मुंबई। मुंबई पुलिस ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) के दो अधिकारियों के खिलाफ एक कारोबारी को कथित तौर पर धमकाने और उससे 2.25 करोड़ रुपये की उगाही करने के आरोप में मामला दर्ज किया है। बांगुर नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज इस मामले में ईडी अधिकारी मोहित गर्ग और देवेंद्रकुमार गुप्ता को आरोपी बनाया गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए आगे की जांच मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक मामला मुंबई के कारोबारी अमुया वासा की शिकायत से जुड़ा है। वासा ने सबसे पहले 21 अगस्त को प्रवर्तन निदेशालय के पास शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप दो ईडी अधिकारियों से संबंधित होने के कारण एजेंसी ने शिकायत पर संज्ञान लिया और इसके आधार पर स्थानीय पुलिस से संपर्क किया। इसके बाद पुलिस ने उपलब्ध जानकारी और शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की।

एफआईआर में दर्ज आरोपों के अनुसार घटना की शुरुआत 20 जुलाई को हुई थी। आरोप है कि ईडी अधिकारी मोहित गर्ग और देवेंद्रकुमार गुप्ता मलाड वेस्ट स्थित केन प्लाजा पहुंचे थे। इसी इमारत में शिकायतकर्ता वासा का ‘विंट्री टेक’ नाम से कार्यालय बताया गया है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि दोनों अधिकारियों ने कार्यालय पहुंचने के बाद उसके कारोबार और वित्तीय गतिविधियों को लेकर सवाल-जवाब शुरू किए। एफआईआर के मुताबिक अधिकारियों ने कथित तौर पर वासा से कहा कि उसका कारोबार अपराध से हुई कमाई यानी ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ से जुड़ा हुआ है।

वासा ने अपनी शिकायत में दावा किया कि अधिकारियों ने उस समय ऐसा आरोप लगाने के समर्थन में कोई दस्तावेज या अन्य सबूत नहीं दिखाया। शिकायत के मुताबिक इसके बाद कथित रूप से दबाव बनाने और गंभीर कानूनी कार्रवाई का डर दिखाने का सिलसिला शुरू हुआ।

मामले में सबसे गंभीर आरोप कारोबारी से 2.25 करोड़ रुपये की कथित उगाही का है। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि शिकायतकर्ता की ओर से बताई गई रकम किस तरह दी गई, इसका भुगतान कब और कहां हुआ तथा रकम किस व्यक्ति या खाते तक पहुंची। जांच में बैंकिंग रिकॉर्ड, वित्तीय लेनदेन और अन्य डिजिटल साक्ष्य महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

चूंकि आरोप प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों से जुड़े हैं, इसलिए मामले को मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर कर दिया गया है। क्राइम ब्रांच शिकायतकर्ता के बयान, आरोपियों की भूमिका और वित्तीय लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड की विस्तृत जांच करेगी। जरूरत पड़ने पर घटनास्थल और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग की भी जांच की जा सकती है।

इस मामले में घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिकायतकर्ता ने सीधे पुलिस के बजाय पहले प्रवर्तन निदेशालय से संपर्क किया था। 21 अगस्त को शिकायत मिलने के बाद ईडी की ओर से स्थानीय पुलिस को मामले की जानकारी दिए जाने की बात सामने आई है। इसके बाद बांगुर नगर पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया शुरू की।

जांच एजेंसी के सामने अब कई सवाल हैं। सबसे पहले यह पता लगाना होगा कि दोनों अधिकारी 20 जुलाई को कारोबारी के कार्यालय में किस उद्देश्य से पहुंचे थे। क्या उनकी यात्रा किसी आधिकारिक जांच का हिस्सा थी या नहीं, क्या इसके लिए विभागीय अनुमति थी और कार्यालय में हुई बातचीत का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद है—इन पहलुओं की जांच मामले की दिशा तय करने में अहम हो सकती है।

इसके अलावा पुलिस को 2.25 करोड़ रुपये की कथित रकम का पूरा ट्रेल तलाशना होगा। यदि रकम नकद दी गई थी तो उसके स्रोत और संभावित प्राप्तकर्ता की पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यदि भुगतान बैंकिंग या डिजिटल माध्यम से हुआ है तो संबंधित खातों के रिकॉर्ड जांच में महत्वपूर्ण सबूत बन सकते हैं।

पुलिस शिकायतकर्ता के दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करने के लिए मोबाइल कॉल रिकॉर्ड, संदेश, सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की भी पड़ताल कर सकती है। शिकायत में बताए गए समय और स्थान पर संबंधित अधिकारियों की मौजूदगी की पुष्टि भी जांच का हिस्सा हो सकती है।

एफआईआर दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि आरोप साबित हो गए हैं। मोहित गर्ग और देवेंद्रकुमार गुप्ता के खिलाफ लगाए गए धमकी और उगाही के आरोपों की सत्यता पुलिस जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होगी। दोनों अधिकारियों का पक्ष भी जांच में महत्वपूर्ण रहेगा।

यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि मामला दो नामित अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए विशिष्ट आरोपों से संबंधित है। इसलिए इसे पूरे प्रवर्तन निदेशालय पर आरोप के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक ईडी ने शिकायत मिलने के बाद ही स्थानीय पुलिस से संपर्क किया था, जिसके बाद एफआईआर की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

प्रवर्तन निदेशालय मुख्य रूप से धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) और विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) से जुड़े मामलों की जांच करने वाली केंद्रीय एजेंसी है। ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ शब्द का इस्तेमाल PMLA के तहत अपराध से प्राप्त संपत्ति के संदर्भ में किया जाता है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि दोनों अधिकारियों ने इसी तरह के आरोप का इस्तेमाल उस पर दबाव बनाने के लिए किया।

अब क्राइम ब्रांच यह जांचेगी कि कारोबारी के खिलाफ वास्तव में कोई ईडी जांच या आधिकारिक कार्रवाई चल रही थी या नहीं। यदि किसी मामले की जांच चल रही थी तो दोनों अधिकारियों की कार्रवाई उस आधिकारिक प्रक्रिया के दायरे में थी या उससे बाहर, यह तथ्य भी महत्वपूर्ण होगा।

पुलिस जांच के दौरान ईडी से संबंधित दस्तावेज और अधिकारियों की ड्यूटी से जुड़े रिकॉर्ड भी मांगे जा सकते हैं। इसके अलावा कारोबारी के कार्यालय में मौजूद कर्मचारियों या अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए जा सकते हैं।

फिलहाल मुंबई पुलिस ने दोनों अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी है। कारोबारी की ओर से 2.25 करोड़ रुपये की कथित उगाही और धमकी देने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं, लेकिन इन आरोपों को अभी जांच के स्तर पर ही माना जाना चाहिए। क्राइम ब्रांच की जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों के समर्थन में क्या साक्ष्य मिलते हैं और मामले में आगे किस तरह की कानूनी कार्रवाई की जाती है।

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