30 से अधिक बच्चों की मौत से हड़कंप हाईकोर्ट ने अधिकारियों से मांगा जवाब
हाईकोर्ट सख्त अधिकारियों को नोटिस
बालाघाट: मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में संक्रामक बीमारियों से 30 से अधिक बच्चों की कथित मौत के मामले को लेकर हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों की मौत और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति से जुड़े मामले पर सुनवाई करते हुए अदालत ने संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, बीमारी की रोकथाम और प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासन की ओर से उठाए गए कदमों पर सवाल उठाए गए हैं।
बच्चों की मौत का मामला पहुंचा हाई कोर्ट
मामला बालाघाट के दूरस्थ और आदिवासी इलाकों में संक्रामक बीमारियों से बच्चों की मौत से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि प्रभावित क्षेत्रों में समय पर उचित स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलने और बीमारी फैलने के बावजूद पर्याप्त इंतजाम नहीं होने से स्थिति गंभीर हुई। मामला हाई कोर्ट पहुंचने के बाद अदालत ने इसे गंभीरता से लिया। संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर उनसे पूरे घटनाक्रम और अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी गई है। अदालत की कार्रवाई के बाद स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।
स्वास्थ्य सुविधाओं पर उठे सवाल
बालाघाट जिले में कई वनवासी और दूरस्थ गांव ऐसे हैं, जहां स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना लोगों के लिए बड़ी चुनौती है। बरसात के दौरान कई क्षेत्रों में संपर्क मार्ग प्रभावित होने से परेशानी और बढ़ जाती है। ऐसे में बच्चों को बुखार, दस्त, मलेरिया या अन्य संक्रामक बीमारी होने पर समय पर उपचार नहीं मिलने का खतरा रहता है। मध्य प्रदेश सरकार का स्वास्थ्य विभाग संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए निगरानी, जांच और उपचार कार्यक्रम चलाता है। विशेष रूप से मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में जांच और दवाओं की उपलब्धता पर जोर दिया जाता है।
मौत के वास्तविक कारण की जांच अहम
हालांकि 30 से अधिक बच्चों की सभी मौतों को किसी एक संक्रामक बीमारी से जोड़ना अभी उचित नहीं होगा। अलग-अलग मामलों में मृत्यु के कारण अलग हो सकते हैं। मेडिकल रिकॉर्ड, जांच रिपोर्ट और प्रशासनिक रिपोर्ट सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कितनी मौतें किस बीमारी के कारण हुईं और क्या इनमें स्वास्थ्य सेवाओं की कमी की कोई भूमिका रही। मामले में यही वजह है कि अदालत के सामने अधिकारियों का विस्तृत जवाब महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे प्रभावित गांवों में बीमारी की स्थिति, इलाज की व्यवस्था और बच्चों की मौत के कारणों की तस्वीर साफ हो सकती है।
प्रशासन से मांगा गया जवाब
हाई कोर्ट के नोटिस के बाद संबंधित विभागों को मामले में अपना पक्ष रखना होगा। अदालत यह जानना चाहती है कि बच्चों की मौत की सूचना मिलने के बाद प्रभावित क्षेत्रों में मेडिकल टीमें भेजी गईं या नहीं, बीमारी की पहचान के लिए क्या जांच हुई और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या व्यवस्था की गई है। मामले ने एक बार फिर दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं, डॉक्टरों की उपलब्धता, समय पर जांच और मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने की व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब हाई कोर्ट में अधिकारियों के जवाब और अगली सुनवाई पर नजर रहेगी।