लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। रक्षाबंधन के त्योहार से ठीक पहले प्रदेश की सियासत में महिलाओं को केंद्र में रखकर नई रणनीतियां सामने आने लगी हैं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी (सपा) ने एक ही दिन महिलाओं को साधने के लिए कई घोषणाएं कर चुनावी माहौल को गर्म कर दिया है। दोनों दलों के बीच महिला मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की होड़ तेज हो गई है।

प्रदेश की राजनीति में महिला वोटर हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। पिछले कुछ चुनावों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर किया है। यही वजह है कि चुनावी साल से पहले ही भाजपा और सपा महिलाओं से जुड़े मुद्दों, योजनाओं और सुविधाओं को लेकर सक्रिय नजर आ रही हैं।

भाजपा सरकार होने के कारण उसकी ओर से की गई घोषणाओं को तत्काल लागू करने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। पार्टी सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच ले जाने के साथ-साथ महिला सुरक्षा, आत्मनिर्भरता, रोजगार और कल्याणकारी योजनाओं को अपनी ताकत के रूप में पेश कर रही है। भाजपा का प्रयास है कि महिलाओं के बीच सरकार की योजनाओं का सीधा लाभ पहुंचने की बात को मजबूत तरीके से रखा जाए।

वहीं समाजवादी पार्टी भी महिला मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए लगातार सक्रिय हो गई है। सपा अपनी सरकार की पुरानी योजनाओं को याद दिलाने के साथ ही भविष्य के लिए नए वादों और घोषणाओं के जरिए महिलाओं का भरोसा जीतने की कोशिश कर रही है। पार्टी का जोर यह बताने पर है कि उसकी नीतियां महिलाओं और आम परिवारों को राहत देने वाली रही हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में महिला मतदाता अब केवल पारंपरिक मुद्दों पर मतदान नहीं करतीं, बल्कि सुरक्षा, आर्थिक सहायता, शिक्षा, रोजगार और सरकारी योजनाओं के लाभ जैसे विषय भी उनके निर्णय को प्रभावित करते हैं। ऐसे में हर राजनीतिक दल महिलाओं से जुड़े मुद्दों को चुनावी रणनीति के केंद्र में रखने की कोशिश कर रहा है।

भाजपा और सपा के बीच फिलहाल योजनाओं और वादों की प्रतिस्पर्धा दिखाई दे रही है। दोनों दल एक-दूसरे की सरकारों की उपलब्धियों और कमियों को जनता के सामने रखने में जुटे हैं। भाजपा जहां अपने कार्यकाल की योजनाओं और फैसलों को उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रही है, वहीं सपा सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए अपनी योजनाओं को बेहतर विकल्प के तौर पर पेश कर रही है।

कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने अभी तक महिला वोटरों को लेकर अपने बड़े चुनावी पत्ते नहीं खोले हैं। हालांकि दोनों दलों की रणनीति पर भी राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, महिला मतदाताओं को लेकर सभी दलों की ओर से बड़े ऐलान और अभियान देखने को मिल सकते हैं।

उत्तर प्रदेश में महिला मतदाताओं की संख्या काफी बड़ी है और कई सीटों पर उनका रुख चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल महिलाओं को सिर्फ वोट बैंक के रूप में नहीं बल्कि चुनावी जीत की अहम कुंजी के रूप में देख रहे हैं।

रक्षाबंधन जैसे महिला केंद्रित त्योहार के आसपास घोषणाएं करना भी राजनीतिक संदेश देने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। त्योहारों के जरिए भावनात्मक जुड़ाव बनाने और महिलाओं तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश सभी दल कर रहे हैं।

आने वाले दिनों में भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा के बीच महिला केंद्रित राजनीति और तेज होने की संभावना है। अब देखना दिलचस्प होगा कि चुनावी मैदान में महिलाओं को अपने पक्ष में करने की इस होड़ में कौन सा दल सफल होता है और महिला मतदाता किसके वादों पर भरोसा जताती हैं।

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