लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रविवार को जिला अदालत के आसपास बने कथित अवैध वकील चैंबरों और दूसरे निर्माणों पर नगर निगम का बुलडोजर चला। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के निर्देशों और सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद प्रशासन ने 30 अगस्त को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू की। किसी भी तरह के विरोध या टकराव की स्थिति से निपटने के लिए मौके पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया। नगर निगम के कई बुलडोजर और अन्य वाहन भी अभियान में लगाए गए।
कार्रवाई शुरू होने से पहले बिजली विभाग की टीम ने संबंधित निर्माणों की बिजली आपूर्ति काट दी। इसके बाद नगर निगम ने एक-एक करके चिन्हित निर्माणों को हटाना शुरू किया। मौके पर वकीलों की भीड़ भी जुटी और अधिकारियों के साथ बहस की स्थिति बनी। हालांकि भारी पुलिस बल की मौजूदगी में अभियान जारी रहा।
हाईकोर्ट के आदेश पर हुई कार्रवाई
इस पूरे विवाद की शुरुआत लखनऊ जिला अदालत के आसपास सरकारी जमीन, सड़क, फुटपाथ और नालों पर कथित अतिक्रमण को लेकर हुई थी। एडवोकेट अनुराधा सिंह और देवांशी श्रीवास्तव की ओर से मार्च में दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजीव भारती की पीठ ने की थी।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद नगर निगम ने संबंधित निर्माणों को चिन्हित करना और नोटिस जारी करना शुरू किया। चार अगस्त को भी हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने 72 चैंबर और दुकानों से जुड़े कब्जेदारों को स्वयं अतिक्रमण हटाने का अवसर देने को कहा था।
इसके बाद नगर निगम की ओर से नोटिस चस्पा किए गए और निर्धारित समय में अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे वकील
हाईकोर्ट के निर्देशों के खिलाफ सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने सार्वजनिक भूमि और रास्तों पर कथित अनधिकृत निर्माणों को लेकर सख्त रुख अपनाया और हाईकोर्ट के निर्देशों में हस्तक्षेप नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत नहीं मिलने के बाद नगर निगम के लिए कार्रवाई आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया।
कितने चैंबरों पर हो रही कार्रवाई?
अलग-अलग रिपोर्टों में चिन्हित निर्माणों की संख्या को लेकर कुछ अंतर सामने आया है। लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक हाईकोर्ट के आदेश के तहत 72 अवैध चैंबर और दुकानों को लेकर कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही थी। वहीं रविवार की कार्रवाई के संदर्भ में 58 शेष चैंबरों पर बुलडोजर चलने की बात भी सामने आई।
दूसरी ओर कुछ रिपोर्टों में बताया गया कि नगर निगम ने करीब 200 चैंबरों पर नोटिस चस्पा किए थे। इनमें सरकारी जमीन, सड़क, फुटपाथ और नालों पर बने स्थायी निर्माण और खाने-पीने की दुकानें भी शामिल बताई गईं।
इसलिए 30 अगस्त के अभियान में वास्तविक रूप से कितने निर्माण गिराए गए, इसकी अंतिम संख्या प्रशासन की कार्रवाई पूरी होने के बाद स्पष्ट होने की उम्मीद है।
आठ बुलडोजर लेकर पहुंची टीम
रविवार शाम करीब साढ़े चार बजे से पुलिस और प्रशासन के अधिकारी जिला कोर्ट परिसर के आसपास पहुंचने लगे थे। इसके बाद नगर निगम की टीम आठ बुलडोजर और हाईवा वाहनों के साथ मौके पर पहुंची।
कार्रवाई शुरू करने से पहले संबंधित क्षेत्र को सुरक्षा घेरे में लिया गया। लोगों को कार्रवाई वाली जगह से हटाया गया और बिजली आपूर्ति काटी गई। इसके बाद बुलडोजर ने चैंबरों को हटाना शुरू किया।
रविवार का दिन चुनने के पीछे एक कारण यह भी बताया गया कि अदालत में सामान्य कामकाज नहीं होने से आम लोगों और न्यायिक गतिविधियों पर कम असर पड़े।
वकीलों ने किया विरोध
बुलडोजर कार्रवाई शुरू होने के बाद कई वकील मौके पर पहुंच गए। उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों से बातचीत की और कार्रवाई के दायरे पर सवाल उठाए।
वकीलों का कहना था कि हाईकोर्ट के आदेश में जिन निर्माणों का उल्लेख किया गया है, कार्रवाई उन्हीं तक सीमित रहनी चाहिए। उनका आरोप था कि प्रशासन की ओर से अधिक संख्या में चैंबरों पर नोटिस लगाए गए।
कुछ अधिवक्ताओं ने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार नई प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी और संबंधित लोगों को अपनी बात रखने का पर्याप्त मौका मिलना चाहिए था।
प्रशासन की ओर से कहा गया कि कार्रवाई न्यायालय के निर्देश और नोटिस की अवधि समाप्त होने के बाद की जा रही है।
मई में भी चला था बुलडोजर
लखनऊ जिला अदालत के आसपास अतिक्रमण हटाने का यह पहला अभियान नहीं है। इससे पहले 17 मई को भी नगर निगम ने यहां बड़ी कार्रवाई की थी।
उस समय अभियान के दौरान वकीलों और पुलिस के बीच भारी विरोध और टकराव की स्थिति पैदा हुई थी। वकीलों ने कार्रवाई का विरोध किया था और हालात बिगड़ने पर पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा था। कुछ लोग घायल भी हुए थे।
मई की घटना के बाद वकीलों ने कई दिनों तक विरोध प्रदर्शन किया था। इसी पुराने अनुभव को देखते हुए रविवार की कार्रवाई के दौरान प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए।
इस बार भारी पुलिस फोर्स क्यों तैनात रही?
पिछली कार्रवाई के दौरान हुए हंगामे को देखते हुए प्रशासन इस बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहता था।
नगर निगम की टीम के साथ बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात किए गए। कार्रवाई वाले क्षेत्र में आवाजाही को नियंत्रित किया गया और बुलडोजर के आसपास सुरक्षा घेरा बनाया गया।
वकीलों की मौजूदगी और विरोध के बावजूद शुरुआती कार्रवाई के दौरान पिछली बार जैसी हिंसक स्थिति की खबर नहीं थी।
आखिर विवाद क्या है?
प्रशासन का पक्ष है कि जिला अदालत के आसपास कई निर्माण सरकारी जमीन, नालों, फुटपाथ और सार्वजनिक रास्तों पर अतिक्रमण करके बनाए गए हैं। इनके कारण सड़क संकरी होने और यातायात प्रभावित होने की समस्या पैदा होती है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी सड़क और सार्वजनिक रास्ते बाधित होने का मुद्दा उठा। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि वह इलाहाबाद हाईकोर्ट में वरिष्ठ न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान इस इलाके की स्थिति देख चुके हैं और जानते हैं कि किस तरह निर्माणों से रास्ते बाधित हुए हैं।
वहीं अधिवक्ताओं का पक्ष है कि कार्रवाई निर्धारित न्यायिक आदेश और उचित प्रक्रिया के दायरे में ही होनी चाहिए। वे अतिरिक्त चैंबरों को कार्रवाई में शामिल किए जाने और नोटिस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
अब आगे क्या?
फिलहाल नगर निगम और प्रशासन ने अदालत के निर्देशों का हवाला देते हुए अतिक्रमण हटाने का अभियान शुरू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट से भी वकीलों को तत्काल राहत नहीं मिली है।
इस कारण प्रशासन का कहना है कि चिन्हित अवैध निर्माणों को हटाया जाएगा। दूसरी तरफ वकील कार्रवाई के दायरे और प्रक्रिया को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं।
लखनऊ की कचहरी रोड पर रविवार को चला बुलडोजर इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसके पीछे कई महीने से चल रही कानूनी लड़ाई है। हाईकोर्ट के निर्देश, नगर निगम के नोटिस, मई में हुई कार्रवाई और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची कानूनी चुनौती के बाद 30 अगस्त को प्रशासन दोबारा मैदान में उतरा।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि अभियान में कुल कितने चैंबर और दूसरे निर्माण हटाए जाते हैं और अधिवक्ता आगे इस मामले में क्या कानूनी कदम उठाते हैं।
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