श्योपुर: भारी बारिश और घने बादलों ने कुनो नेशनल पार्क में चीता प्रोजेक्ट की निगरानी व्यवस्था के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। खराब मौसम के दौरान सैटेलाइट और रेडियो संचार में रुकावट आने से रेडियो कॉलर लगे चीतों की वास्तविक लोकेशन का डेटा समय पर नहीं मिल पा रहा है। इसके कारण फील्ड में तैनात टीमों को चीतों की गतिविधियों का पता लगाने और उनकी निगरानी करने में अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही है।
कुनो नेशनल पार्क की ओर से जारी न्यूज़लेटर में मानसून के दौरान सामने आ रही इन व्यावहारिक समस्याओं का उल्लेख किया गया है। न्यूज़लेटर के अनुसार चीता निगरानी व्यवस्था केवल रेडियो कॉलर या सैटेलाइट तकनीक तक सीमित नहीं है। इसमें तकनीकी उपकरणों, वाहनों, संचार नेटवर्क और नियंत्रण कक्ष के साथ मैदानी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। मौसम खराब होने पर इस पूरी व्यवस्था की क्षमता और आपसी समन्वय की परीक्षा होती है।
कुनो में रेडियो कॉलर लगे 30 चीतों की लगातार निगरानी की जा रही है। इनके कॉलर से मिलने वाले सैटेलाइट और रेडियो संकेतों के माध्यम से उनकी स्थिति तथा गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटाई जाती है। यह डेटा फील्ड टीमों को संबंधित चीते तक पहुंचने, उसके व्यवहार को समझने और जरूरत पड़ने पर तत्काल कदम उठाने में सहायता करता है। निगरानी से चीतों की सेहत, आवाजाही और उनके द्वारा चुने गए इलाके के बारे में भी जानकारी मिलती है।
भारी बारिश और घने बादलों के दौरान सैटेलाइट सिग्नल तथा रेडियो कम्युनिकेशन प्रभावित हो सकते हैं। कई बार कॉलर से भेजे जाने वाले डेटा के ट्रांसमिशन में देरी हो जाती है, जबकि कुछ अवसरों पर निर्धारित समय पर सिग्नल प्राप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में चीते की वास्तविक गतिविधि और नियंत्रण कक्ष में उपलब्ध उसकी आखिरी लोकेशन के बीच समय का अंतर पैदा हो जाता है। संबंधित चुनौती का उल्लेख हाल की मीडिया रिपोर्ट में भी किया गया है।
डेटा मिलने में होने वाली देरी का यह अर्थ नहीं है कि संबंधित चीता अनिवार्य रूप से लापता हो गया है। सिग्नल बाधित होने की स्थिति तकनीकी या मौसम संबंधी भी हो सकती है। ऐसे मामलों में मैदानी टीम आखिरी उपलब्ध लोकेशन, रेडियो सिग्नल, पैरों के निशान और स्थानीय स्तर से मिलने वाली सूचनाओं की सहायता से निगरानी जारी रखती है। सिग्नल दोबारा मिलने पर नई लोकेशन और पुरानी जानकारी के बीच के अंतर का आकलन किया जाता है।
मानसून के दौरान जंगल के भीतर काम करना भी आसान नहीं होता। कच्चे रास्तों पर कीचड़ और जलभराव होने से वाहनों की आवाजाही प्रभावित होती है। छोटे नाले उफान पर आने से कुछ मार्ग अस्थायी रूप से बंद हो सकते हैं। घास और झाड़ियां तेजी से बढ़ने के कारण दूर से चीते को देखना कठिन हो जाता है। इन परिस्थितियों में कर्मचारियों को कई बार वाहन छोड़कर पैदल आगे बढ़ना पड़ता है। इससे निगरानी में लगने वाला समय और जोखिम दोनों बढ़ जाते हैं।
रेडियो ट्रैकिंग के दौरान फील्ड कर्मचारियों को दिशा बताने वाले सिग्नल के आधार पर आगे बढ़ना होता है। पहाड़ी क्षेत्र, घना जंगल और खराब मौसम रेडियो तरंगों के प्रसार को प्रभावित कर सकते हैं। यदि चीता किसी घाटी, झाड़ी या दूरस्थ इलाके में मौजूद हो तो सिग्नल कमजोर हो सकता है। ऐसे में अलग-अलग दिशाओं से लोकेशन का अनुमान लगाने की कोशिश की जाती है। टीमों के बीच लगातार संपर्क बनाए रखना भी जरूरी होता है।
चीता प्रोजेक्ट के लिए नियमित निगरानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चीतों की गतिविधियां बड़े इलाके में फैल सकती हैं। किसी चीते के संरक्षित क्षेत्र की सीमा के पास पहुंचने या उससे बाहर जाने की स्थिति में वन विभाग को समय पर जानकारी मिलना आवश्यक है। इससे आसपास के गांवों को सतर्क करने, निगरानी दल भेजने और मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावनाओं को कम करने में सहायता मिलती है।
बारिश के मौसम में कॉलर और दूसरे उपकरणों की कार्यक्षमता पर भी विशेष ध्यान देना पड़ता है। तकनीकी कर्मचारियों को बैटरी, सिग्नल और डेटा ट्रांसमिशन की स्थिति की नियमित समीक्षा करनी होती है। किसी एक माध्यम से जानकारी नहीं मिलने पर दूसरे उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है। यही वजह है कि निगरानी प्रणाली को तकनीक और मानव संसाधन के संयुक्त नेटवर्क के रूप में तैयार किया गया है।
फील्ड कर्मचारियों की भूमिका विशेष रूप से अहम है। सैटेलाइट डेटा दिशा और संभावित लोकेशन की जानकारी दे सकता है, लेकिन जमीन पर चीते की वास्तविक स्थिति की पुष्टि कर्मचारी ही करते हैं। वे जानवर के व्यवहार, उसकी चाल, आसपास मौजूद शिकार और किसी संभावित खतरे का प्रत्यक्ष आकलन करते हैं। बारिश के बीच यह जिम्मेदारी अधिक कठिन हो जाती है।
न्यूज़लेटर में इस चुनौती का उल्लेख निगरानी व्यवस्था की कमजोरियों को पहचानने और उसे अधिक मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मानसून में सामने आने वाले अनुभव भविष्य के लिए संचार नेटवर्क, उपकरणों की विश्वसनीयता और वैकल्पिक ट्रैकिंग व्यवस्था को बेहतर करने में उपयोगी हो सकते हैं।
कुनो में फिलहाल निगरानी टीमें मौसम की बाधाओं के बावजूद चीतों पर नजर बनाए हुए हैं। डेटा मिलने में देरी और सिग्नल बाधित होने की स्थिति में जमीनी निगरानी बढ़ाई जा रही है। मानसून का यह दौर चीता प्रोजेक्ट के लिए केवल प्राकृतिक चुनौती नहीं बल्कि उसके तकनीकी और मैदानी प्रबंधन की वास्तविक परीक्षा भी बन गया है।