लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों की 13वीं बरसी पर एक बार फिर सियासी माहौल गरमा गया है। लखनऊ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, अलीगढ़ और शामली समेत कई शहरों में ऐसे पोस्टर और होर्डिंग सामने आए हैं, जिनमें समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तस्वीर के साथ मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र किया गया है। इन पोस्टरों पर लिखा है— **'न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे।'** पोस्टर सामने आने के बाद 2013 की हिंसा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है।
रातों-रात लगाए गए पोस्टर
मुजफ्फरनगर में 7 सितंबर की सुबह कई जगहों पर लोगों की नजर इन होर्डिंग पर पड़ी। रिपोर्टों के मुताबिक इन्हें रात के समय लगाया गया था। रोडवेज बस स्टैंड के आसपास भी ऐसे होर्डिंग दिखाई दिए। इनमें अखिलेश यादव की तस्वीर के साथ दंगों का जिक्र किया गया था।
पोस्टर किस संगठन या व्यक्ति ने लगवाए, इसे लेकर शुरुआत में कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई। विवाद बढ़ने के बाद पुलिस भी सक्रिय हुई और कई जगहों से पोस्टर हटवाए गए। इन्हें लगाने वालों के बारे में जानकारी जुटाने की बात भी सामने आई है।
लखनऊ तक पहुंचा पोस्टर विवाद
मुजफ्फरनगर के अलावा राजधानी लखनऊ में भी पोस्टर लगाए गए। फैजाबाद रोड स्थित अकबरनगर क्षेत्र के पास लगे एक बड़े होर्डिंग में 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र करते हुए तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार को निशाने पर लेने की कोशिश की गई।
इस होर्डिंग में अखिलेश यादव की तस्वीर के साथ दंगों से जुड़ी खबरों और तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा तत्कालीन सपा सरकार के समय आयोजित सैफई महोत्सव से संबंधित तस्वीरें भी दिखाई गईं। पोस्टर के जरिए उस समय की सरकार की भूमिका पर सवाल उठाने की कोशिश की गई।
सहारनपुर में भी दिखाई दिए पोस्टर
सहारनपुर में भी इसी तरह के पोस्टर सामने आए। यहां मामला इसलिए भी संवेदनशील हो गया क्योंकि कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को हटाए जाने के मुद्दे पर पहले से राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। विपक्षी दलों के प्रतिनिधिमंडलों के सहारनपुर पहुंचने की तैयारियों के बीच अखिलेश यादव की तस्वीर वाले पोस्टर सामने आने से सियासी हलचल और बढ़ गई।
रिपोर्टों के मुताबिक सहारनपुर में पुलिस ने विवादित पोस्टरों को हटवा दिया। पोस्टर लगाने वालों की पहचान के लिए आसपास के सीसीटीवी फुटेज की जांच किए जाने की बात भी सामने आई है।
2013 में भड़की थी हिंसा
मुजफ्फरनगर और आसपास के क्षेत्रों में वर्ष 2013 में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई थी। 7 सितंबर 2013 को नंगला मंदौड़ में हुई महापंचायत के बाद हालात तेजी से बिगड़े थे। हिंसा में 60 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और हजारों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा था।
उस समय उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार थी। हिंसा पर नियंत्रण और बाद में राहत शिविरों की स्थिति को लेकर तत्कालीन सरकार विपक्ष के निशाने पर रही थी।
फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में दंगे
अब 13 साल बाद दंगों की बरसी पर लगे पोस्टरों ने पुराने राजनीतिक विवाद को फिर हवा दे दी है। अखिलेश यादव की तस्वीर के इस्तेमाल के कारण इसे सीधे समाजवादी पार्टी और तत्कालीन सरकार पर राजनीतिक हमला माना जा रहा है।
हालांकि, पोस्टर लगाने वालों की आधिकारिक पहचान स्पष्ट न होने के कारण इनके पीछे किसी राजनीतिक दल या संगठन की भूमिका को लेकर पुष्टि नहीं की जा सकती। पुलिस की ओर से संवेदनशील इलाकों में स्थिति पर नजर रखी जा रही है।
दंगों की बरसी पर सामने आए इन पोस्टरों ने यह जरूर साफ कर दिया है कि 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा एक बार फिर उत्तर प्रदेश की सियासत में चर्चा का विषय बन गया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सपा और उसके राजनीतिक विरोधियों के बीच बयानबाजी और तेज हो सकती है।