ठाणे में मानसिक स्वास्थ्य केंद्र की महिला मरीजों ने सैनिकों के लिए बनाईं 500 राखियां
ठाणे। रक्षाबंधन को आमतौर पर भाई-बहन के प्रेम और स्नेह के त्योहार के रूप में मनाया जाता है, लेकिन ठाणे के रीजनल मेंटल हॉस्पिटल में इस बार यह पर्व मानवीय संवेदना, राष्ट्रीय गौरव और उपचार की दिशा में सकारात्मक प्रयास का संदेश लेकर आया। अस्पताल की महिला मरीजों ने देश की सीमाओं पर तैनात भारतीय सैनिकों के लिए अपने हाथों से 500 रंग-बिरंगी राखियां तैयार कीं। सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन ‘आम्ही शिवभक्त परिवार’ के सहयोग से आयोजित इस पहल ने मरीजों को रचनात्मक गतिविधि से जोड़ने के साथ उनमें देश के प्रति सम्मान और जुड़ाव की भावना को भी मजबूत किया।
अस्पताल के वार्डों में जब महिला मरीज राखियां तैयार कर रही थीं, उस दौरान उनके बीच उत्साह और अपनापन देखने को मिला। इन राखियों को उन सैनिकों के लिए तैयार किया गया, जो देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए अपने परिवारों से दूर रहकर जिम्मेदारी निभा रहे हैं। मरीजों ने राखियों के जरिए जवानों के प्रति सम्मान, आभार और शुभकामनाएं व्यक्त कीं।
देश के जवानों के नाम राखियां
राखी बनाने की इस पहल का उद्देश्य केवल त्योहार मनाना नहीं था। इसके जरिए अस्पताल में उपचाराधीन महिलाओं को एक ऐसे काम से जोड़ा गया, जिसमें उनकी भावनात्मक भागीदारी भी रही। उन्होंने अलग-अलग रंगों और सजावटी सामग्री का इस्तेमाल करते हुए राखियां तैयार कीं।
राखियां बनाते समय महिलाओं को यह अहसास कराया गया कि उनके द्वारा तैयार किया गया छोटा-सा उपहार देश की रक्षा करने वाले जवानों तक पहुंचेगा। इससे गतिविधि उनके लिए महज समय बिताने का माध्यम न रहकर एक उद्देश्यपूर्ण कार्य में बदल गई।
देश के अलग-अलग हिस्सों में तैनात सैनिकों के लिए यह संदेश महत्वपूर्ण है कि समाज उनके योगदान को याद करता है। अस्पताल की महिला मरीजों द्वारा बनाई गई राखियों ने इसी भावना को एक अलग रूप दिया।
उपचार में रचनात्मक गतिविधि का महत्व
इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू मानसिक स्वास्थ्य उपचार से भी जुड़ा रहा। अस्पताल के ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट की देखरेख में राखी बनाने की गतिविधि को मरीजों की चिकित्सकीय जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया।
मानसिक स्वास्थ्य उपचार में उद्देश्यपूर्ण और रचनात्मक गतिविधियों को मरीजों की दिनचर्या का हिस्सा बनाना कई मामलों में उपयोगी हो सकता है। राखी तैयार करने के दौरान मरीजों को एकाग्रता, धैर्य और हाथों की सटीक गतिविधियों की जरूरत पड़ी। इस तरह गतिविधि ने रचनात्मक अभिव्यक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक कौशल के अभ्यास का अवसर भी दिया।
हाथों के तालमेल और दक्षता पर जोर
राखी तैयार करने के लिए धागे को काटना, अलग-अलग हिस्सों को जोड़ना, बारीक मोतियों को पिरोना और सजावट करना जैसी गतिविधियां करनी पड़ती हैं। इन कामों में हाथ और आंखों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत होती है।
ऑक्यूपेशनल थेरेपी के तहत ऐसी गतिविधियों का इस्तेमाल मरीजों की कार्यक्षमता और रोजमर्रा के कौशल को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है। राखी बनाने के दौरान महिलाओं ने छोटे-छोटे हिस्सों को सावधानी से संभाला और उन्हें एक सुंदर डिजाइन में बदला। इससे उनकी सूक्ष्म शारीरिक गतिविधियों और काम पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता के अभ्यास का अवसर मिला।
आत्मविश्वास बढ़ाने की कोशिश
इस तरह के कार्यक्रम मरीजों को यह महसूस कराने में भी मदद करते हैं कि वे समाज के लिए कुछ रचनात्मक कर सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में उपचार के दौरान कई बार मरीज सामाजिक गतिविधियों से दूर हो जाते हैं। ऐसे में उन्हें सामूहिक और उद्देश्यपूर्ण गतिविधियों से जोड़ना उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने की दिशा में एक कदम हो सकता है।
राखियां तैयार करने वाली महिलाओं के लिए भी यह अनुभव इसी तरह का रहा। उन्होंने अपने हाथों से तैयार की गई राखियों को सैनिकों के लिए समर्पित किया। इससे उनके भीतर उपयोगी योगदान देने और किसी बड़े उद्देश्य से जुड़ने की भावना पैदा हुई।
सामाजिक संगठन की भागीदारी
इस पहल को ‘आम्ही शिवभक्त परिवार’ नाम के सामाजिक-सांस्कृतिक समूह के सहयोग से आयोजित किया गया। संगठन और अस्पताल प्रशासन की भागीदारी से मरीजों को जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई गई और उन्हें राखी बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
कार्यक्रम ने सामाजिक संस्थाओं और स्वास्थ्य संस्थानों के बीच सहयोग की संभावनाओं को भी सामने रखा। ऐसी पहलें अस्पतालों में उपचार के वातावरण को अधिक सकारात्मक और सहभागी बनाने में मदद कर सकती हैं।
रक्षाबंधन का संदेश हुआ व्यापक
रक्षाबंधन के अवसर पर आमतौर पर बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी सुरक्षा का संकल्प लेता है। ठाणे के मानसिक स्वास्थ्य केंद्र की इस पहल में राखी के इसी भाव को व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ मिला।
महिला मरीजों ने उन सैनिकों के लिए राखियां तैयार कीं, जो देश की सीमाओं की सुरक्षा में जुटे हैं। इस तरह राखी पारिवारिक रिश्ते से आगे बढ़कर देश और समाज के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति बन गई।
500 राखियों की यह पहल इसलिए भी खास रही क्योंकि इसमें देशभक्ति और उपचार को एक साथ जोड़ा गया। मरीजों के लिए यह एक रचनात्मक अनुभव रहा, जबकि सैनिकों के लिए यह समाज की ओर से सम्मान और शुभकामना का प्रतीक बन सकता है।
इस पहल ने यह संदेश दिया कि उपचार केवल दवाओं तक सीमित नहीं है। सही मार्गदर्शन के साथ रचनात्मक, सामाजिक और उद्देश्यपूर्ण गतिविधियां भी मरीजों को सकारात्मक अनुभव दे सकती हैं। रक्षाबंधन पर तैयार की गई ये 500 राखियां इसी सोच का उदाहरण बनीं—जहां हाथों से बुने धागों ने मरीजों, समाज और देश की सीमाओं पर तैनात सैनिकों को एक भावनात्मक रिश्ते में जोड़ने का काम किया।