इंदौर। गणेश चतुर्थी के आगमन के साथ ही देशभर में भगवान गणेश की मूर्तियों की मांग बढ़ गई है। इसी बीच मध्य प्रदेश के इंदौर का खरगोनकर परिवार अपनी 200 साल से ज्यादा पुरानी पारंपरिक कला को आज भी जीवित रखे हुए है। यह परिवार अहिल्याबाई होल्कर के समय से चली आ रही मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं बनाने की परंपरा को छठी पीढ़ी तक आगे बढ़ा रहा है।

खरगोनकर परिवार की खासियत यह है कि आज के दौर में भी यह मूर्तियां बनाने के लिए पारंपरिक तरीकों और प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल करता है। परिवार के सदस्य आधुनिक दौर की मांगों के साथ अपनी पुरानी कला और विरासत को बचाए रखने में जुटे हैं।

होल्कर राजघराने के लिए बनाते थे मूर्तियां

रिटायर्ड बैंक कर्मचारी और छठी पीढ़ी के कारीगर श्याम खरगोनकर बताते हैं कि उनका परिवार कई पीढ़ियों से मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं बनाता आ रहा है। यह परंपरा मराठा शासनकाल और होल्कर राजघराने के समय से जुड़ी हुई है।

उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज होल्कर शाही दरबार के लिए गणेश प्रतिमाएं तैयार करते थे। इन मूर्तियों को राजवाड़ा पैलेस और अन्य शाही स्थानों पर स्थापित किया जाता था। उस समय से चली आ रही यह कला आज भी परिवार के लिए सिर्फ रोजगार नहीं बल्कि गौरव और विरासत का प्रतीक है।

चार महीने की मेहनत से तैयार होती है एक मूर्ति

खरगोनकर परिवार की बनाई गणेश प्रतिमाएं अपनी खूबसूरती और पारंपरिक शैली के लिए जानी जाती हैं। श्याम खरगोनकर के अनुसार, एक मूर्ति को तैयार करने में लगभग चार महीने का समय लगता है।

मूर्ति बनाने की प्रक्रिया काफी मेहनत वाली होती है। सबसे पहले मिट्टी को तैयार किया जाता है, इसके बाद धीरे-धीरे मूर्ति का आकार दिया जाता है। सूखने के बाद उसमें बारीक नक्काशी और रंगों का काम किया जाता है।

हर प्रतिमा को बनाने में कारीगर अपनी कला और अनुभव का इस्तेमाल करते हैं, जिससे हर मूर्ति अलग और विशेष दिखाई देती है।

पूरा परिवार निभाता है जिम्मेदारी

इस पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने में खरगोनकर परिवार के सभी सदस्य योगदान देते हैं। परिवार की बेटियां, दामाद और पोते-पोतियां भी मूर्तियों को आकार देने, सजाने और रंगने के काम में हाथ बंटाते हैं।

परिवार का मानना है कि यह केवल एक काम नहीं बल्कि पीढ़ियों से मिली जिम्मेदारी है। नई पीढ़ी भी इस कला को सीख रही है ताकि आने वाले समय में यह परंपरा खत्म न हो।

प्राकृतिक मिट्टी से बनती हैं इको-फ्रेंडली मूर्तियां

खरगोनकर परिवार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे गणेश प्रतिमाएं बनाने के लिए केवल प्राकृतिक पीली मिट्टी का इस्तेमाल करते हैं। परिवार प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) से पूरी तरह दूरी बनाए रखता है।

परिवार का कहना है कि मिट्टी से बनी मूर्तियां पर्यावरण के लिए सुरक्षित होती हैं और आसानी से पानी में घुल जाती हैं। लोग इनका विसर्जन घर पर बाल्टी या छोटे पात्र में भी कर सकते हैं।

आज जब पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, ऐसे में इस तरह की पारंपरिक इको-फ्रेंडली मूर्तियों की मांग भी बढ़ रही है।

आधुनिक दौर में भी कायम है कला

बदलते समय के साथ मूर्ति निर्माण की शैली में काफी बदलाव आया है। बाजार में प्लास्टर ऑफ पेरिस और अन्य आधुनिक सामग्री से बनी मूर्तियां आसानी से उपलब्ध हैं, लेकिन खरगोनकर परिवार ने अपनी पारंपरिक शैली को नहीं छोड़ा।

परिवार का मानना है कि प्राकृतिक तरीके से बनी मूर्तियां न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी होती हैं बल्कि पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी दिखाती हैं।

विरासत को बचाने की कोशिश

श्याम खरगोनकर बताते हैं कि उनके परिवार ने इस कला को हमेशा सम्मान के साथ आगे बढ़ाया है। कई पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को बचाना उनके लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी भी इस काम में रुचि दिखा रही है। इससे उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में भी यह कला जीवित रहेगी।

गणेश उत्सव के साथ बढ़ी तैयारियां

गणेश चतुर्थी नजदीक आते ही खरगोनकर परिवार के घर और कार्यस्थल पर तैयारियां तेज हो जाती हैं। कारीगर दिन-रात मेहनत कर प्रतिमाओं को अंतिम रूप देते हैं।

लोग दूर-दूर से इन पारंपरिक गणेश प्रतिमाओं को लेने पहुंचते हैं। परिवार की बनाई मूर्तियां धार्मिक आस्था के साथ-साथ इंदौर की ऐतिहासिक कला और संस्कृति की पहचान भी बन चुकी हैं।

200 साल से अधिक पुरानी इस परंपरा को संभालकर खरगोनकर परिवार यह साबित कर रहा है कि विरासत और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाकर पुरानी कलाओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता है।

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