जालौन: समाज कल्याण विभाग में भ्रष्टाचार का खुलासा कर चर्चा में आए आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही ने एक बार फिर सरकारी व्यवस्था में चल रहे कथित भ्रष्टाचार पर सवाल खड़े किए हैं। जालौन में संयुक्त मजिस्ट्रेट (एसडीएम न्यायिक, उरई) के पद पर तैनात रिंकू सिंह राही ने परिवहन विभाग में आउटसोर्सिंग के नाम पर चल रहे एक बड़े खेल का पर्दाफाश किया है।

रिंकू सिंह राही का नाम पहले भी भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सुर्खियों में रहा है। पीसीएस अधिकारी रहते हुए उन्होंने समाज कल्याण विभाग में हुए कथित घोटाले का खुलासा किया था, जिसके बाद उन पर हमला हुआ था और उन्हें सात गोलियां लगी थीं। अब आईएएस बनने के बाद उन्होंने सरकारी कार्यालयों में टेंडर प्रक्रिया के नाम पर चल रहे कथित भ्रष्टाचार की ओर ध्यान आकर्षित किया है।

आउटसोर्सिंग प्रक्रिया पर उठाए सवाल

रिंकू सिंह राही ने परिवहन विभाग में कर्मचारियों की आउटसोर्सिंग व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग के नाम पर ऐसी प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जिसमें पारदर्शिता के दावों के बावजूद गड़बड़ी की गुंजाइश बनी रहती है।

उन्होंने इस पूरे मामले में टेंडर व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए बताया कि कैसे कुछ प्रक्रियाएं नियमों की आड़ में ऐसे लोगों को फायदा पहुंचा सकती हैं, जो पहले से तय तरीके से काम हासिल करने की कोशिश करते हैं।

जेम पोर्टल की व्यवस्था पर सवाल

सरकारी खरीद और टेंडर प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से शुरू किए गए जेम यानी गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस पोर्टल को सरकार एक भरोसेमंद डिजिटल प्लेटफॉर्म मानती है। लेकिन रिंकू सिंह राही ने जिस मामले को सामने रखा है, उससे इस व्यवस्था के इस्तेमाल को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।

उनका कहना है कि जेम पोर्टल की व्यवस्था का उद्देश्य भ्रष्टाचार रोकना और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया को बढ़ावा देना है, लेकिन अगर नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया जाए तो डिजिटल प्लेटफॉर्म भी भ्रष्टाचार का माध्यम बन सकता है।

सरकारी दफ्तरों में टेंडर व्यवस्था पर बहस

इस मामले के सामने आने के बाद सरकारी विभागों में टेंडर प्रक्रिया और आउटसोर्सिंग व्यवस्था को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी प्रक्रिया में सिर्फ तकनीकी प्लेटफॉर्म पर्याप्त नहीं होता, बल्कि निगरानी और जवाबदेही भी जरूरी होती है।

आउटसोर्सिंग के जरिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है। ऐसे में चयन प्रक्रिया, एजेंसियों की भूमिका और भुगतान व्यवस्था में पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ पहले भी उठाई आवाज

रिंकू सिंह राही पहले भी भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को लेकर चर्चा में रहे हैं। समाज कल्याण विभाग में तैनाती के दौरान उन्होंने कथित घोटाले का खुलासा किया था। इस दौरान उन्हें जानलेवा हमले का सामना करना पड़ा था।

सात गोलियां लगने के बाद भी उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखी। उनके इस साहस के कारण उन्हें प्रशासनिक हलकों में एक ईमानदार और सख्त अधिकारी के रूप में पहचान मिली।

व्यवस्था में सुधार की जरूरत

रिंकू सिंह राही के इस खुलासे के बाद अब सवाल यह है कि सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग और टेंडर प्रक्रिया को और मजबूत कैसे बनाया जाए। जानकारों का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ-साथ अधिकारियों की निगरानी, दस्तावेजों की जांच और समय-समय पर ऑडिट जरूरी है।

सरकार की ओर से लगातार ई-टेंडरिंग और डिजिटल खरीद व्यवस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि भ्रष्टाचार की संभावनाओं को कम किया जा सके। लेकिन ऐसे मामलों से यह साफ होता है कि सिर्फ तकनीक के भरोसे पूरी व्यवस्था को पारदर्शी नहीं बनाया जा सकता।

जांच और कार्रवाई पर नजर

फिलहाल रिंकू सिंह राही द्वारा उठाए गए मुद्दे के बाद परिवहन विभाग की आउटसोर्सिंग व्यवस्था चर्चा में आ गई है। अब देखना होगा कि इस मामले में आगे क्या कदम उठाए जाते हैं और क्या किसी स्तर पर जिम्मेदारी तय होती है।

रिंकू सिंह राही का यह कदम एक बार फिर सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस छेड़ चुका है। समाज कल्याण विभाग के घोटाले से लेकर अब परिवहन विभाग की आउटसोर्सिंग व्यवस्था तक, उनका रुख भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई की दिशा में माना जा रहा है।

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