बारामती कोर्ट का बड़ा फैसला डॉग की पहचान के आधार पर नहीं होगी सजा
मर्डर केस में बड़ा मोड़ स्निफर डॉग की गवाही पर कोर्ट ने उठाए सवाल
पुणे: महाराष्ट्र के बारामती की एक अदालत ने दो साल पुराने हत्या मामले में आरोपी को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि केवल स्निफर डॉग का किसी व्यक्ति के पास जाकर भौंकना या प्रतिक्रिया देना हत्या में शामिल होने का पुख्ता सबूत नहीं माना जा सकता। अभियोजन पक्ष ठोस साक्ष्य पेश करने में असफल रहा, जिसके बाद आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
मामला वर्ष 2024 के एक हत्या प्रकरण से जुड़ा था, जिसमें पुलिस ने जांच के दौरान स्निफर डॉग की मदद ली थी। जांच एजेंसी ने डॉग की प्रतिक्रिया को आरोपी के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में पेश किया था, लेकिन अदालत ने इसे पर्याप्त प्रमाण मानने से इनकार कर दिया।
परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर उठे सवाल
अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए मजबूत और विश्वसनीय सबूत जरूरी होते हैं। केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य या किसी खोजी कुत्ते की प्रतिक्रिया के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने माना कि स्निफर डॉग जांच में मददगार हो सकते हैं, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया को अकेले निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
अभियोजन पक्ष नहीं साबित कर सका आरोप
मामले में अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ प्रत्यक्ष या पर्याप्त वैज्ञानिक सबूत पेश नहीं कर पाया। अदालत ने कहा कि संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, उसे अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण का स्थान नहीं दिया जा सकता।
जांच में तकनीकी साक्ष्यों की अहमियत
अदालत के फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि हत्या जैसे गंभीर मामलों में सीसीटीवी फुटेज, फोरेंसिक रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शी और अन्य ठोस सबूतों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। स्निफर डॉग पुलिस जांच का एक सहायक माध्यम हो सकता है, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया को अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
कानूनी विशेषज्ञों की नजर में अहम फैसला
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि अदालतें किसी भी व्यक्ति को केवल अनुमान या कमजोर परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर सजा नहीं दे सकतीं। बारामती कोर्ट के इस फैसले के बाद जांच एजेंसियों के लिए भी यह संदेश है कि अपराध साबित करने के लिए वैज्ञानिक और ठोस प्रमाण जुटाना जरूरी है।