अष्टा (मध्य प्रदेश): आष्टा शहर में सोमवार से शुरू होने वाले दस दिवसीय गणेश उत्सव की तैयारियां तेज हो गई हैं। कारीगर भगवान गणेश की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं, वहीं पूजा समितियां स्थापना के लिए पंडाल तैयार कर रही हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पांच हजार से अधिक बड़ी प्रतिमाओं पर अंतिम चरण का काम चल रहा है। इनके अलावा बड़ी संख्या में छोटी प्रतिमाएं भी तैयार की गई हैं। कई पंडालों में प्रतिमाएं पहुंच चुकी हैं और समितियां स्थापना से पहले की व्यवस्थाएं पूरी कर रही हैं।

गणेश उत्सव की शुरुआत नजदीक आने के साथ मूर्ति निर्माण से जुड़े कार्यों में व्यस्तता बढ़ गई है। प्रतिमाओं के आकार और स्वरूप के अनुसार कारीगर उनके अंतिम काम पूरे कर रहे हैं। बड़ी प्रतिमाओं के साथ छोटी मूर्तियों की उपलब्धता से अलग-अलग जरूरतों के लिए विकल्प तैयार हुए हैं। हालांकि, पांच हजार से अधिक बड़ी प्रतिमाओं का आंकड़ा निर्माण से जुड़ा विवरण है। इसे शहर में उतनी ही संख्या में सार्वजनिक पंडाल स्थापित होने का आंकड़ा नहीं माना जा सकता।

पूजा समितियों ने भगवान गणेश की प्रतिमाएं स्थापित करने के लिए टेंट लगा लिए हैं। इससे उत्सव की तैयारियां अब प्रतिमा निर्माण से आगे बढ़कर स्थापना स्थलों तक पहुंच गई हैं। कई पंडालों में प्रतिमाएं पहले ही लाई जा चुकी हैं। अन्य प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम जारी है। सोमवार से शुरू होने वाले आयोजन से पहले समितियों और कारीगरों के लिए शेष व्यवस्थाएं पूरी करना प्रमुख काम है। प्रत्येक पंडाल की तैयारी उसकी अपनी योजना के अनुसार आगे बढ़ रही है।

स्थानीय कारीगर दुर्गा पेंटर ने बताया कि उन्होंने भगवान की अलग-अलग रूपों में प्रतिमाएं बनाई हैं। उनके अनुसार, शंभू और राधा-कृष्ण से जुड़े स्वरूपों के साथ डांडिया खेलते हुए दिखाई देने वाली प्रतिमाएं भी तैयार की गई हैं। मोर, कमल, मूषक और झूले पर विराजमान स्वरूप भी उनके काम में शामिल हैं। इन विविध प्रस्तुतियों से प्रतिमाओं में अलग-अलग कलात्मक विषय दिखाई देते हैं। कारीगर का विवरण उत्सव के लिए तैयार किए गए स्वरूपों की विविधता सामने लाता है।

प्रतिमा निर्माण में भगवान का स्वरूप और उसके साथ जुड़ी सजावटी प्रस्तुति महत्वपूर्ण होती है। दुर्गा पेंटर की ओर से बताए गए मोर, कमल, मूषक और झूले वाले रूप इसी विविधता का हिस्सा हैं। डांडिया से जुड़ी प्रस्तुति भी पारंपरिक उत्सव के साथ कलात्मक अभिव्यक्ति जोड़ती है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में किसी एक स्वरूप की सबसे अधिक मांग या बिक्री का आंकड़ा नहीं दिया गया है। इसलिए किसी विशेष प्रतिमा को इस बार सबसे लोकप्रिय बताने का आधार नहीं है।

बड़ी प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने के साथ छोटी मूर्तियों का तैयार होना भी उत्सव की तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अलग-अलग आकार की प्रतिमाओं के लिए स्थापना स्थल और व्यवस्था की जरूरतें अलग होती हैं। पूजा समितियां अपने पंडालों के अनुरूप तैयारी कर रही हैं। प्रतिमा पहुंचने के बाद उसके सुरक्षित स्थान पर रखने और स्थापना की व्यवस्था पूरी करने का चरण आता है। कई पंडालों में प्रतिमाएं पहले पहुंच जाने से संबंधित समितियों को आयोजन से पहले तैयारी का समय मिला है।

दस दिवसीय आयोजन के लिए तैयारियां केवल शुरुआत के दिन तक सीमित नहीं होतीं। स्थापना स्थल को पूरे उत्सव के दौरान उपयोग योग्य रखना भी आवश्यक होता है। अभी सामने आया विवरण मुख्य रूप से मूर्तियों और टेंट की तैयारियों से संबंधित है। इससे शहर में बप्पा के स्वागत की दिशा में हो रहे काम की तस्वीर मिलती है। हालांकि, पंडालवार धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रमों का विस्तृत आयोजन क्रम साझा नहीं किया गया है। समितियों की अलग-अलग गतिविधियां उनके कार्यक्रम के अनुसार होंगी।

कारीगरों और पूजा समितियों के काम के बीच समन्वय इस समय महत्वपूर्ण है। प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने के बाद उन्हें संबंधित स्थापना स्थल तक पहुंचाना होता है। दूसरी ओर, समितियों को प्रतिमा आने से पहले उपयुक्त स्थान तैयार करना पड़ता है। शहर में दोनों स्तरों पर काम आगे बढ़ रहा है। कई प्रतिमाओं का पंडालों तक पहुंच जाना इस प्रक्रिया की प्रगति दिखाता है। बाकी तैयारियां उत्सव शुरू होने से पहले पूरी करने पर ध्यान केंद्रित है।

गणेश उत्सव स्थानीय कला और सामूहिक आयोजन को एक साथ सामने लाता है। प्रतिमा बनाने वाले कारीगर अपने काम के जरिए भगवान के विविध स्वरूप प्रस्तुत करते हैं, जबकि पूजा समितियां उन्हें स्थापित करने की व्यवस्था संभालती हैं। आष्टा में बड़ी संख्या में प्रतिमाओं की तैयारी इसी संयुक्त गतिविधि का हिस्सा है। फिर भी इस आधार पर कारीगरों की आय, कुल कारोबार या पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। ऐसे आर्थिक आंकड़े उपलब्ध विवरण में नहीं हैं।

फिलहाल आष्टा में सोमवार की शुरुआत से पहले प्रतिमा निर्माण और पंडाल तैयार करने का काम जारी है। पांच हजार से ज्यादा बड़ी प्रतिमाओं के साथ छोटी मूर्तियों की तैयारी ने आयोजन की व्यापकता सामने रखी है। दुर्गा पेंटर जैसे कारीगर विविध स्वरूपों को अंतिम रूप दे रहे हैं। पूजा समितियां अपने स्थापना स्थलों पर तैयारियां पूरी कर रही हैं। अब उत्सव की शुरुआत के साथ इन तैयारियों का अंतिम स्वरूप शहर के विभिन्न पंडालों में दिखाई देगा।

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