उत्तर प्रदेश : सहारनपुर में नकली सिक्कों से जुड़े बड़े नेटवर्क के खुलासे के बाद जांच का दायरा बढ़ने की संभावना है। मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए को सौंपे जाने की तैयारी की खबर है। एनआईए की टीम पहले से सहारनपुर में मौजूद बताई जा रही है और मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी जुटाई जा रही है। हालांकि जांच औपचारिक रूप से एनआईए को सौंपे जाने की पुष्टि संबंधित एजेंसी या सरकार के आधिकारिक आदेश से ही मानी जानी चाहिए।
सहारनपुर में सामने आए नकली सिक्कों के मामले ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। शुरुआती जांच में मामला केवल स्थानीय स्तर पर नकली सिक्के बनाने और बाजार में चलाने तक सीमित नहीं होने की आशंका जताई जा रही है। इस नेटवर्क से जुड़े लोगों, सिक्के तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली मशीनों, कच्चे माल और तैयार सिक्कों को बाजार तक पहुंचाने वाले चैनल की जानकारी जुटाई जा रही है।
मामले में पांच आरोपियों की गिरफ्तारी की बात सामने आई है। जांच में नेटवर्क के कथित मास्टरमाइंड के रूप में उपकार लूथरा उर्फ अभय प्रताप का नाम सामने आने की जानकारी है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि नेटवर्क कब से सक्रिय था और इसके तार किन-किन इलाकों तक फैले हुए थे।
एनआईए को जांच सौंपने की तैयारी क्यों?
नकली मुद्रा या सिक्कों से जुड़े मामलों में अगर जांच के दौरान अंतरराज्यीय, संगठित नेटवर्क या राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कोई गंभीर पहलू सामने आता है तो केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। सहारनपुर के मामले में भी नेटवर्क के संभावित विस्तार को देखते हुए जांच को बड़े स्तर पर ले जाने की चर्चा है।
एनआईए की टीम के सहारनपुर में डेरा डालने की खबरों के बीच स्थानीय स्तर पर जुटाए गए रिकॉर्ड और आरोपियों से संबंधित जानकारियों का अध्ययन किए जाने की बात सामने आ रही है। एजेंसी इस पूरे मामले में किन बिंदुओं की जांच कर रही है, इसकी आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट होगी।
कम लागत में तैयार किए जाते थे सिक्के
इस मामले में सामने आए सबसे चौंकाने वाले दावों में नकली सिक्कों को तैयार करने की लागत और उनकी सप्लाई से जुड़ी जानकारी शामिल है। बताया जा रहा है कि 20 रुपये के सिक्के को तैयार करने में करीब छह रुपये की लागत आती थी। इसके बाद इसे कथित तौर पर 12 से 15 रुपये में आगे सप्लाई किया जाता था।
अगर जांच में ये दावे प्रमाणित होते हैं तो इससे पता चलेगा कि नेटवर्क के लिए नकली सिक्के तैयार करना बेहद मुनाफे का सौदा था। असली मुद्रा की तुलना में सिक्कों पर आम लोगों और दुकानदारों का ध्यान भी अपेक्षाकृत कम जाता है। इसी का फायदा उठाकर बड़ी मात्रा में नकली सिक्के बाजार में खपाए जाने की आशंका है।
करोड़ों के नेटवर्क का दावा
इस मामले में नेटवर्क का आकार 70 करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान लगाए जाने की खबर भी सामने आई है। हालांकि इतनी बड़ी रकम के दावे की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। जांच एजेंसियों के लिए अब यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि वास्तव में कितने नकली सिक्के तैयार किए गए, कितने बाजार में पहुंचाए गए और उनसे कितनी रकम अर्जित की गई।
जांच के दौरान बरामद दस्तावेज और डिजिटल रिकॉर्ड इस सवाल का जवाब देने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। बताया गया है कि कार्रवाई के दौरान सात रजिस्टर और आठ मोबाइल फोन भी बरामद किए गए हैं। इनकी जांच से लेन-देन, संपर्कों और संभावित ग्राहकों या सप्लायरों के बारे में जानकारी मिल सकती है।
मोबाइल और रजिस्टर खोल सकते हैं नेटवर्क का राज
इस तरह के संगठित मामले में डिजिटल और दस्तावेजी साक्ष्य बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। बरामद मोबाइल फोन की फोरेंसिक जांच से कॉल रिकॉर्ड, चैट, डिजिटल भुगतान और दूसरे संपर्कों के बारे में सुराग मिल सकते हैं। वहीं रजिस्टर में अगर लेन-देन या सप्लाई का हिसाब दर्ज है तो नेटवर्क की वास्तविक पहुंच का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
जांच एजेंसियां यह भी पता लगा सकती हैं कि आरोपियों के संपर्क किन राज्यों या शहरों में थे। अगर अन्य राज्यों से जुड़े लोगों की भूमिका सामने आती है तो जांच का दायरा सहारनपुर से बाहर भी बढ़ सकता है।
कहां खपाए जाते थे नकली सिक्के?
जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि कथित तौर पर तैयार किए गए नकली सिक्के आखिर बाजार तक कैसे पहुंचते थे। आम तौर पर सिक्कों का इस्तेमाल छोटे लेन-देन, बाजार, दुकानों, सार्वजनिक परिवहन और दूसरी दैनिक जरूरतों में बड़ी संख्या में होता है। ऐसे में नकली सिक्कों की पहचान हर बार आसानी से नहीं हो पाती।
जांच में यह पता लगाना जरूरी होगा कि क्या नेटवर्क के पास नकली सिक्के बाजार में पहुंचाने के लिए अलग-अलग एजेंट या सप्लायर मौजूद थे। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि सिक्कों की सप्लाई केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित थी या दूसरे राज्यों तक भी पहुंच रही थी।
मशीन और कच्चे माल की सप्लाई भी जांच के घेरे में
नकली सिक्के तैयार करने के लिए मशीनरी, धातु और डिजाइन संबंधी उपकरणों की जरूरत होती है। ऐसे में जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह भी होगा कि आरोपियों को मशीनें और कच्चा माल कहां से मिला।
अगर विशेष मशीनरी खरीदी गई थी तो उसके विक्रेता और भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड की जांच की जा सकती है। इसी तरह सिक्कों में इस्तेमाल सामग्री की खरीद के स्रोत का पता लगाने से नेटवर्क की सप्लाई चेन तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
मास्टरमाइंड के नेटवर्क की पड़ताल
मामले में उपकार लूथरा उर्फ अभय प्रताप को कथित मास्टरमाइंड बताए जाने के बाद उसके पुराने संपर्क और गतिविधियां भी जांच के दायरे में आ सकती हैं। उसके संपर्क में रहने वाले लोगों, आर्थिक लेन-देन और संभावित सहयोगियों की भूमिका की पड़ताल की जा सकती है।
जांच एजेंसियों के लिए यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि नेटवर्क में किस व्यक्ति की क्या जिम्मेदारी थी। कौन सिक्के तैयार करता था, कौन कच्चा माल उपलब्ध कराता था और कौन उन्हें बाजार तक पहुंचाता था, इन सभी सवालों के जवाब पूरे नेटवर्क की संरचना सामने ला सकते हैं।
जांच आगे बढ़ने पर हो सकते हैं और खुलासे
सहारनपुर के नकली सिक्का मामले में जांच अभी महत्वपूर्ण दौर में है। बरामद मोबाइल, रजिस्टर, मशीनरी और अन्य साक्ष्यों की विस्तृत जांच के बाद नए नाम सामने आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। आरोपियों से पूछताछ के आधार पर अन्य स्थानों पर भी कार्रवाई हो सकती है।
एनआईए को जांच सौंपे जाने की तैयारी की खबर के बाद मामला और महत्वपूर्ण हो गया है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक आदेश या एनआईए की औपचारिक पुष्टि का इंतजार करना जरूरी है। अगर केंद्रीय एजेंसी को जांच सौंपी जाती है तो पूरे नेटवर्क के अंतरराज्यीय संपर्क, वित्तीय लेन-देन और अन्य संभावित पहलुओं की जांच का दायरा बढ़ सकता है।
फिलहाल सहारनपुर से सामने आया नकली सिक्कों का यह मामला सामान्य जालसाजी से कहीं बड़े संगठित नेटवर्क की ओर इशारा करने का दावा कर रहा है। जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा कि नेटवर्क वास्तव में कितना बड़ा था और बाजार में कितनी मात्रा में नकली सिक्के पहुंचाए गए थे।