बारिश से कोयला आपूर्ति प्रभावित छह तापीय बिजलीघरों में मानक का सिर्फ 34 प्रतिशत भंडार
सोनभद्र : लगातार बारिश के कारण खदानों से कोयले के उत्पादन और उसके प्रेषण की रफ्तार धीमी होने का असर बिजली उत्पादन पर दिखाई देने लगा है। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम के छह तापीय बिजलीघरों में कोयले का भंडार निर्धारित मानक के मुकाबले घटकर लगभग 34 प्रतिशत रह गया है। कोयले की सीमित उपलब्धता के कारण कुछ उत्पादन इकाइयों को कम लोड पर चलाकर व्यवस्था संभालनी पड़ रही है। हालांकि, उपलब्ध संसाधनों के जरिए बिजली उत्पादन को बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है।
उत्पादन निगम के अधीन संचालित छह तापीय बिजलीघरों की कुल स्थापित क्षमता 9,115 मेगावाट है। इनमें अनपरा, ओबरा, हरदुआगंज, जवाहरपुर, पनकी और परीछा तापीय परियोजनाएं शामिल हैं। सामान्य परिस्थितियों में इन सभी बिजलीघरों में 18 दिनों की जरूरत के अनुसार करीब 23 लाख 41 हजार टन कोयला भंडारित रखने का मानक है। इसके मुकाबले फिलहाल सभी परियोजनाओं में मिलाकर लगभग आठ लाख टन कोयला ही उपलब्ध है।
इस तरह निर्धारित मानक से करीब 15 लाख 41 हजार टन कम कोयला मौजूद है। उपलब्ध भंडार और मानक के बीच का यह बड़ा अंतर उत्पादन निगम के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। तापीय बिजलीघरों में निरंतर उत्पादन के लिए कोयले की नियमित आपूर्ति जरूरी होती है। आपूर्ति में लंबे समय तक बाधा रहने पर उत्पादन इकाइयों के संचालन और बिजली उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है।
बारिश के दौरान खुली कोयला खदानों में पानी भरने और मिट्टी गीली होने के कारण खनन गतिविधियां प्रभावित होती हैं। भारी मशीनों के संचालन में परेशानी आती है और खदान से रेलवे साइडिंग या अन्य परिवहन केंद्रों तक कोयला पहुंचाने की गति भी धीमी हो जाती है। बारिश के कारण परिवहन मार्गों की स्थिति बिगड़ने से कोयले की ढुलाई में अतिरिक्त समय लग सकता है।
खदानों से निकलने वाले कोयले को बिजलीघरों तक पहुंचाने में रेलवे की मालगाड़ियों की प्रमुख भूमिका होती है। उत्पादन और लोडिंग की रफ्तार कम होने पर बिजलीघरों को निर्धारित संख्या में कोयला रैक नहीं मिल पाते। इसके परिणामस्वरूप बिजलीघरों के भंडार से प्रतिदिन कोयले की खपत जारी रहती है, लेकिन उसकी भरपाई उसी अनुपात में नहीं हो पाती। यही वजह है कि उपलब्ध स्टॉक धीरे-धीरे कम होता चला जाता है।
तापीय बिजलीघरों की इकाइयों को पूरी क्षमता पर चलाने के लिए पर्याप्त मात्रा में कोयले की आवश्यकता होती है। भंडार सीमित होने पर प्रबंधन को उपलब्ध कोयले के आधार पर उत्पादन का संतुलन बनाना पड़ता है। कुछ इकाइयों को कम लोड पर चलाने से दैनिक खपत घटाई जा सकती है, लेकिन इससे कुल बिजली उत्पादन भी प्रभावित होता है। फिलहाल निगम इसी प्रकार उपलब्धता और मांग के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
प्रदेश में बिजली की मांग मौसम, कृषि गतिविधियों, घरेलू उपयोग और औद्योगिक खपत के अनुसार बदलती रहती है। गर्मी और उमस के दौरान पंखे, कूलर तथा एयर कंडीशनर का उपयोग बढ़ने से बिजली की मांग अधिक रहती है। दूसरी ओर बारिश के मौसम में ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई की मांग कुछ हद तक कम हो सकती है, लेकिन शहरी और औद्योगिक खपत बनी रहती है। ऐसे समय में तापीय बिजलीघरों का उत्पादन कम होने पर बिजली आपूर्ति व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव आने की आशंका रहती है।
अनपरा और ओबरा जैसी तापीय परियोजनाएं प्रदेश की बिजली उत्पादन व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसी तरह हरदुआगंज, जवाहरपुर, पनकी और परीछा परियोजनाओं से भी बड़ी मात्रा में बिजली उपलब्ध होती है। इन सभी परियोजनाओं की कुल क्षमता 9,115 मेगावाट होने के कारण इनके कोयला भंडार में कमी का विषय पूरे प्रदेश की बिजली व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
मानक के अनुसार 18 दिनों के लिए 23.41 लाख टन कोयला उपलब्ध रहना चाहिए। इसके मुकाबले आठ लाख टन की मौजूदा उपलब्धता लगभग एक तिहाई है। हालांकि, सभी बिजलीघरों में कोयले की खपत और भंडारण की स्थिति समान नहीं होती। प्रत्येक परियोजना की उत्पादन क्षमता, चालू इकाइयों की संख्या और लोड के अनुसार दैनिक कोयला जरूरत अलग होती है। इसलिए किसी परियोजना के पास उपलब्ध कोयला कितने दिनों तक चलेगा, यह उसके दैनिक उत्पादन पर निर्भर करेगा।
कोयले की कमी से निपटने के लिए आपूर्ति करने वाली कंपनियों और रेलवे के साथ समन्वय बढ़ाना आवश्यक होगा। खदानों से उत्पादन सामान्य होने के बाद बिजलीघरों के लिए कोयला रैक की संख्या बढ़ाकर भंडार की भरपाई की जा सकती है। प्राथमिकता के आधार पर तापीय परियोजनाओं तक कोयला पहुंचाने से उत्पादन व्यवस्था को स्थिर रखने में मदद मिलेगी।
कोयले की गुणवत्ता और उसमें नमी भी उत्पादन को प्रभावित करती है। बारिश के मौसम में कोयले में नमी बढ़ने से उसकी उपयोगिता और दहन क्षमता पर असर पड़ सकता है। गीले कोयले को संभालने तथा संयंत्र तक पहुंचाने में भी तकनीकी कठिनाइयां आती हैं। इसलिए केवल कुल भंडार ही नहीं, बल्कि बिजलीघरों को मिलने वाले कोयले की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होती है।
वर्तमान स्थिति में उत्पादन निगम के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे प्रदेश की बिजली मांग के अनुरूप उत्पादन बनाए रखना है, वहीं दूसरी ओर सीमित कोयला भंडार का सावधानी से उपयोग भी करना है। कुछ इकाइयों को कम लोड पर चलाना इसी प्रबंधन का हिस्सा माना जा रहा है। आपूर्ति में सुधार होने तक इकाइयों का संचालन उपलब्ध स्टॉक के अनुसार नियंत्रित किया जा सकता है।
फिलहाल कोयले की कमी के कारण बड़े स्तर पर बिजली संकट या किसी इकाई को पूरी तरह बंद किए जाने की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। इसके बावजूद मानक के मुकाबले केवल 34 प्रतिशत भंडार होना सतर्कता की स्थिति जरूर पैदा करता है। यदि बारिश लंबे समय तक खनन और परिवहन को प्रभावित करती रही तो बिजलीघरों के सामने मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
उत्पादन निगम अब कोयला आपूर्ति की गति बढ़ने और अतिरिक्त रैक मिलने की उम्मीद कर रहा है। खदानों में मौसम की स्थिति सुधरते ही उत्पादन तथा प्रेषण सामान्य होने की संभावना है। तब बिजलीघरों के घटते भंडार को दोबारा निर्धारित स्तर के करीब पहुंचाया जा सकेगा। तब तक छहों तापीय परियोजनाओं में उपलब्ध कोयले के आधार पर उत्पादन और खपत का संतुलन बनाए रखना निगम की सबसे बड़ी प्राथमिकता रहेगी।