EMRS परीक्षा में दूसरे की जगह दे रहा था एग्जाम, दो दोषियों को 3-3 साल की सजा
चंडीगढ़। सेक्टर-40 स्थित शारदा सर्वहितकारी मॉडल सीनियर सेकेंडरी स्कूल में आयोजित ईएमआरएस परीक्षा में दूसरे अभ्यर्थी की जगह परीक्षा देने के मामले में अदालत ने दो आरोपियों को दोषी करार देते हुए तीन-तीन साल की सजा सुनाई है। अदालत ने दोनों दोषियों पर पांच-पांच हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। यह मामला करीब तीन साल पुराना है, जब पुलिस ने परीक्षा के दौरान फर्जीवाड़े का खुलासा करते हुए एक युवक को दूसरे अभ्यर्थी की जगह परीक्षा देते हुए पकड़ा था।
सजा पाने वालों में हिसार निवासी विक्रम लोहान और फतेहाबाद निवासी बलविंदर सिंह शामिल हैं। अदालत ने दोनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 419 और 420 के साथ धारा 120बी के तहत दोषी ठहराया। मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर अदालत ने दोनों की भूमिका को लेकर फैसला सुनाया।
पुलिस के मुताबिक ईएमआरएस परीक्षा के दौरान सेक्टर-40 स्थित शारदा सर्वहितकारी मॉडल सीनियर सेकेंडरी स्कूल को परीक्षा केंद्र बनाया गया था। परीक्षा के दौरान अभ्यर्थियों के दस्तावेजों और पहचान की जांच की जा रही थी। इसी दौरान एक अभ्यर्थी की पहचान को लेकर संदेह हुआ। जांच आगे बढ़ी तो सामने आया कि परीक्षा देने पहुंचा युवक वास्तविक अभ्यर्थी नहीं था।
पुलिस जांच में परीक्षा देने वाले युवक की पहचान हिसार निवासी विक्रम लोहान के रूप में हुई। आरोप था कि वह फतेहाबाद निवासी बलविंदर सिंह की जगह परीक्षा देने के लिए केंद्र पर पहुंचा था। मामले का खुलासा होने के बाद पुलिस को सूचना दी गई और विक्रम को मौके पर ही पकड़ लिया गया।
इसके बाद पुलिस ने पूरे मामले की जांच शुरू की। जांच में यह पता लगाने की कोशिश की गई कि दूसरे अभ्यर्थी के स्थान पर परीक्षा देने की योजना कैसे बनाई गई और इसके लिए किन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। वास्तविक अभ्यर्थी बलविंदर सिंह की भूमिका भी जांच के दायरे में आई। पुलिस ने दोनों के खिलाफ मामला दर्ज कर आवश्यक साक्ष्य जुटाए।
परीक्षा में किसी दूसरे व्यक्ति को बैठाने का मामला केवल पहचान छिपाने तक सीमित नहीं था। जांच एजेंसी ने इसे धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश से जोड़ते हुए संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की। बाद में मामला अदालत पहुंचा, जहां दोनों पक्षों की दलीलें और पुलिस की ओर से जुटाए गए साक्ष्य पेश किए गए।
लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने विक्रम लोहान और बलविंदर सिंह को दोषी पाया। दोनों को आईपीसी की धारा 419, 420 और 120बी के तहत दोषी ठहराते हुए तीन-तीन वर्ष की सजा सुनाई गई। साथ ही पांच-पांच हजार रुपये का आर्थिक दंड भी लगाया गया।
आईपीसी की धारा 419 किसी अन्य व्यक्ति का रूप धारण कर धोखाधड़ी करने से संबंधित है, जबकि धारा 420 धोखाधड़ी और बेईमानी से संपत्ति या लाभ हासिल करने जैसे अपराधों से संबंधित रही है। धारा 120बी आपराधिक साजिश के मामलों में लगाई जाती है। घटना उस समय की होने के कारण मामला तत्कालीन लागू भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत चला।
परीक्षा में फर्जी अभ्यर्थी बैठाने के मामलों को गंभीर माना जाता है क्योंकि इससे भर्ती और चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित होती है। प्रतियोगी परीक्षाओं में लाखों अभ्यर्थी मेहनत करके शामिल होते हैं। यदि कोई अभ्यर्थी अपनी जगह किसी अन्य व्यक्ति को परीक्षा में बैठाता है तो इससे योग्य उम्मीदवारों के हित प्रभावित होने के साथ पूरी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।
इस तरह के फर्जीवाड़े को रोकने के लिए परीक्षा केंद्रों पर अभ्यर्थियों की पहचान की जांच की जाती है। प्रवेश पत्र और पहचान पत्र के मिलान के साथ कई परीक्षाओं में फोटो, हस्ताक्षर और बायोमेट्रिक सत्यापन जैसी व्यवस्थाएं भी अपनाई जाती हैं। संदिग्ध मामला सामने आने पर परीक्षा केंद्र के अधिकारी पुलिस को सूचना देते हैं।
सेक्टर-40 के परीक्षा केंद्र पर भी पहचान सत्यापन के दौरान संदेह पैदा होने के बाद मामला सामने आया था। इसके बाद हुई जांच में पुलिस ने विक्रम लोहान को बलविंदर सिंह की जगह परीक्षा देने के आरोप में पकड़ा। यही कार्रवाई बाद में अदालत में चले मामले का आधार बनी।
ईएमआरएस यानी एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों से संबंधित परीक्षाओं में बड़ी संख्या में उम्मीदवार हिस्सा लेते हैं। इन स्कूलों के लिए विभिन्न पदों पर भर्ती के दौरान प्रतियोगी परीक्षा आयोजित की जाती है। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाए रखना चयन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
परीक्षा में दूसरे व्यक्ति को बैठाने की कोशिश कई स्तरों पर गंभीर मामला बन जाती है। इसके लिए वास्तविक उम्मीदवार और परीक्षा देने वाले व्यक्ति के बीच पहले से सहमति या योजना होने की संभावना की जांच की जाती है। इसके अलावा प्रवेश पत्र, पहचान संबंधी दस्तावेज और अन्य रिकॉर्ड की भी जांच की जाती है।
पुलिस ने तीन साल पहले सामने आए इस मामले में जांच पूरी करने के बाद आरोपियों के खिलाफ अदालत में मामला पेश किया था। सुनवाई के दौरान संबंधित दस्तावेज और गवाहों के बयान न्यायालय के सामने रखे गए। अदालत ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर दोनों को दोषी करार दिया।
इस फैसले को प्रतियोगी परीक्षाओं में फर्जीवाड़ा करने की कोशिश करने वालों के लिए कड़ा संदेश माना जा रहा है। परीक्षा प्रणाली में किसी भी तरह की धोखाधड़ी न केवल अभ्यर्थी का भविष्य प्रभावित कर सकती है, बल्कि आपराधिक मुकदमे और सजा का कारण भी बन सकती है।
फिलहाल अदालत ने हिसार निवासी विक्रम लोहान और फतेहाबाद निवासी बलविंदर सिंह को तीन-तीन साल की सजा और पांच-पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। करीब तीन साल पहले परीक्षा केंद्र पर सामने आए फर्जीवाड़े के इस मामले में न्यायालय के फैसले के साथ दोनों आरोपियों की आपराधिक जिम्मेदारी तय हो गई है।