प्रयागराज :  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 30 वर्ष पुराने एक बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में अहम फैसला सुनाते हुए तीन आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल अंतिम बार मृतकों के साथ देखे जाने के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उसके समर्थन में अन्य मजबूत और विश्वसनीय परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद न हों।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने फर्रुखाबाद जिले के नवाबगंज थाना क्षेत्र में वर्ष 1996 में हुए दोहरे हत्याकांड में सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने जीवित बचे तीन आरोपितों शिवपाल, नर सिंह उर्फ नैया और धर्मवीर उर्फ धर्मपाल की अपील स्वीकार करते हुए उन्हें बरी करने का आदेश दिया।

यह मामला 11 दिसंबर 1996 को हुए सोबरन और अवधेश की हत्या से जुड़ा था। दोनों के शव गेहूं के खेत में बरामद हुए थे। इस घटना के बाद पुलिस ने कई लोगों को आरोपित बनाया था। मामले की सुनवाई के बाद वर्ष 2000 में सत्र न्यायालय ने छह आरोपितों को दंगा और हत्या के आरोप में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

सजा के खिलाफ आरोपितों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। अपील लंबित रहने के दौरान तीन आरोपितों की मृत्यु हो गई, जबकि एक आरोपित को किशोर घोषित कर दिया गया। इसके बाद हाईकोर्ट में केवल तीन जीवित आरोपितों की अपील पर सुनवाई हुई।

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों की समीक्षा की। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन का पूरा मामला मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और ‘अंतिम बार साथ देखे जाने’ के सिद्धांत पर आधारित था। हालांकि, अदालत ने कहा कि इस तरह के साक्ष्य तभी प्रभावी हो सकते हैं, जब परिस्थितियों की पूरी कड़ी एक-दूसरे से जुड़ी हो और आरोपित की संलिप्तता स्पष्ट रूप से साबित हो।

खंडपीठ ने कहा कि जिन गवाहों के आधार पर आरोपितों को मृतकों के साथ अंतिम बार देखे जाने की बात कही गई थी, उनके बयान पूरी तरह विश्वसनीय नहीं पाए गए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि गवाहों ने वास्तव में मृतकों को आरोपितों के साथ देखा था तो उन्हें तुरंत इसकी जानकारी मृतकों के परिवार या पुलिस को देनी चाहिए थी। ऐसा नहीं किया जाना उनके बयानों को संदेह के घेरे में लाता है।

अदालत ने हथियारों की बरामदगी को लेकर भी अभियोजन के तर्कों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि केवल हथियारों पर मानव रक्त पाए जाने से अपराध साबित नहीं हो जाता। यह साबित करना जरूरी था कि बरामद हथियारों पर मिला रक्त मृतकों का ही था। इसके अलावा हथियारों की बरामदगी से संबंधित आवश्यक प्रकटीकरण बयान भी रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था, जिससे यह साक्ष्य भी कमजोर हो गया।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि केवल अनुमान या संदेह के आधार पर नहीं की जा सकती। अभियोजन को आरोप सिद्ध करने के लिए ठोस, स्पष्ट और भरोसेमंद साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं। यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला अधूरी हो तो उसका लाभ आरोपितों को दिया जाना चाहिए।

खंडपीठ ने कहा कि इस मामले में अभियोजन पक्ष आरोपितों के खिलाफ ऐसी मजबूत साक्ष्य श्रृंखला स्थापित करने में असफल रहा, जिससे उनकी दोषसिद्धि को कायम रखा जा सके। इसलिए सत्र न्यायालय का फैसला कानून की कसौटी पर टिकाऊ नहीं है।

इसके बाद हाईकोर्ट ने तीनों आरोपितों की आजीवन कारावास की सजा रद्द कर दी और उन्हें बरी करने का आदेश दिया। अदालत ने उनके जमानती बंधपत्र भी समाप्त करने के निर्देश दिए।

हाईकोर्ट का यह फैसला एक बार फिर इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि केवल किसी व्यक्ति का घटनास्थल से जुड़ा होना या अंतिम बार साथ देखा जाना ही अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने साफ किया कि दोषसिद्धि के लिए हर परिस्थिति का प्रमाणित और विश्वसनीय होना जरूरी है।

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