नकली PMO पहचान पत्र मामले में नया खुलासा इमेज बढ़ाने के लिए दस्तावेज बनाने का आरोप
मुंबई : जियो वर्ल्ड प्लाजा में प्रधानमंत्री कार्यालय का कथित नकली पहचान पत्र इस्तेमाल करने के मामले में गिरफ्तार रोहन प्रेमल पारेख को लेकर क्राइम ब्रांच ने नया दावा किया है। जांच एजेंसी के अनुसार, 24 वर्षीय पारेख ने पूछताछ के दौरान बताया कि वह समाज और अपने परिवार के सामने अपनी छवि तथा आत्मसम्मान बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े दस्तावेज बनाता था। पुलिस का आरोप है कि इसके लिए वह वर्ष 2025 से ChatGPT का इस्तेमाल कर रहा था। हालांकि, इस कथित बयान और दस्तावेजों से संबंधित आरोपों का अदालत में प्रमाणित होना बाकी है।
मामले में गिरफ्तार रोहन पारेख और दिलीप राजाराम कुंडे को दूसरी बार एस्प्लेनेड कोर्ट में पेश किया गया। अदालत ने दोनों आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। इससे पहले आरोपी पुलिस हिरासत में थे, जहां क्राइम ब्रांच ने उनसे कथित पहचान पत्र और अन्य दस्तावेजों के संबंध में पूछताछ की। अदालत में पेशी के दौरान जांच एजेंसी ने पारेख के घर की तलाशी तथा वहां से बरामद सामग्री की जानकारी भी प्रस्तुत की।
क्राइम ब्रांच ने कोर्ट को बताया कि पारेख ने कथित तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय से संबंधित दस्तावेज खुद तैयार किए थे। पुलिस के अनुसार, दस्तावेज बनाने में ChatGPT की मदद लेने की बात पूछताछ के दौरान सामने आई। यह दावा फिलहाल जांच एजेंसी का है। किस दस्तावेज का कौन सा हिस्सा इस तकनीक की सहायता से तैयार हुआ और उसके समर्थन में क्या डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध है, इसका विस्तृत विवरण सार्वजनिक नहीं हुआ है।
पुलिस के मुताबिक, आठ सितंबर को पारेख के घर की तलाशी ली गई थी। इस दौरान दो पंच गवाहों की मौजूदगी में एक लैपटॉप और एक हार्ड डिस्क जब्त की गई। घर से प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े अंग्रेजी में लिखे कई दस्तावेज भी कथित तौर पर मिले। बरामद उपकरण और दस्तावेज अब मामले के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इनके बीच संबंध स्थापित करने से दस्तावेज तैयार करने, उन्हें सुरक्षित रखने और इस्तेमाल करने की परिस्थितियां स्पष्ट हो सकती हैं।
इस मामले की शुरुआत जियो वर्ल्ड प्लाजा में कथित नकली PMO पहचान पत्र के इस्तेमाल से हुई थी। शुरुआती घटनाक्रम पर प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पारेख के साथ गिरफ्तार कुंडे उसके अंगरक्षक के तौर पर काम करता था और पूर्व सैन्यकर्मी है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि पुलिस को घटना का प्रधानमंत्री के कार्यक्रम से संबंध नहीं मिला था। इसलिए कथित पहचान पत्र के इस्तेमाल को प्रधानमंत्री की सुरक्षा के खिलाफ प्रमाणित साजिश बताना उपलब्ध तथ्यों से आगे जाना होगा।
अब क्राइम ब्रांच का दावा मामले में दस्तावेजों की उत्पत्ति को केंद्र में ले आया है। पुलिस के अनुसार, पारेख किसी प्रतिष्ठित सरकारी कार्यालय से जुड़ा दिखाई देकर परिवार और परिचितों के बीच अपनी स्थिति बेहतर करना चाहता था। हालांकि, कथित उद्देश्य और वास्तविक घटनाक्रम अलग बिंदु हैं। जांच में यह स्थापित करना आवश्यक होगा कि दस्तावेज कब बनाए गए, उनका इस्तेमाल कहां हुआ और संबंधित पहचान पत्र के जरिए आरोपी ने क्या दावा किया।
लैपटॉप तथा हार्ड डिस्क से मिलने वाला रिकॉर्ड इन सवालों को समझने में मदद कर सकता है। डिजिटल फाइलों की तारीख, उपलब्ध संस्करण और अन्य संबंधित सामग्री दस्तावेजों के निर्माण का क्रम स्पष्ट कर सकती है। लेकिन अभी किसी विशेष फाइल, बातचीत या तकनीकी परीक्षण के निष्कर्ष की जानकारी सामने नहीं आई है। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि जब्त उपकरणों से पुलिस के सभी दावों की पुष्टि हो चुकी है।
मामले में कुंडे की भूमिका भी अलग से स्पष्ट होना जरूरी है। दोनों आरोपियों की गिरफ्तारी एक ही प्रकरण में हुई है, लेकिन दस्तावेज बनाने का ताजा आरोप विशेष रूप से पारेख से संबंधित है। उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कुंडे को कथित जालसाजी की पूरी जानकारी थी या उसने दस्तावेज तैयार करने में मदद की थी। उसकी जानकारी, गतिविधियों और संलिप्तता का आकलन संबंधित साक्ष्यों के आधार पर होगा।
पुलिस की ओर से बताई गई कथित स्वीकारोक्ति को भी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। पूछताछ में सामने आए बयान, बरामद दस्तावेज और डिजिटल सामग्री का परस्पर संबंध स्थापित होना महत्वपूर्ण है। आरोपी के कथित उद्देश्य को उसकी दोषसिद्धि के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। अभी मामला जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है तथा दोनों आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर अदालत का अंतिम निर्णय नहीं आया है।
यह घटनाक्रम सरकारी पहचान और दस्तावेजों की प्रामाणिकता के महत्व को सामने लाता है। किसी दस्तावेज पर प्रतिष्ठित कार्यालय का नाम होना उसके वास्तविक होने की पुष्टि नहीं करता। इस मामले में भी मुख्य सवाल कथित दस्तावेजों की प्रामाणिकता और उनके इस्तेमाल का है। फिलहाल अदालत ने दोनों आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेजा है। आगे दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड के परीक्षण से क्राइम ब्रांच के दावों की पुष्टि अथवा खंडन तथा दोनों की भूमिकाएं स्पष्ट होने की उम्मीद है।