डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 9.51 लाख की ठगी, चंडीगढ़ पुलिस ने हावड़ा से आरोपी को दबोचा
चंडीगढ़। साइबर ठगी के खिलाफ कार्रवाई करते हुए चंडीगढ़ पुलिस की साइबर अपराध थाना टीम ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 9.51 लाख रुपये की ऑनलाइन ठगी के मामले में एक आरोपी को पश्चिम बंगाल के हावड़ा से गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपी की पहचान 34 वर्षीय राज कुमार शाह के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार, पीड़ित से ठगी गई पूरी रकम आरोपी के बैंक खाते में पहुंची थी। आरोपी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब इस साइबर ठगी से जुड़े अन्य लोगों और पूरे नेटवर्क का पता लगाने में जुटी है।
यह कार्रवाई साइबर अपराध की पुलिस अधीक्षक गीतांजलि खंडेलवाल, आईपीएस के निर्देश पर की गई। साइबर अपराध एवं सूचना प्रौद्योगिकी शाखा के पुलिस उपाधीक्षक के मार्गदर्शन और साइबर अपराध थाना प्रभारी की निगरानी में पुलिस टीम ने मामले की जांच आगे बढ़ाई। बैंकिंग और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड की जांच के बाद पुलिस आरोपी तक पहुंची और उसे हावड़ा से गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस के मुताबिक मामला डिजिटल अरेस्ट के नाम पर की गई ऑनलाइन धोखाधड़ी से जुड़ा है। साइबर अपराधी आमतौर पर इस तरह की ठगी में खुद को पुलिस, सीबीआई, कस्टम, नारकोटिक्स या किसी अन्य जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों से संपर्क करते हैं। पीड़ित को किसी आपराधिक मामले में नाम आने या उसके दस्तावेजों और बैंक खाते के दुरुपयोग की बात कहकर डराया जाता है। इसके बाद जांच या गिरफ्तारी से बचाने के नाम पर रुपये ट्रांसफर करने के लिए दबाव बनाया जाता है।
मौजूदा मामले में पीड़ित से कुल 9.51 लाख रुपये की ऑनलाइन ठगी किए जाने का आरोप है। शिकायत मिलने के बाद साइबर अपराध थाना पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। पुलिस ने उन बैंक खातों की जानकारी जुटाई, जिनमें पीड़ित की रकम भेजी गई थी। लेनदेन की कड़ियों की जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि ठगी की पूरी रकम राज कुमार शाह के बैंक खाते में पहुंची थी।
इसके बाद पुलिस ने आरोपी के बारे में जानकारी जुटाई। तकनीकी और बैंकिंग साक्ष्यों के आधार पर उसका पता पश्चिम बंगाल के हावड़ा में चला। चंडीगढ़ पुलिस की टीम वहां पहुंची और कार्रवाई करते हुए राज कुमार शाह को गिरफ्तार कर लिया। आरोपी को पकड़ने के बाद अब उससे पूछताछ के जरिए यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि साइबर ठगी में उसकी वास्तविक भूमिका क्या थी।
पुलिस यह भी जांच कर रही है कि आरोपी का बैंक खाता केवल ठगी की रकम प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल किया गया था या वह साइबर अपराधियों के नेटवर्क में सक्रिय रूप से शामिल था। साइबर ठगी के कई मामलों में अपराधी दूसरों के बैंक खातों का इस्तेमाल रकम प्राप्त करने और फिर उसे अलग-अलग खातों में भेजने के लिए करते हैं। ऐसे खातों को आमतौर पर म्यूल अकाउंट कहा जाता है।
जांच एजेंसी के लिए अब यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि 9.51 लाख रुपये आरोपी के खाते में आने के बाद रकम कहां भेजी गई। बैंक खाते से किए गए आगे के लेनदेन, नकद निकासी और अन्य खातों में रकम ट्रांसफर किए जाने की जानकारी की जांच से इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
पुलिस आरोपी के मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल उपकरणों की भी जांच कर सकती है। कॉल रिकॉर्ड, मैसेज, बैंकिंग एप और अन्य डिजिटल साक्ष्य पूरे नेटवर्क के बारे में अहम जानकारी दे सकते हैं। यह भी पता लगाया जाएगा कि आरोपी के बैंक खाते में इससे पहले भी संदिग्ध लेनदेन हुए हैं या नहीं।
डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले प्रमुख तरीकों में से एक बन गया है। इसमें अपराधी वीडियो कॉल या फोन कॉल के जरिए पीड़ित को लगातार निगरानी में रहने का भ्रम पैदा करते हैं। कई मामलों में फर्जी पुलिस स्टेशन जैसा बैकग्राउंड तैयार किया जाता है और नकली पहचान पत्र या दस्तावेज दिखाकर लोगों को डराया जाता है।
ठग पीड़ित को यह भी कहते हैं कि वह किसी से घटना की चर्चा न करे, क्योंकि मामला कथित तौर पर गोपनीय जांच से जुड़ा हुआ है। भय और दबाव के कारण कई लोग अपराधियों की बातों में आ जाते हैं और अपनी बचत तक उनके बताए बैंक खातों में ट्रांसफर कर देते हैं।
पुलिस और साइबर सुरक्षा एजेंसियां लगातार स्पष्ट करती रही हैं कि कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। कोई भी वैध जांच एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति को डिजिटल रूप से गिरफ्तार करके पैसे ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती। ऐसे फोन आने पर लोगों को घबराने के बजाय कॉल बंद कर संबंधित पुलिस या साइबर अपराध अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए।
लोगों को अनजान व्यक्तियों के साथ बैंक खाते, ओटीपी, यूपीआई पिन, कार्ड नंबर और अन्य गोपनीय वित्तीय जानकारी साझा करने से भी बचना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति पुलिस या किसी केंद्रीय एजेंसी का अधिकारी होने का दावा करते हुए पैसे मांगता है तो उसकी बात पर तुरंत विश्वास करने के बजाय आधिकारिक माध्यम से उसकी पहचान की पुष्टि करना जरूरी है।
साइबर ठगी होने की स्थिति में जल्द शिकायत करना भी बेहद महत्वपूर्ण है। रकम ट्रांसफर होने के तुरंत बाद संबंधित बैंक और साइबर अपराध हेल्पलाइन को सूचना देने से रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने की संभावना बढ़ सकती है।
चंडीगढ़ के इस मामले में पुलिस ने बैंकिंग लेनदेन की जांच करते हुए पश्चिम बंगाल तक पहुंचकर आरोपी को गिरफ्तार किया है। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर पीड़ित को किसने संपर्क किया था, ठगी की योजना में कितने लोग शामिल थे और रकम को आगे कहां भेजा गया।
आरोपी राज कुमार शाह से पूछताछ और डिजिटल तथा बैंकिंग साक्ष्यों की जांच के आधार पर मामले में आगे और गिरफ्तारियां होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल चंडीगढ़ साइबर अपराध थाना पुलिस पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने और ठगी में शामिल अन्य लोगों की पहचान करने में जुटी हुई है।