मुजफ्फरनगर: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में साइबर क्राइम पुलिस ने भारतीय मोबाइल नंबरों पर व्हाट्सएप चलाने के लिए विदेश में बैठे साइबर अपराधियों को ओटीपी उपलब्ध कराने वाले कथित नेटवर्क का खुलासा किया है। पुलिस ने शाहपुर थाना क्षेत्र के हरसौली गांव निवासी मोनू और कबीर को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि दोनों स्थानीय लोगों के नाम पर सिम कार्ड निकलवाकर सक्रिय करते थे और उन नंबरों पर आने वाले व्हाट्सएप ओटीपी थाईलैंड समेत अन्य देशों में बैठे साथियों को भेजते थे। इन नंबरों से जुड़े दो मामलों में कुल 53 लाख 83 हजार 822 रुपये की धोखाधड़ी सामने आई है। एसपी क्राइम इंदु सिद्धार्थ के अनुसार, गृह मंत्रालय के प्रतिबिंब पोर्टल पर मिली शिकायतों से जांच की शुरुआत हुई। शिकायतों में व्हाट्सएप कॉल और संदेशों के जरिए साइबर धोखाधड़ी किए जाने की जानकारी थी। संबंधित मोबाइल नंबरों की पड़ताल में पुलिस को पता चला कि कुछ सिम मुजफ्फरनगर के शाहपुर क्षेत्र में सक्रिय किए गए थे। इसके बाद इन नंबरों को सक्रिय कराने और उनसे जुड़े ओटीपी साझा करने वालों की पहचान की गई। पुलिस ने जांच के आधार पर दोनों आरोपियों को बरवाला रोड से गिरफ्तार किया। उनके कब्जे से दो मोबाइल फोन बरामद हुए हैं।  
आरोपियों का तरीका परिचितों का भरोसा हासिल करने पर आधारित था। वे निजी जरूरत बताकर लोगों से उनके नाम पर सिम कार्ड निकलवाते थे। कुछ मामलों में दोस्ती और जान-पहचान का सहारा लिया जाता था, जबकि कुछ लोगों को सिम के बदले 500 से 700 रुपये दिए जाने की जानकारी मिली है। सिम मिलने के बाद आरोपी उसे स्थानीय स्तर पर सक्रिय करते थे। पुलिस अब संबंधित सिम धारकों की भूमिका भी जांच रही है, ताकि स्पष्ट हो सके कि उन्हें नंबरों के वास्तविक इस्तेमाल की कितनी जानकारी थी। आरोप है कि सिम सक्रिय होने के बाद व्हाट्सएप खाते के पंजीकरण या लॉगिन के लिए आने वाला ओटीपी विदेश भेज दिया जाता था। इसकी मदद से बाहर बैठे साथी भारतीय मोबाइल नंबर पर व्हाट्सएप संचालित करते थे। इसके बाद इन्हीं खातों से भारत में लोगों को कॉल और संदेश भेजकर संपर्क किया जाता था। पुलिस के अनुसार, स्थानीय आरोपियों की भूमिका मोबाइल नंबर और ओटीपी उपलब्ध कराने की थी, जबकि विदेश में बैठे लोग इन खातों का इस्तेमाल धोखाधड़ी में करते थे। दोनों स्तरों के बीच संपर्क की कड़ियां खंगाली जा रही हैं। 
अब तक सामने आए मामलों में एक शिकायत झारखंड और दूसरी पश्चिम बंगाल से संबंधित है। पुलिस ने इन दोनों शिकायतों में दर्ज कुल 53,83,822 रुपये की ठगी का संबंध आरोपियों द्वारा सक्रिय कराए गए नंबरों पर चल रहे व्हाट्सएप खातों से जोड़ा है। हालांकि, यह राशि अभी सामने आई दो शिकायतों से संबंधित है। अन्य नंबरों के इस्तेमाल और उनसे जुड़े संभावित पीड़ितों का पता लगाने की प्रक्रिया जारी है। आगे की जांच में ही स्पष्ट होगा कि नेटवर्क का दायरा इन दो मामलों तक सीमित था या अन्य घटनाएं भी इससे जुड़ी हैं। 
बरामद मोबाइल फोन की जांच में करीब 70 सिम कार्ड सक्रिय किए जाने की जानकारी मिलने का दावा किया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पुलिस ने मौके से 70 भौतिक सिम कार्ड बरामद किए हैं। उपलब्ध विवरण में दो मोबाइल फोन की बरामदगी और उनसे सिम सक्रिय होने संबंधी जानकारी का उल्लेख है। जांचकर्ता यह पता लगा रहे हैं कि इनमें से कितने नंबर विदेश में बैठे लोगों को उपलब्ध कराए गए और कितने नंबरों पर व्हाट्सएप खाते संचालित हुए। प्रत्येक नंबर की संबंधित शिकायतों से कड़ी जोड़ना जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 
इस प्रकरण में साइबर क्राइम थाने में मुकदमा अपराध संख्या 39/2026 दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4), 3(5) और 111 के तहत मामला पंजीकृत हुआ है। पुलिस गिरफ्तार आरोपियों के अतिरिक्त अन्य संदिग्धों की भूमिका की भी पड़ताल कर रही है। खास तौर पर यह जांचा जा रहा है कि सिम जुटाने के काम में और कौन शामिल था तथा विदेश में बैठे साथियों से संपर्क कैसे स्थापित हुआ। आरोपियों के खिलाफ आगे की विधिक प्रक्रिया जारी है। 
पुलिस की कार्रवाई में साइबर क्राइम थाना प्रभारी निरीक्षक कर्मवीर सिंह, उपनिरीक्षक जय शर्मा, उपनिरीक्षक मुबारिक हसन तथा हेड कांस्टेबल बालकिशन, आकाश चौधरी और सुनील कुमार शामिल रहे। जांच में मोबाइल नंबरों, उपलब्ध शिकायतों और आरोपियों के संपर्कों का मिलान किया जा रहा है। विदेश में बैठे कथित सहयोगियों की पहचान और उनकी भूमिका स्थापित होना भी बाकी है। फिलहाल सामने आए विवरण पुलिस की शुरुआती जांच पर आधारित हैं। आरोपियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया में होगा। 
यह मामला अपने नाम पर जारी मोबाइल सिम किसी दूसरे को इस्तेमाल के लिए देने से जुड़े जोखिम को भी सामने लाता है। कुछ सौ रुपये या परिचय के भरोसे दिया गया नंबर अनजान लोगों तक पहुंच सकता है। ऐसे में सिम धारक और उसका वास्तविक उपयोगकर्ता अलग-अलग हो सकते हैं। इस प्रकरण में भी पुलिस के सामने महत्वपूर्ण सवाल यही है कि नंबर किसके नाम पर जारी हुए और उनका संचालन किसने किया। सभी संबंधित नंबरों की जांच पूरी होने के बाद नेटवर्क की वास्तविक पहुंच और कुल प्रभावित लोगों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
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