लखनऊ। उत्तर प्रदेश में किराए पर मकान, दुकान या दूसरी संपत्ति लेने और देने वालों के लिए राहत की दिशा में योगी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार किरायेदारी व्यवस्था को ज्यादा सरल, पारदर्शी और कानूनी रूप से सुरक्षित बनाने पर काम कर रही है। किरायानामा यानी रेंट एग्रीमेंट से जुड़ी स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस का बोझ कम करने की व्यवस्था से मकान मालिक और किरायेदार दोनों को फायदा मिलने की उम्मीद है।
उत्तर प्रदेश में लंबे समय से बड़ी संख्या में मकान और दुकानें किराए पर दी जाती हैं, लेकिन कई मामलों में किरायानामा पंजीकृत नहीं कराया जाता। इसकी बड़ी वजह रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया और उस पर आने वाला खर्च माना जाता रहा है।
योगी सरकार ने इसी समस्या को देखते हुए 10 वर्ष तक की अवधि वाले किरायानामा विलेखों के लिए स्टाम्प शुल्क और रजिस्ट्रेशन फीस में राहत देने का फैसला किया था। इसका उद्देश्य लोगों को मौखिक किरायेदारी के बजाय लिखित और पंजीकृत समझौते की तरफ प्रोत्साहित करना है।
क्यों जरूरी था बदलाव?
उत्तर प्रदेश के लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर, वाराणसी, प्रयागराज, आगरा और गोरखपुर जैसे बड़े शहरों में किराए के मकानों की बड़ी मांग है।
पढ़ाई, नौकरी और कारोबार के लिए बड़ी संख्या में लोग दूसरे शहरों में रहते हैं।
लेकिन किरायेदारी के दौरान सबसे ज्यादा विवाद सिक्योरिटी डिपॉजिट, किराया बढ़ाने, मकान खाली कराने, बिजली-पानी के बिल और संपत्ति को हुए नुकसान को लेकर सामने आते हैं।
अगर मकान मालिक और किरायेदार के बीच स्पष्ट लिखित समझौता न हो तो विवाद होने पर दोनों पक्षों के लिए अपनी बात साबित करना मुश्किल हो सकता है।
सरकार की कोशिश है कि रेंट एग्रीमेंट बनवाना और उसका पंजीकरण कराना इतना महंगा या जटिल न रहे कि लोग उससे बचने लगें।
10 साल तक के किरायानामे पर राहत
योगी कैबिनेट ने नवंबर 2025 में 10 वर्ष तक की अवधि वाले किरायानामा विलेखों पर स्टाम्प शुल्क और रजिस्ट्रेशन फीस में व्यापक राहत देने का फैसला किया था।
सरकार ने औसत वार्षिक किराया और किरायेदारी की अवधि के आधार पर शुल्क की अधिकतम सीमा निर्धारित करने की व्यवस्था बनाई।
इसके लिए वार्षिक किराए की सीमा ₹10 लाख रखे जाने की जानकारी सामने आई थी। टोल और खनन पट्टों को इस राहत के दायरे से अलग रखा गया था।
इसका सीधा उद्देश्य यह है कि सामान्य मकान, दुकान या दूसरी पात्र संपत्ति के किरायानामे को कानूनी रूप देने की लागत कम हो।
क्यों रजिस्ट्रेशन से बचते थे लोग?
एक वर्ष से ज्यादा अवधि वाले किरायानामों के पंजीकरण से जुड़ी कानूनी आवश्यकताएं पहले से मौजूद हैं।
लेकिन व्यवहार में बहुत से मकान मालिक और किरायेदार मौखिक समझौता कर लेते हैं या ऐसा एग्रीमेंट बनाते हैं जिसका पंजीकरण नहीं कराया जाता।
सरकार के आकलन में ज्यादा शुल्क भी इसका एक कारण था।
इसका नुकसान तब सामने आता है जब दोनों पक्षों के बीच विवाद पैदा हो जाता है।
किराया कितना तय हुआ था, मकान कितने समय के लिए दिया गया था और दूसरी शर्तें क्या थीं—इन सवालों पर विवाद हो सकता है।
लिखित और विधिवत समझौता इन स्थितियों में महत्वपूर्ण सबूत बनता है।
मकान मालिक को क्या फायदा?
नई व्यवस्था का फायदा केवल किरायेदारों को नहीं बल्कि मकान मालिकों को भी मिल सकता है।
मकान मालिक के पास स्पष्ट दस्तावेज होगा कि उसने संपत्ति किस व्यक्ति को, कितने किराए और कितनी अवधि के लिए दी है।
समझौते में किराया जमा करने की तारीख, सिक्योरिटी डिपॉजिट, बिजली-पानी के भुगतान और मकान खाली करने की शर्तें लिखी जा सकती हैं।
अगर किरायेदार निर्धारित समय पर किराया नहीं देता या समझौते की शर्तों का उल्लंघन करता है तो लिखित अनुबंध मकान मालिक के लिए कानूनी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकता है।
किरायेदार को भी मिलेगी सुरक्षा
रेंट एग्रीमेंट केवल मकान मालिक की सुरक्षा के लिए नहीं होता।
इससे किरायेदार को भी कई महत्वपूर्ण अधिकारों का दस्तावेजी आधार मिलता है।
किराया कितना है, कितनी अवधि तक रहना है, सिक्योरिटी कितनी जमा की गई है और मकान मालिक किन परिस्थितियों में संपत्ति खाली करने को कह सकता है—इन बातों को समझौते में दर्ज किया जा सकता है।
इससे अचानक किराया बढ़ाने या दूसरी शर्त बदलने को लेकर होने वाले विवाद कम किए जा सकते हैं।
पहले से है यूपी का किरायेदारी कानून
उत्तर प्रदेश में **उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021** लागू है।
यह कानून नगर निगम क्षेत्रों, नगर पालिका क्षेत्रों, विकास क्षेत्रों, विशेष विकास क्षेत्रों और अधिसूचित औद्योगिक विकास क्षेत्रों समेत निर्धारित शहरी इलाकों में लागू होता है।
इस कानून का उद्देश्य मकान मालिक और किरायेदार के बीच संबंधों को स्पष्ट करना और किरायेदारी से जुड़े विवादों के समाधान के लिए व्यवस्था उपलब्ध कराना है।
इसलिए मौजूदा बदलाव को पूरे किरायेदारी कानून को पहली बार बनाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
असल जोर किरायानामा प्रक्रिया को ज्यादा व्यवहारिक बनाने और पंजीकरण को प्रोत्साहित करने पर है।
लिखित एग्रीमेंट क्यों महत्वपूर्ण?
किराए पर मकान देते समय अक्सर दोनों पक्ष केवल भरोसे के आधार पर सौदा कर लेते हैं।
शुरुआत में कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन कुछ महीनों या वर्षों बाद विवाद हो सकता है।
मान लीजिए मकान मालिक कहता है कि किराया ₹15 हजार था और किरायेदार का दावा है कि ₹12 हजार तय हुआ था।
अगर कोई लिखित दस्तावेज नहीं है तो विवाद बढ़ सकता है।
इसी तरह सिक्योरिटी डिपॉजिट लौटाने को लेकर भी परेशानी होती है।
लिखित किरायानामा इन शर्तों को पहले से स्पष्ट कर सकता है।
किराया मनमाने तरीके से बढ़ाने पर पहले से नियम
उत्तर प्रदेश के 2021 के किरायेदारी कानून में किराया संशोधन की व्यवस्था भी मौजूद है।
किराए में बदलाव मुख्य रूप से मकान मालिक और किरायेदार के बीच हुए किरायेदारी समझौते की शर्तों के अनुसार होना है। विवाद होने की स्थिति में रेंट अथॉरिटी की भूमिका भी निर्धारित की गई है।
इससे पहले 2021 में कानून लाते समय आवासीय परिसर में सालाना पांच प्रतिशत और गैर-आवासीय परिसर में सात प्रतिशत तक वृद्धि की व्यवस्था की खबरें सामने आई थीं।
इसलिए सोशल मीडिया पर चलने वाली ऐसी जानकारी कि मकान मालिक अब किसी भी स्थिति में किराया नहीं बढ़ा सकता, सही नहीं है।
सिक्योरिटी डिपॉजिट पर भी व्यवस्था
2021 के किरायेदारी कानून में सिक्योरिटी डिपॉजिट से जुड़ी सीमा भी तय की गई थी।
आवासीय परिसर के लिए दो महीने से अधिक का किराया सिक्योरिटी डिपॉजिट के रूप में नहीं लेने और गैर-आवासीय परिसर के लिए छह महीने तक की सीमा की व्यवस्था बताई गई थी।
इस प्रावधान का उद्देश्य किरायेदार पर शुरुआत में पड़ने वाले भारी आर्थिक बोझ को नियंत्रित करना था।
बड़े शहरों में कई बार मकान मालिक कई महीनों का किराया एडवांस मांगते हैं। कानूनी व्यवस्था इस तरह के मामलों में दोनों पक्षों के अधिकार और दायित्व स्पष्ट करती है।
किराया न देने पर मकान मालिक के भी अधिकार
किरायेदारी कानून केवल किरायेदारों को सुरक्षा देने वाला कानून नहीं है।
इसमें मकान मालिक के हितों की रक्षा के लिए भी प्रावधान हैं।
2021 में लागू व्यवस्था के तहत लगातार दो महीने तक किराया नहीं देने जैसी परिस्थितियों में मकान मालिक को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई का अधिकार दिया गया था।
किरायेदार भी बिना अनुमति संपत्ति में मनमाने बदलाव या निर्माण नहीं कर सकता।
यानी कानून का उद्देश्य किसी एक पक्ष को फायदा पहुंचाना नहीं बल्कि दोनों पक्षों के बीच जिम्मेदारियां तय करना है।
विवाद होने पर कहां जाएंगे?
पुरानी व्यवस्था में किरायेदारी विवाद लंबे समय तक सामान्य अदालतों में चलते रहने की समस्या सामने आती थी।
इसीलिए उत्तर प्रदेश के किरायेदारी कानून में रेंट अथॉरिटी और रेंट ट्रिब्यूनल जैसी व्यवस्थाएं रखी गईं।
इनका उद्देश्य किराया और किरायेदारी से जुड़े विवादों का विशेष व्यवस्था के तहत समाधान करना है।
2021 में कानून बनाते समय रेंट ट्रिब्यूनल के जरिए विवादों का समयबद्ध निस्तारण करने की व्यवस्था बताई गई थी।
अगर ज्यादा लोग औपचारिक किरायानामा बनवाते हैं तो विवाद होने की स्थिति में संबंधित प्राधिकरण के सामने शर्तों को साबित करना भी आसान हो सकता है।
नोएडा-गाजियाबाद में बड़ा असर
उत्तर प्रदेश के एनसीआर वाले क्षेत्रों में इस व्यवस्था का असर ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।
नोएडा और गाजियाबाद में लाखों लोग रोजगार और कारोबार के कारण किराए के मकानों में रहते हैं।
यहां फ्लैट, पीजी, दुकान और ऑफिस स्पेस का बड़ा रेंटल मार्केट है।
इसी तरह लखनऊ में सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों तथा छात्रों की बड़ी संख्या किराए पर रहती है।
अगर किरायानामा पंजीकरण की लागत और प्रक्रिया सरल होती है तो ऐसे शहरों में औपचारिक रेंट एग्रीमेंट की संख्या बढ़ सकती है।
सरकार को भी होगा फायदा
रजिस्टर्ड किरायेदारी से सरकार के पास रेंटल मार्केट का ज्यादा व्यवस्थित रिकॉर्ड उपलब्ध हो सकता है।
इससे संपत्ति विवाद और कम स्टाम्प शुल्क से जुड़े मामलों में भी पारदर्शिता बढ़ सकती है।
नवंबर 2025 के फैसले के पीछे सरकार का तर्क था कि ज्यादा शुल्क के कारण लोग रजिस्ट्री से बच रहे थे और बाद में कम स्टाम्प शुल्क से संबंधित वसूली तथा विवाद पैदा होते थे।
शुल्क कम या सीमित करके सरकार ज्यादा लोगों को औपचारिक व्यवस्था में लाना चाहती है।
क्या अब रेंट एग्रीमेंट जरूरी नहीं होगा?
**नहीं।**
इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि रेंट एग्रीमेंट या जरूरी पंजीकरण की व्यवस्था खत्म कर दी गई है।
सरकार का उद्देश्य किरायानामा बनाना और पंजीकृत कराना ज्यादा आसान तथा कम खर्चीला बनाना है।
इसलिए “यूपी में अब बिना रेंट एग्रीमेंट के आसानी से मकान किराए पर दिया जा सकेगा” जैसी हेडलाइन भ्रामक होगी।
उल्टा सरकार लंबे समय से लिखित किरायेदारी को बढ़ावा देती रही है।
ऑनलाइन प्रक्रिया से भविष्य में और आसानी
रजिस्ट्रेशन विभाग की सेवाओं के डिजिटलीकरण से किरायानामा प्रक्रिया को और आसान बनाने की संभावना है।
अगर दस्तावेज तैयार करने, शुल्क जमा करने और रजिस्ट्रेशन से जुड़े ज्यादा चरण ऑनलाइन उपलब्ध होते हैं तो मकान मालिक और किरायेदार को कार्यालयों के चक्कर कम लगाने पड़ सकते हैं।
हालांकि 15 सितंबर के ताजा कैबिनेट फैसले में ऑनलाइन प्रक्रिया के किन नए चरणों को मंजूरी मिली है, इसकी पूरी आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही इसे निश्चित रूप से लिखा जाना चाहिए।
पुराने विवाद भी नहीं होंगे अपने आप खत्म
नई व्यवस्था आने का मतलब यह भी नहीं है कि पहले से चल रहे मकान मालिक-किरायेदार विवाद अपने आप खत्म हो जाएंगे।
पुराने मामलों का समाधान उस समय लागू कानून, समझौते और संबंधित न्यायिक या किराया प्राधिकरण की प्रक्रिया के अनुसार होगा।
नई शुल्क व्यवस्था मुख्य रूप से भविष्य में ज्यादा लोगों को औपचारिक किरायेदारी समझौता करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।
चुनाव से पहले सरकार के कई बड़े फैसले
उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में योगी सरकार की कैबिनेट बैठकों में किसानों, पीआरडी जवानों, कारोबारियों और आम नागरिकों से जुड़े फैसलों पर राजनीतिक नजर भी बनी हुई है।
किरायेदारी व्यवस्था में राहत खास तौर पर शहरी मध्यम वर्ग, नौकरीपेशा लोगों, छात्रों और मकान मालिकों से जुड़ा मुद्दा है।
यूपी में तेजी से बढ़ते शहरों के कारण किराए के आवास की मांग लगातार बढ़ रही है।
ऐसे में किरायेदारी को कानूनी और सरल बनाना शहरी प्रशासन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
मकान मालिक और किरायेदार दोनों को फायदा
सरकार की कोशिश सफल होती है तो इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि मौखिक किरायेदारी की जगह लिखित समझौते बढ़ेंगे।
मकान मालिक के पास किरायेदार और किराए की स्पष्ट जानकारी होगी।
किरायेदार के पास भी जमा सिक्योरिटी, किराया, अवधि और दूसरी शर्तों का प्रमाण होगा।
विवाद होने पर दोनों पक्षों के पास लिखित दस्तावेज मौजूद रहेगा।
इसी कारण स्टाम्प शुल्क और रजिस्ट्रेशन फीस में राहत को केवल शुल्क घटाने का फैसला नहीं बल्कि रेंटल मार्केट को औपचारिक बनाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
फिलहाल महत्वपूर्ण बात यही है कि उत्तर प्रदेश में रेंट एग्रीमेंट की जरूरत खत्म नहीं हुई है। बल्कि सरकार की दिशा इसे **सस्ता, सरल और ज्यादा औपचारिक** बनाने की है।
विस्तृत नई व्यवस्था की दरें, पात्रता और लागू होने की प्रक्रिया संबंधित शासनादेश और रजिस्ट्रेशन विभाग के निर्देशों से पूरी तरह स्पष्ट होगी। मकान किराए पर लेने या देने वाले लोगों को अंतिम दस्तावेज तैयार करने से पहले नवीनतम सरकारी दर और नियम जरूर जांचने चाहिए।