पंजाब : अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति को लेकर बड़ा संकेत दिया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, जिन्हें पंजाब में भाजपा के राजनीतिक अभियान की जिम्मेदारी दी गई है, ने शिरोमणि अकाली दल के साथ किसी भी तरह के चुनावी गठबंधन की संभावना को साफ तौर पर खारिज कर दिया है। सैनी के इस बयान के बाद उन अटकलों पर फिलहाल विराम लग गया है, जिनमें दोनों पुराने सहयोगी दलों के दोबारा साथ आने की चर्चा तेज हो गई थी।
नायब सिंह सैनी ने सोमवार, 10 अगस्त को मीडिया से बातचीत में कहा कि भाजपा का गठबंधन पंजाब की जनता के साथ है। उन्होंने दावा किया कि आगामी विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने जा रही है। सैनी ने कहा कि वह पंजाब में लगातार लोगों से मिल रहे हैं और उन्हें जनता के बीच भाजपा के प्रति समर्थन दिखाई दे रहा है। इसी आधार पर उन्होंने विश्वास जताया कि पार्टी राज्य में अगली सरकार बनाने में सफल होगी।
सैनी का यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल ही में शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। इस मुलाकात के बाद पंजाब के राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई थी कि भाजपा और अकाली दल आगामी विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर हाथ मिला सकते हैं। दोनों दल लंबे समय तक एनडीए के सहयोगी रहे हैं और पंजाब की राजनीति में उनका पुराना चुनावी तालमेल रहा है। हालांकि, अब सैनी ने गठबंधन की किसी भी संभावना से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी और सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात को लेकर पूछे गए सवाल पर सैनी ने कहा कि प्रधानमंत्री देश के 140 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं और वह किसी से भी मुलाकात कर सकते हैं। उन्होंने इस मुलाकात को भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन से जोड़ने से इनकार किया। सैनी ने तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग इस मुलाकात के बाद यह सोचकर जश्न मनाने लगे थे कि आखिरकार मिलने का समय मिल गया। उनके इस बयान को पंजाब की आगामी चुनावी राजनीति में भाजपा की स्वतंत्र रणनीति के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन करीब 23 वर्षों तक चला था। दोनों दलों ने मिलकर पंजाब में कई बार सरकार बनाई। वर्ष 1997 से 2002, 2007 से 2012 और 2012 से 2017 के बीच दोनों दलों ने साझा सरकार चलाई। अकाली दल पंजाब में क्षेत्रीय राजनीति का प्रमुख चेहरा रहा, जबकि भाजपा ने शहरी और हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की। दोनों दलों के लंबे राजनीतिक गठबंधन को पंजाब की चुनावी राजनीति में एक महत्वपूर्ण समीकरण माना जाता था।
हालांकि, सितंबर 2020 में केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों को लेकर दोनों दलों के बीच मतभेद गहरा गए। किसान आंदोलन के दौरान अकाली दल ने इन कानूनों के खिलाफ रुख अपनाया और इसके बाद उसने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए से अलग होने का फैसला किया। इस घटनाक्रम के साथ भाजपा और अकाली दल का पुराना गठबंधन औपचारिक रूप से टूट गया। इसके बाद 2022 का पंजाब विधानसभा चुनाव दोनों पार्टियों ने अलग-अलग लड़ा था। चुनाव में दोनों दलों को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।
अब अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर दोनों दलों के बीच संभावित नजदीकी की चर्चा शुरू हुई थी। सुखबीर बादल की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात ने इन अटकलों को और हवा दी। लेकिन नायब सिंह सैनी के ताजा बयान ने भाजपा की मौजूदा रणनीति को लेकर स्थिति काफी हद तक स्पष्ट कर दी है। भाजपा फिलहाल पंजाब में अपने संगठन को मजबूत करने और अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी करती दिखाई दे रही है।
सैनी ने इस दौरान पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली सरकार पर भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर आरोप लगाए और दावा किया कि इस मामले में पंजाब सरकार ने कांग्रेस को भी पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने राज्य सरकार की 'मावां धीयां' योजना को लेकर भी सवाल उठाए। सैनी का आरोप है कि चुनाव नजदीक आने पर महिलाओं को नकद राशि देने की कोशिश की जा रही है, जबकि दूसरी ओर विधवा पेंशन जैसे जरूरी लाभों को रोका जा रहा है।
पंजाब में विधानसभा चुनाव अगले साल की शुरुआत में होने हैं और चुनावी गतिविधियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भाजपा और अकाली दल जैसे प्रमुख राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। ऐसे में भाजपा की ओर से अकाली दल के साथ गठबंधन से इनकार करना राज्य के चुनावी समीकरणों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि चुनाव के करीब आते-आते भाजपा अपने दम पर कितनी मजबूत चुनौती पेश कर पाती है और अकाली दल अपनी राजनीतिक जमीन को किस तरह मजबूत करता है।
फिलहाल नायब सिंह सैनी के बयान से भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि पंजाब में पार्टी किसी पुराने सहयोगी के सहारे नहीं, बल्कि सीधे जनता के समर्थन के आधार पर सत्ता हासिल करने की तैयारी कर रही है। आने वाले महीनों में भाजपा की संगठनात्मक गतिविधियां, उम्मीदवारों का चयन और अन्य दलों के साथ संभावित राजनीतिक समीकरण पंजाब की चुनावी तस्वीर को और स्पष्ट करेंगे।