मुंबई। गणेशोत्सव के दौरान पर्यावरण संरक्षण को लेकर मुंबई के लोगों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के अतिरिक्त नगर आयुक्त अविनाश ढाकने के मुताबिक अब आम नागरिक पर्यावरण के अनुकूल त्योहार मनाने के प्रति पहले से अधिक जागरूक हैं। गणेश प्रतिमाओं के निर्माण से लेकर विसर्जन तक पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए महानगरपालिका कई स्तरों पर काम कर रही है।

गणेशोत्सव के मौके पर ‘फ्री प्रेस जर्नल’ से बातचीत में ढाकने ने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल उत्सव और जागरूकता के मामले में सकारात्मक बदलाव आया है। लोगों को अब पर्यावरण संरक्षण और विसर्जन से जुड़े प्रभावों के बारे में अधिक जानकारी है। इसी जागरूकता को बढ़ाने के लिए BMC ने कई उपाय किए हैं।

मुंबई में गणेशोत्सव बड़े स्तर पर मनाया जाता है। हजारों सार्वजनिक और घरेलू गणेश प्रतिमाओं की स्थापना के बाद समुद्र, तालाबों और कृत्रिम विसर्जन स्थलों पर प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। ऐसे में प्रतिमाओं में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और विसर्जन के बाद उसके निपटान का सवाल पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो जाता है।

हाई कोर्ट की सख्ती के बाद बढ़ा फोकस

बॉम्बे हाई कोर्ट ने प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) से बनी मूर्तियों, उनके प्राकृतिक जलस्रोतों में विसर्जन और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की गाइडलाइंस के पालन को लेकर अधिकारियों से कड़ाई बरतने को कहा है।

अदालत की टिप्पणियों के बाद पर्यावरण संबंधी नियमों के पालन और विसर्जन व्यवस्था को लेकर प्रशासन का फोकस और बढ़ गया है। BMC की कोशिश है कि श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं और परंपराओं का सम्मान करते हुए गणेशोत्सव के पर्यावरणीय प्रभाव को कम किया जाए।

इसके लिए नागरिकों और गणेश मंडलों को पर्यावरण के अनुकूल प्रतिमाएं अपनाने तथा उपलब्ध कृत्रिम विसर्जन स्थलों का इस्तेमाल करने के लिए जागरूक किया जा रहा है।

शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा

इको-फ्रेंडली गणेशोत्सव के लिए शाडू मिट्टी और अन्य पर्यावरण अनुकूल सामग्री से बनी प्रतिमाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है। ऐसी प्रतिमाएं पानी में अपेक्षाकृत आसानी से घुल सकती हैं और PoP की तुलना में इनके अवशेषों के प्रबंधन में कम कठिनाई आती है।

BMC की ओर से मूर्तिकारों और नागरिकों तक पर्यावरण अनुकूल विकल्पों की जानकारी पहुंचाने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य धीरे-धीरे ऐसी प्रतिमाओं की मांग बढ़ाना है, जिनसे विसर्जन के बाद जल निकायों पर कम प्रभाव पड़े।

ढाकने के मुताबिक नागरिकों में इस मुद्दे को लेकर जागरूकता बढ़ी है और लोग अब मूर्ति खरीदते समय उसकी सामग्री के बारे में भी जानकारी लेने लगे हैं।

कृत्रिम तालाबों पर जोर

मुंबई में प्राकृतिक जल निकायों पर दबाव कम करने के लिए कृत्रिम विसर्जन स्थलों की व्यवस्था महत्वपूर्ण बनाई गई है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे स्थान उपलब्ध कराए जाते हैं, जहां श्रद्धालु गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन कर सकते हैं।

इससे समुद्र और दूसरे प्राकृतिक जलस्रोतों में सीधे जाने वाली प्रतिमाओं की संख्या कम करने में मदद मिल सकती है। कृत्रिम तालाबों में विसर्जित प्रतिमाओं के अवशेषों को बाद में नियंत्रित तरीके से इकट्ठा और निस्तारित करना भी अपेक्षाकृत आसान होता है।

महानगरपालिका की कोशिश है कि नागरिक अपने घर के नजदीक उपलब्ध कृत्रिम विसर्जन स्थलों का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करें।

विसर्जित मूर्तियों का वैज्ञानिक निपटान

BMC का ध्यान केवल विसर्जन की व्यवस्था तक सीमित नहीं है। विसर्जन के बाद मूर्तियों के अवशेषों के वैज्ञानिक तरीके से निपटान पर भी जोर दिया जा रहा है।

विशेष रूप से ऐसी मूर्तियां जो पानी में पूरी तरह नहीं घुलतीं, उनके अवशेष पर्यावरण के लिए चुनौती बन सकते हैं। इन्हें समुद्र या अन्य जलस्रोतों में छोड़ देने के बजाय एकत्र कर निर्धारित प्रक्रिया के तहत निस्तारित करना जरूरी है।

ढाकने ने बताया कि महानगरपालिका विसर्जित प्रतिमाओं के उचित निपटान के लिए व्यवस्थाएं कर रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उत्सव समाप्त होने के बाद मूर्तियों का मलबा समुद्र तटों या दूसरे स्थानों पर पर्यावरणीय समस्या न बने।

PoP मूर्तियां बनी बड़ी चुनौती

प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी गणेश प्रतिमाएं लंबे समय से पर्यावरण संबंधी बहस के केंद्र में हैं। PoP पानी में प्राकृतिक मिट्टी की तरह आसानी से नहीं घुलता। बड़ी संख्या में ऐसी प्रतिमाओं का विसर्जन होने पर जलस्रोतों और तटीय क्षेत्रों में अवशेष जमा हो सकते हैं।

इसी कारण CPCB की गाइडलाइंस और अदालत के निर्देशों के तहत पर्यावरण अनुकूल सामग्री को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।

हालांकि पारंपरिक मूर्तिकारों और गणेश मंडलों के लिए बदलाव को तुरंत लागू करना व्यावहारिक चुनौती भी हो सकता है। इसलिए प्रशासन के सामने नियमों के पालन के साथ लोगों और कारीगरों को वैकल्पिक सामग्री अपनाने के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी भी है।

नागरिकों की सोच में बदलाव

BMC के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में मुंबई के लोगों की सोच में बड़ा बदलाव आया है। अब कई परिवार छोटी और पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। घर पर विसर्जन या कृत्रिम तालाबों का इस्तेमाल करने को लेकर भी जागरूकता बढ़ी है।

सोशल मीडिया, सार्वजनिक अभियानों और गणेश मंडलों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश लोगों तक पहुंचाया जा रहा है।

इस बदलाव का असर तभी बड़े स्तर पर दिखाई देगा जब पर्यावरण अनुकूल विकल्प आसानी से उपलब्ध हों और विसर्जन की सुविधाएं लोगों के नजदीक हों।

परंपरा और पर्यावरण के बीच संतुलन

मुंबई के लिए गणेशोत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लाखों लोग इस उत्सव से जुड़ते हैं और अनंत चतुर्दशी पर विशाल विसर्जन यात्राएं निकलती हैं।

ऐसे में BMC के सामने चुनौती है कि धार्मिक परंपराओं को बनाए रखते हुए समुद्र, तालाब और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जाए।

अतिरिक्त नगर आयुक्त अविनाश ढाकने के अनुसार नागरिकों में बढ़ती जागरूकता इस दिशा में सकारात्मक संकेत है। कृत्रिम विसर्जन स्थलों, पर्यावरण अनुकूल प्रतिमाओं को बढ़ावा देने और विसर्जित मूर्तियों के वैज्ञानिक निपटान जैसी व्यवस्थाओं के जरिए महानगरपालिका इसी बदलाव को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

आने वाले वर्षों में इन उपायों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कितने गणेश मंडल, मूर्तिकार और श्रद्धालु पर्यावरण अनुकूल विकल्प अपनाते हैं। फिलहाल BMC का जोर साफ है—गणेशोत्सव की भव्यता और परंपरा कायम रहे, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं।

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