महाराष्ट्र। मजलगांव बांध की ऊंचाई बढ़ाने के प्रस्ताव के विरोध में प्रभावित किसानों ने गुरुवार को अनोखा प्रदर्शन किया। किसानों ने अपनी मांगों को लेकर बांध के पानी में उतरकर करीब पांच घंटे तक खड़े रहकर विरोध जताया। यह प्रदर्शन ‘मराठवाड़ा मुक्ति दिवस’ के अवसर पर किया गया।

प्रदर्शन का नेतृत्व ‘युवा शेतकारी संघर्ष समिति’ ने किया। सुबह से ही बड़ी संख्या में परियोजना से प्रभावित किसान बांध क्षेत्र में पहुंच गए और उन्होंने पानी में उतरकर अपनी नाराजगी जाहिर की।

प्रदर्शनकारी किसानों की मुख्य मांग थी कि मजलगांव बांध की ऊंचाई बढ़ाने के प्रस्ताव को तत्काल रद्द किया जाए। इसके साथ ही उन्होंने प्रभावित कृषि भूमि का सर्वे कराने और भविष्य में कोई भी फैसला लेने से पहले किसानों को विश्वास में लेने की मांग उठाई।

किसानों का कहना है कि बांध की ऊंचाई बढ़ाने की योजना से कई पुनर्वासित गांवों की कृषि भूमि प्रभावित होने की आशंका है। उन्होंने आरोप लगाया कि परियोजना से जुड़े निर्णय प्रभावित किसानों से चर्चा किए बिना लिए जा रहे हैं।

प्रदर्शन कर रहे किसानों ने कहा कि उनकी आजीविका खेती पर निर्भर है। यदि कृषि भूमि प्रभावित होती है तो उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है। इसलिए किसी भी परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले जमीन और उससे जुड़े प्रभावों का सही आकलन किया जाना चाहिए।

किसानों ने आरोप लगाया कि अब तक प्रभावित क्षेत्रों की कृषि भूमि का पर्याप्त सर्वे नहीं किया गया है। उनका कहना है कि बिना जमीन की वास्तविक स्थिति जाने बांध की ऊंचाई बढ़ाने का निर्णय लेना उचित नहीं है।

जल सत्याग्रह के दौरान किसानों ने प्रशासन से मांग की कि परियोजना से जुड़े सभी पहलुओं की समीक्षा की जाए। उन्होंने कहा कि प्रभावित लोगों की सहमति और सुझावों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

‘युवा शेतकारी संघर्ष समिति’ के पदाधिकारियों ने कहा कि किसानों की समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रशासन से बातचीत कर समाधान निकालने की अपील की।

प्रदर्शन के दौरान किसान लंबे समय तक बांध के पानी में खड़े रहे। उनका कहना था कि यह आंदोलन सरकार और प्रशासन का ध्यान उनकी मांगों की ओर आकर्षित करने के लिए किया गया है।

किसानों ने यह भी मांग की कि यदि बांध की ऊंचाई बढ़ाने की योजना पर आगे बढ़ा जाता है तो प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे से जुड़े सभी मुद्दों को पहले स्पष्ट किया जाए।

स्थानीय किसानों के अनुसार, बांध परियोजनाओं का असर केवल जमीन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे लोगों की आजीविका और सामाजिक जीवन भी प्रभावित होता है। इसलिए फैसले लेते समय प्रभावित लोगों की भागीदारी जरूरी है।

प्रदर्शन के दौरान किसानों ने अपनी मांगों को लेकर नारे भी लगाए। उन्होंने प्रशासन से जल्द हस्तक्षेप कर समस्या का समाधान करने की मांग की।

फिलहाल किसानों के इस विरोध प्रदर्शन के बाद प्रशासन की ओर से किसी बड़े निर्णय की जानकारी सामने नहीं आई है। हालांकि, प्रदर्शन के जरिए किसानों ने अपनी चिंताओं और मांगों को प्रमुखता से उठाया है।

मजलगांव बांध से जुड़े इस विवाद ने एक बार फिर विकास परियोजनाओं और प्रभावित किसानों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत को सामने ला दिया है। किसानों का कहना है कि वे विकास के विरोध में नहीं हैं, लेकिन उनकी जमीन और आजीविका से जुड़े फैसले उनकी सहमति और उचित प्रक्रिया के साथ लिए जाने चाहिए।

अब सभी की नजरें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर हैं। किसानों ने संकेत दिया है कि मांगें पूरी नहीं होने पर वे आगे भी आंदोलन जारी रख सकते हैं।

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