गाजियाबाद : रिश्वत लेने के एक मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत ने उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक की मछरा शाखा, मेरठ के तत्कालीन शाखा प्रबंधक उमेश कुमार सिंघल को दोषी ठहराते हुए चार साल के कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने आरोपी पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
सीबीआई के अनुसार, यह मामला वर्ष 2016 में दर्ज किया गया था। जांच एजेंसी ने बताया कि 28 अप्रैल 2016 को इस संबंध में शिकायत मिलने के बाद मुकदमा दर्ज किया गया था। आरोप था कि उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक की मछरा शाखा के तत्कालीन शाखा प्रबंधक उमेश कुमार सिंघल ने एक ऋण स्वीकृत करने और जारी करने के बदले शिकायतकर्ता से रिश्वत की मांग की थी।
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता ने बैंक शाखा में 'इंदिरा संयुक्त दायित्व समूह' के लिए 2.50 लाख रुपये के ऋण के लिए आवेदन किया था। यह खाता उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक की मछरा शाखा में संचालित था। आरोप था कि ऋण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और राशि जारी करने के लिए शाखा प्रबंधक ने 28 हजार रुपये रिश्वत की मांग की थी।
सीबीआई की जांच में सामने आया कि रिश्वत की मांग को लेकर शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच बातचीत हुई थी। इसके बाद आरोपी शाखा प्रबंधक 25 हजार रुपये रिश्वत लेने के लिए तैयार हो गया था। जांच एजेंसी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कार्रवाई शुरू की और सबूत जुटाए।
सीबीआई ने जांच के दौरान आरोपी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य एकत्र किए। इसके बाद अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया गया। सुनवाई के दौरान सीबीआई ने अपने पक्ष में कई महत्वपूर्ण तथ्य और दस्तावेज पेश किए। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद उमेश कुमार सिंघल को रिश्वत लेने के मामले में दोषी पाया।
विशेष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सरकारी पद पर बैठे अधिकारियों से जनता को ईमानदार और पारदर्शी कार्यप्रणाली की उम्मीद होती है। रिश्वत जैसी गतिविधियां न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करती हैं, बल्कि आम लोगों के अधिकारों को भी नुकसान पहुंचाती हैं। अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को चार साल की सजा सुनाई।
सीबीआई अधिकारियों के अनुसार, भ्रष्टाचार के मामलों में एजेंसी लगातार कार्रवाई कर रही है। सरकारी विभागों और सार्वजनिक संस्थानों में रिश्वतखोरी को रोकने के लिए सीबीआई समय-समय पर जांच और कार्रवाई करती रहती है।
इस मामले में अदालत का फैसला आने के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही कार्रवाई को एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। बैंकिंग क्षेत्र में तैनात अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है कि वे नियमों के अनुसार काम करें और आम लोगों को बिना किसी परेशानी के सेवाएं उपलब्ध कराएं।
गौरतलब है कि ऋण मंजूरी जैसे मामलों में रिश्वत की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियां शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करती हैं और दोष साबित होने पर आरोपियों के खिलाफ कानूनी कदम उठाए जाते हैं।
सीबीआई विशेष अदालत के इस फैसले से यह संदेश गया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। वहीं, सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखने की दिशा में भी इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।