ठाकुरजी को माना पति, साध्वी इंदुलेखा ने कान्हा के दर्शन कर खोला करवाचौथ व्रत
मथुरा: ब्रज में कृष्ण भक्ति और समर्पण की एक अनोखी तस्वीर सामने आई है। ठाकुर बांकेबिहारी को पति स्वरूप मानने वाली साध्वी इंदुलेखा ने उनके निमित्त करवाचौथ का निर्जला व्रत रखा। शाम को वह नंदगांव पहुंचीं, जहां पारंपरिक शृंगार और पूजा के बाद छलनी से अपने आराध्य के दर्शन किए। चंद्रमा को अर्घ्य देकर उन्होंने व्रत पूर्ण किया। इंदुलेखा नंदगांव को अपना ससुराल और नंदबाबा तथा मैया यशोदा को सास-ससुर के रूप में मानती हैं।
मूल रूप से हरियाणा के रोहतक की रहने वाली इंदुलेखा पहले नर्स के रूप में कार्य करती थीं। प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, वृंदावन आने के बाद उनका ठाकुर बांकेबिहारी के प्रति लगाव बढ़ा। वर्ष 2024 में उन्होंने कान्हा की प्रतिमा के साथ धार्मिक विवाह किया और उन्हें अपना जीवनसाथी मानकर भक्ति का मार्ग अपना लिया। इसके बाद से वह वृंदावन में रहकर अपने आराध्य की सेवा और उपासना कर रही हैं। इंदुलेखा के लिए करवाचौथ का व्रत अपने आराध्य के प्रति प्रेम व्यक्त करने का माध्यम है। रिपोर्ट के अनुसार, यह उनका दूसरा करवाचौथ व्रत था। उन्होंने ठाकुरजी को पति मानने की अपनी आस्था के अनुरूप व्रत रखा और नंदगांव जाकर उसे पूरा करने का संकल्प लिया। उनके इस धार्मिक भाव में कृष्ण के प्रति समर्पण के साथ उनके परिवार से जुड़ाव की भावना भी दिखाई देती है। नंदबाबा और यशोदा को वह उसी आत्मीय संबंध से देखती हैं।
नंदगांव पहुंचने का कारण बताते हुए इंदुलेखा ने कहा कि वह इसे कन्हैया का पैतृक धाम मानती हैं। उनके अनुसार, जिस तरह एक कुलवधू अपने ससुराल में बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने जाती है, उसी भावना से वह यहां आईं। उनके लिए नंदगांव में पूजा करना अपने आराध्य के परिवार के प्रति सम्मान व्यक्त करना भी है। यह उनका व्यक्तिगत धार्मिक विश्वास और भक्ति का भाव है।
करवाचौथ की शाम उन्होंने पारंपरिक शृंगार के साथ पूजा की रस्में निभाईं। छलनी से ठाकुरजी के दर्शन और चंद्रमा को अर्घ्य देने के साथ व्रत का समापन हुआ। उनकी उपासना को मीराबाई के ‘कांता भाव’ से जोड़कर देखा जा रहा है। इस भाव में भक्त अपने आराध्य को पति स्वरूप मानकर प्रेम और समर्पण व्यक्त करता है। इंदुलेखा की कथा में भी यही व्यक्तिगत आस्था केंद्र में है। सामान्य रूप से करवाचौथ का पर्व दांपत्य संबंध, सौभाग्य और पति की कुशलता की कामना से जुड़ा है। कई परिवारों में चंद्रोदय के बाद पूजा, अर्घ्य और छलनी से दर्शन की परंपरा निभाई जाती है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में रस्मों का स्वरूप भिन्न हो सकता है। इंदुलेखा ने इन्हीं परिचित परंपराओं को अपने कृष्ण भक्ति के भाव से जोड़कर निभाया।