भंडारा। महाराष्ट्र के भंडारा में साइबर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है। 52 वर्षीय व्यक्ति को साइबर जालसाजों ने दो सप्ताह से अधिक समय तक कथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर डराकर 11.50 लाख रुपये ठग लिए। आरोपी ने खुद को मुंबई के एंटी-टेररिज्म स्क्वाड (ATS) का अधिकारी बताया और पीड़ित से दावा किया कि जम्मू-कश्मीर में उसके नाम से खुले बैंक खाते में करीब सात करोड़ रुपये का संदिग्ध लेनदेन हुआ है। जालसाज ने इस कथित लेनदेन का संबंध पुलवामा आतंकी हमले से बताकर पीड़ित को गंभीर कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया।

पुलिस के मुताबिक पीड़ित भंडारा का रहने वाला है। पूरे मामले की शुरुआत 12 अगस्त को हुई, जब उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से व्हाट्सऐप कॉल आया। फोन करने वाले व्यक्ति ने खुद को मुंबई ATS का अधिकारी बताया। सरकारी एजेंसी और आतंकवाद से जुड़े मामले का नाम सुनकर पीड़ित घबरा गया।

कॉलर ने दावा किया कि जम्मू-कश्मीर में पीड़ित के नाम से एक बैंक खाता खोला गया है। उसने कहा कि इस खाते के जरिए करीब सात करोड़ रुपये का लेनदेन हुआ है और जांच एजेंसियों को इसके तार पुलवामा आतंकी हमले से जुड़े होने का संदेह है। पीड़ित ने ऐसे किसी खाते या लेनदेन की जानकारी होने से इनकार किया, लेकिन आरोपी ने कथित जांच का डर दिखाकर बातचीत जारी रखी।

जालसाज ने पीड़ित को भरोसा दिलाया कि वह एक गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले की जांच के दायरे में है। इसके बाद उसे लगातार संपर्क में रहने और कथित अधिकारियों के निर्देशों का पालन करने के लिए कहा गया। पुलिस के अनुसार आरोपी ने इसी डर का फायदा उठाकर पीड़ित को दो सप्ताह से अधिक समय तक मानसिक दबाव में रखा।

साइबर ठगी के इस तरीके को आम तौर पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहा जाता है। इसमें अपराधी पुलिस, सीबीआई, ईडी, कस्टम, नारकोटिक्स विभाग या अन्य सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनकर लोगों से संपर्क करते हैं। इसके बाद मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स, फर्जी बैंक खाते, पार्सल या किसी गंभीर अपराध में नाम आने का डर दिखाया जाता है। पीड़ित को वीडियो या फोन कॉल पर लगातार निगरानी में रहने का भ्रम दिया जाता है और पैसे ट्रांसफर करवाए जाते हैं।

भंडारा के इस मामले में भी पीड़ित को कथित जांच के नाम पर अलग-अलग निर्देश दिए गए। आरोपियों ने उससे कहा कि मामले में अपनी बेगुनाही साबित करने और बैंक खातों की जांच के लिए उसे रकम ट्रांसफर करनी होगी। पीड़ित को कथित तौर पर यह विश्वास दिलाया गया कि जांच पूरी होने के बाद रकम वापस कर दी जाएगी।

डर और दबाव में आए व्यक्ति ने आरोपियों के बताए अलग-अलग बैंक खातों में पैसे भेजने शुरू कर दिए। इस तरह उससे कुल 11.50 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए गए। पैसे मिलने के बाद जालसाजों का व्यवहार बदलने और संपर्क टूटने पर पीड़ित को अपने साथ धोखाधड़ी होने का संदेह हुआ।

इसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा। शिकायत के आधार पर साइबर ठगी से संबंधित मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई है। पुलिस अब उन बैंक खातों की जानकारी जुटा रही है जिनमें पीड़ित से रकम ट्रांसफर कराई गई थी। साथ ही उस व्हाट्सऐप नंबर और अन्य डिजिटल माध्यमों की तकनीकी जांच की जा रही है जिनके जरिए आरोपी पीड़ित के संपर्क में थे।

जांच में बैंक खातों के वास्तविक धारकों की पहचान भी महत्वपूर्ण होगी। साइबर ठगी के मामलों में अपराधी अक्सर दूसरे लोगों के नाम पर खोले गए या कमीशन पर उपलब्ध कराए गए ‘म्यूल अकाउंट’ का इस्तेमाल करते हैं। रकम खाते में पहुंचने के बाद उसे तेजी से दूसरे खातों में भेजने या नकद निकालने की कोशिश की जाती है। हालांकि इस विशेष मामले में पैसे किन खातों में गए और उनके धारक कौन हैं, इसका पूरा विवरण जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

आरोपियों ने पुलवामा आतंकी हमले जैसे बेहद संवेदनशील मामले का नाम लेकर पीड़ित पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया। पुलिस के सामने अब यह पता लगाने की चुनौती है कि इस ठगी में कितने लोग शामिल थे और क्या इसी गिरोह ने अन्य लोगों को भी इसी तरह निशाना बनाया है।

सरकारी एजेंसियां लगातार स्पष्ट करती रही हैं कि कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई प्रक्रिया नहीं है। कोई पुलिस या जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को फोन अथवा वीडियो कॉल पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ करके बैंक खाते में रकम ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में लोगों को डिजिटल अरेस्ट जैसी साइबर धोखाधड़ी से सतर्क रहने की अपील कर चुके हैं।

साइबर अपराधी अक्सर पीड़ित को सोचने या परिवार से बात करने का समय नहीं देते। वे गिरफ्तारी, संपत्ति जब्त होने, बैंक खाता फ्रीज होने या परिवार के सदस्यों को कानूनी कार्रवाई में फंसाने जैसी धमकियां देकर दबाव बनाते हैं। कई मामलों में नकली पहचान पत्र, फर्जी गिरफ्तारी वारंट या सरकारी कार्यालय जैसा वीडियो कॉल बैकग्राउंड दिखाकर विश्वास पैदा करने की कोशिश की जाती है।

ऐसी स्थिति में किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर पैसे ट्रांसफर नहीं करने चाहिए। संदिग्ध कॉल आने पर संबंधित सरकारी एजेंसी के आधिकारिक नंबर से स्वतंत्र रूप से पुष्टि करनी चाहिए। वित्तीय साइबर धोखाधड़ी होने पर जितनी जल्दी संभव हो राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करना महत्वपूर्ण है। शिकायत राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर भी दर्ज की जा सकती है।

समय पर शिकायत करने से बैंकिंग सिस्टम के माध्यम से रकम को फ्रीज कराने की संभावना बढ़ सकती है, हालांकि पैसा वापस मिलने की गारंटी नहीं होती। पीड़ित को कॉल नंबर, व्हाट्सऐप चैट, बैंक ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड, स्क्रीनशॉट और अन्य डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने चाहिए।

भंडारा के मामले में फिलहाल पुलिस 11.50 लाख रुपये के वित्तीय लेनदेन और आरोपियों के डिजिटल फुटप्रिंट की जांच कर रही है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक पीड़ित को 12 अगस्त से निशाना बनाया गया और दो सप्ताह से अधिक समय तक कथित जांच के नाम पर डराया गया। मामले की पूरी जांच के बाद ही गिरोह के सदस्यों और रकम के अंतिम गंतव्य के बारे में स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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