रेलवे का विंड-सोलर प्रयोग उम्मीदों पर नहीं उतरा, मुंबई में पायलट प्रोजेक्ट बंद
मुंबई। मुंबई के उपनगरीय रेल नेटवर्क पर हवा और सौर ऊर्जा के संयोजन से बिजली पैदा करने के लिए शुरू किया गया पश्चिम रेलवे का पायलट प्रोजेक्ट बंद कर दिया गया है। विंड-सोलर हाइब्रिड तकनीक पर आधारित इस प्रयोग से उम्मीद के मुताबिक बिजली उत्पादन नहीं हो सका। इसके अलावा इसकी लागत पारंपरिक सोलर सिस्टम की तुलना में काफी अधिक पाई गई। प्रदर्शन और लागत के आकलन के बाद पश्चिम रेलवे ने इस प्रयोग को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया।
यह पायलट प्रोजेक्ट मुंबई के बांद्रा-खार और नाइगांव-वसई रोड रेल सेक्शन में लगाया गया था। इसका उद्देश्य रेलवे परिसर में उपलब्ध हवा और धूप का इस्तेमाल कर स्वच्छ ऊर्जा पैदा करने की संभावनाओं का अध्ययन करना था। योजना के तहत ऐसे हाइब्रिड सिस्टम लगाए गए थे, जिनमें सोलर पैनल के साथ पवन ऊर्जा से बिजली पैदा करने की व्यवस्था भी शामिल थी।
पायलट प्रोजेक्ट के प्रदर्शन का आकलन करने पर सामने आया कि हाइब्रिड सिस्टम पारंपरिक सौर ऊर्जा व्यवस्था की तुलना में अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं कर सका। बिजली उत्पादन कम रहने के साथ सिस्टम स्थापित करने पर होने वाला खर्च भी ज्यादा पाया गया। इसी आधार पर परियोजना की लागत-प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हुए।
करीब 21 महीने में 8,793 यूनिट बिजली
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक बांद्रा-खार और नाइगांव-वसई रोड सेक्शन में लगाए गए हाइब्रिड सिस्टम ने 10 मई 2023 से 15 जनवरी 2025 के बीच कुल 8,793 किलोवाट घंटे (kWh) बिजली का उत्पादन किया। सामान्य तौर पर एक kWh को एक यूनिट बिजली के बराबर माना जाता है। इस हिसाब से करीब 21 महीने की अवधि में लगभग 8,793 यूनिट बिजली पैदा हुई।
परियोजना का उद्देश्य केवल बिजली पैदा करना नहीं था, बल्कि यह भी देखना था कि मुंबई के उपनगरीय रेल क्षेत्र की परिस्थितियों में विंड-सोलर हाइब्रिड तकनीक व्यावहारिक और आर्थिक रूप से कितनी कारगर साबित हो सकती है।
आकलन में बिजली उत्पादन की तुलना तय सोलर बेंचमार्क से की गई। इसमें पाया गया कि हाइब्रिड सिस्टम का वास्तविक बिजली उत्पादन रिपोर्ट में बताए गए सोलर बेंचमार्क के मुकाबले करीब 49.44 प्रतिशत कम रहा। यानी जिस स्तर के उत्पादन की अपेक्षा की गई थी, सिस्टम उसके करीब भी नहीं पहुंच पाया।
लागत ने भी बढ़ाई मुश्किल
पायलट प्रोजेक्ट के सामने दूसरी बड़ी चुनौती इसकी लागत रही। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हाइब्रिड सिस्टम स्थापित करने की लागत पारंपरिक सोलर सिस्टम के मुकाबले लगभग 4.86 गुना अधिक थी।
कम बिजली उत्पादन और अधिक शुरुआती लागत के कारण परियोजना आर्थिक रूप से आकर्षक नहीं रही। किसी भी ऊर्जा परियोजना में स्थापना की लागत के साथ यह भी देखा जाता है कि सिस्टम अपने पूरे संचालन काल में कितनी बिजली पैदा करता है और उससे कितनी वित्तीय बचत हो सकती है। इस पायलट प्रोजेक्ट में दोनों प्रमुख मानकों पर नतीजे उम्मीद के अनुरूप नहीं रहे।
19.47 लाख रुपये में शुरू हुआ था प्रयोग
इस परियोजना की कुल लागत 19.47 लाख रुपये थी। पायलट प्रोजेक्ट को लागू करने के लिए नासिक स्थित M/s Research Centre for Sustainable Solutions Private Limited को एजेंसी नियुक्त किया गया था।
पश्चिम रेलवे ने इस प्रयोग के जरिए यह जांचने की कोशिश की थी कि रेलवे के उपनगरीय नेटवर्क में सोलर पैनलों के साथ छोटे पवन ऊर्जा उपकरणों का इस्तेमाल कर बिजली उत्पादन बढ़ाया जा सकता है या नहीं।
सिद्धांत रूप से विंड-सोलर हाइब्रिड सिस्टम का फायदा यह माना जाता है कि धूप उपलब्ध होने पर सोलर पैनल बिजली पैदा करते हैं, जबकि पर्याप्त हवा होने पर विंड टर्बाइन भी ऊर्जा उत्पादन में योगदान दे सकती हैं। लेकिन किसी स्थान पर इस तकनीक की सफलता वहां उपलब्ध धूप, हवा की गति, उपकरणों की दक्षता, रखरखाव और स्थापना लागत जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है।
पारंपरिक सोलर से हुई तुलना
पायलट प्रोजेक्ट की समीक्षा में पारंपरिक सोलर सिस्टम को महत्वपूर्ण बेंचमार्क बनाया गया। रेलवे पहले से बड़े स्तर पर स्टेशनों, कार्यालयों और अन्य परिसरों की छतों पर सोलर पैनलों का इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में नई हाइब्रिड तकनीक को तभी बड़े स्तर पर अपनाया जा सकता था, जब वह मौजूदा व्यवस्था की तुलना में बेहतर या कम से कम आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी प्रदर्शन करती।
लेकिन हाइब्रिड सिस्टम का उत्पादन सोलर बेंचमार्क से 49.44 प्रतिशत कम और स्थापना लागत करीब 4.86 गुना ज्यादा पाए जाने के बाद इसे बड़े स्तर पर लागू करने का आर्थिक आधार कमजोर हो गया।
पायलट प्रोजेक्ट से मिला व्यावहारिक अनुभव
किसी पायलट प्रोजेक्ट का उद्देश्य नई तकनीक को सीधे बड़े स्तर पर लागू करना नहीं, बल्कि सीमित स्तर पर उसकी व्यवहार्यता जांचना भी होता है। इस लिहाज से पश्चिम रेलवे के इस प्रयोग से मुंबई की परिस्थितियों में छोटे विंड-सोलर हाइब्रिड सिस्टम के प्रदर्शन को लेकर महत्वपूर्ण आंकड़े मिले हैं।
रेलवे जैसे बड़े संगठन के लिए ऊर्जा की मांग काफी अधिक होती है। स्टेशनों, कार्यालयों, वर्कशॉप और अन्य परिसरों में बिजली की जरूरत को पूरा करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा के अलग-अलग विकल्पों पर लगातार काम किया जा रहा है। सौर ऊर्जा इनमें प्रमुख विकल्प बनी हुई है।
सौर ऊर्जा पर रेलवे का जोर जारी
हाइब्रिड पायलट प्रोजेक्ट बंद होने का अर्थ यह नहीं है कि पश्चिम रेलवे ने नवीकरणीय ऊर्जा से दूरी बना ली है। यह फैसला इस विशेष तकनीक और स्थान पर मिले परिणामों से जुड़ा है। रेलवे की विभिन्न इकाइयों में रूफटॉप सोलर समेत दूसरे स्वच्छ ऊर्जा उपाय पहले से इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
नई तकनीक अपनाते समय बिजली उत्पादन के साथ उसकी लागत और दीर्घकालिक उपयोगिता का आकलन महत्वपूर्ण होता है। मुंबई उपनगरीय नेटवर्क पर किया गया यह प्रयोग इसी प्रक्रिया का हिस्सा था।
फिलहाल उपलब्ध आंकड़ों से यह सामने आया कि बांद्रा-खार और नाइगांव-वसई रोड सेक्शन में लगाया गया विंड-सोलर हाइब्रिड सिस्टम पारंपरिक सोलर व्यवस्था के मुकाबले बिजली उत्पादन और लागत दोनों मानकों पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सका। करीब 19.47 लाख रुपये की लागत से शुरू हुआ पायलट प्रोजेक्ट अब बंद कर दिया गया है।