजपा शासित राज्यों में चर्चा होती रही है।
लेकिन हर राज्य की सामाजिक संरचना अलग है, इसलिए जरूरी नहीं कि सभी जगह उत्तराखंड का कानून हूबहू लागू किया जाए।
कानून से ज्यादा राजनीतिक लड़ाई
फिलहाल यूसीसी को लेकर बहस केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक भी है।
भाजपा इसे समानता, महिला अधिकार और एक देश में समान नागरिक व्यवस्था से जोड़ती है।
विपक्षी दलों का एक हिस्सा कहता है कि समानता के नाम पर धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
कुछ विपक्षी नेता यह भी आरोप लगाते हैं कि भाजपा चुनाव से पहले यूसीसी जैसे मुद्दों को राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करती है।
इन दोनों राजनीतिक दृष्टिकोणों के बीच आने वाले वर्षों में बहस और तेज होने की संभावना है।
2029 की समयसीमा ने बढ़ाई सियासत
अमित शाह के बयान में सबसे महत्वपूर्ण बात 2029 की समयसीमा है।
उन्होंने इसे अगले लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए शासित राज्यों में लागू करने की बात कही है।
इससे संकेत मिलता है कि आने वाले करीब ढाई वर्षों में अलग-अलग राज्यों में यूसीसी को लेकर राजनीतिक और विधायी गतिविधियां तेज हो सकती हैं।
लेकिन हर राज्य में इसे लागू करने के लिए स्थानीय परिस्थितियों, कानूनी मसौदे और राजनीतिक सहमति जैसे कई पहलुओं पर काम करना होगा।
इसलिए 21 राज्यों में लागू करने का बयान फिलहाल सरकार का घोषित राजनीतिक लक्ष्य है; हर राज्य में कानून कब और किस रूप में लागू होगा, यह संबंधित प्रक्रिया से ही स्पष्ट होगा।
अखिलेश ने दिया भाजपा को सियासी जवाब
अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया ने साफ कर दिया है कि समाजवादी पार्टी इस मुद्दे पर भाजपा को खुला राजनीतिक मैदान नहीं देने वाली।
उनका हमला सीधे भाजपा के पुराने चुनावी वादों पर है।
अखिलेश का कहना है कि पहले सरकार पिछले वादे पूरे करे, उसके बाद नया मुद्दा लेकर आए।
इस प्रतिक्रिया में उन्होंने यूसीसी के कानूनी मसौदे पर विस्तार से बात नहीं की, लेकिन राजनीतिक संदेश साफ रखा।
सपा इसे भाजपा के नए चुनावी एजेंडे के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है।
आगे और तेज होगी बहस
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव और उसके दो साल बाद 2029 का लोकसभा चुनाव होना है।
ऐसे में यूसीसी दोनों चुनावों के बीच एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
भाजपा अगर उत्तर प्रदेश में इसे लागू करने की दिशा में औपचारिक कदम बढ़ाती है तो विधानसभा से लेकर सड़क तक बहस तेज होना तय है।
विपक्ष कानून के मसौदे, अल्पसंख्यकों और आदिवासी समुदायों के अधिकार तथा संविधान के धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी प्रावधानों को लेकर सवाल उठा सकता है।
वहीं भाजपा इसे समान नागरिक अधिकार और महिला सशक्तीकरण के मुद्दे के रूप में पेश कर सकती है।
फिलहाल अमित शाह के बयान पर अखिलेश यादव ने अपनी राजनीतिक लाइन साफ कर दी है—**पहले पुराने वादे पूरे करो, उसके बाद यूसीसी लाओ।**
अब नजर इस बात पर होगी कि उत्तर प्रदेश सरकार यूसीसी की दिशा में कोई औपचारिक कदम उठाती है या फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक बयानबाजी तक ही सीमित रहता है।
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