बीड (महाराष्ट्र)। बीड जिला अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अस्पताल के सेमी-आईसीयू वार्ड में एक गंभीर मरीज के लिए इस्तेमाल की जा रही ऑक्सीजन ह्यूमिडिफायर की बोतल में कथित तौर पर मटमैला पानी पाए जाने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।

घटना सामने आने के बाद अस्पताल में संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था, पानी की गुणवत्ता और मेडिकल उपकरणों के रखरखाव को लेकर चिंता जताई जा रही है। सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. गणेश धवले ने इस मामले को गंभीर बताते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश अबितकर और जिला संरक्षक मंत्री सुनेत्रा पवार को औपचारिक शिकायत सौंपी है। उन्होंने मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की है।

जानकारी के अनुसार, सेमी-आईसीयू वार्ड में भर्ती एक गंभीर मरीज को ऑक्सीजन सपोर्ट दिया जा रहा था। ऑक्सीजन देने के लिए इस्तेमाल होने वाले ह्यूमिडिफायर की बोतल में कथित रूप से साफ पानी की जगह मटमैला पानी दिखाई दिया। यह देखकर मरीज के परिजनों और वहां मौजूद लोगों ने सवाल उठाए।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, ऑक्सीजन ह्यूमिडिफायर मरीजों के लिए बेहद महत्वपूर्ण उपकरण होता है। ऑक्सीजन को मरीज तक पहुंचाने से पहले उसमें नमी बनाए रखने के लिए ह्यूमिडिफायर का इस्तेमाल किया जाता है। यदि इसमें दूषित या गंदा पानी इस्तेमाल किया जाता है तो मरीज के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है और संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।

घटना के बाद अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। लोगों का कहना है कि अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थानों पर इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की नियमित सफाई और जांच बेहद जरूरी है। खासकर आईसीयू और सेमी-आईसीयू जैसे वार्डों में संक्रमण नियंत्रण के नियमों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. गणेश धवले ने अपनी शिकायत में अस्पताल की व्यवस्थाओं पर चिंता जताई है। उन्होंने आरोप लगाया कि मरीजों की सुरक्षा से जुड़ी ऐसी लापरवाही गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। उन्होंने मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यह पता लगाया जाए कि ह्यूमिडिफायर में मटमैला पानी कैसे पहुंचा।

उन्होंने अधिकारियों से यह भी मांग की है कि अस्पताल में उपयोग किए जा रहे सभी मेडिकल उपकरणों, पानी की गुणवत्ता और संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था की विस्तृत समीक्षा की जाए। इसके अलावा, मरीजों को बेहतर और सुरक्षित इलाज उपलब्ध कराने के लिए जरूरी कदम उठाने की अपील की गई है।

इस मामले के सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन की ओर से भी जांच की प्रक्रिया शुरू किए जाने की संभावना है। अधिकारियों द्वारा यह पता लगाया जाएगा कि यह घटना किसी तकनीकी खराबी, लापरवाही या रखरखाव में कमी के कारण हुई।

अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण एक महत्वपूर्ण विषय माना जाता है। खासकर गंभीर मरीजों के लिए इस्तेमाल होने वाले उपकरणों में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी मरीजों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। इसलिए अस्पतालों में साफ-सफाई, उपकरणों की नियमित जांच और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करना जरूरी होता है।

स्थानीय लोगों ने भी इस घटना के बाद जिला अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि सरकारी अस्पतालों में बड़ी संख्या में गरीब और जरूरतमंद लोग इलाज के लिए आते हैं। ऐसे में मरीजों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती।

फिलहाल पूरे मामले में जांच की मांग तेज हो गई है। अब यह देखना होगा कि शिकायत के बाद स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन किस तरह की कार्रवाई करते हैं। जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि ऑक्सीजन ह्यूमिडिफायर में मटमैला पानी मिलने के पीछे वास्तविक कारण क्या था और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

यह घटना एक बार फिर अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा, उपकरणों के रखरखाव और संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत को सामने लाती है।

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