कोप्पल। कर्नाटक के कोप्पल जिले में हम्पी के आसपास स्थित किष्किंधा पहाड़ियों के जंगलों में करीब पांच दशकों बाद एक बार फिर बाघ की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। वन विभाग द्वारा लगाए गए कैमरा ट्रैप में बाघ की गतिविधियां कैद होने के बाद इलाके में वन्यजीवों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। वहीं, बाघ की मौजूदगी की खबर से आसपास के गांवों में रहने वाले लोगों में चिंता भी बढ़ गई है।

वन विभाग के मुताबिक, किष्किंधा पहाड़ियों के टेम्बा इलाके में लगाए गए कैमरा ट्रैप में रविवार को बाघ की तस्वीर और गतिविधियां रिकॉर्ड हुईं। विभाग ने इसके बाद क्षेत्र में बाघ की मौजूदगी की पुष्टि की है। स्थानीय लोगों से पिछले कुछ महीनों से बाघ जैसे बड़े वन्यजीव की मौजूदगी की जानकारी मिलने के बाद वन विभाग ने पहाड़ी क्षेत्र में निगरानी बढ़ाई थी।

1970 के दशक के बाद पहली बार बाघ की मौजूदगी



किष्किंधा पहाड़ियों और आसपास के जंगलों में आखिरी बार बाघ देखे जाने की जानकारी 1970 के दशक की बताई जा रही है। इसके बाद लंबे समय तक इस इलाके में बाघ की मौजूदगी का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया था।

करीब पांच दशक बाद कैमरे में बाघ के कैद होने को वन्यजीवों के लिहाज से महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बाघ संभवतः पिछले कुछ महीनों से इस क्षेत्र में मौजूद है और उसने किष्किंधा की पहाड़ियों को अपना अस्थायी ठिकाना बनाया हो सकता है।

बाघ के कैमरे में कैद होने से पहले स्थानीय स्तर पर उसकी मौजूदगी को लेकर कई तरह की चर्चाएं थीं। हालांकि, प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं होने के कारण वन विभाग इसकी पुष्टि नहीं कर पा रहा था। अब कैमरा ट्रैप से मिले दृश्य ने इन दावों को आधार दे दिया है।

तीन महीने से मिल रही थी बाघ की सूचना

वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, तालुक के एलुगुड्डा क्षेत्र में पिछले करीब तीन महीनों से स्थानीय लोगों की ओर से बाघ देखे जाने या उसकी मौजूदगी के संकेत मिलने की जानकारी दी जा रही थी।

लगातार मिल रही इन सूचनाओं को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग ने किष्किंधा पहाड़ियों के जंगलों में कैमरा ट्रैप लगाए। इन कैमरों के जरिए रात-दिन वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी।

रविवार को टेम्बा क्षेत्र में लगाए गए एक कैमरे में बाघ की गतिविधियां रिकॉर्ड हो गईं। इसके बाद वन अधिकारियों ने फुटेज की जांच कर इलाके में बाघ की मौजूदगी की पुष्टि की।

श्रीशैलम वाइल्डलाइफ कॉरिडोर से आने की संभावना

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि बाघ संभवतः किसी वन्यजीव गलियारे के जरिए किष्किंधा पहाड़ियों तक पहुंचा हो सकता है। इसके लिए आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम वाइल्डलाइफ कॉरिडोर से आने की संभावना जताई जा रही है।

बाघ लंबी दूरी तक घूमने और नए क्षेत्रों की तलाश करने के लिए जाने जाते हैं। खासकर युवा या नए क्षेत्र की तलाश में निकले बाघ एक जंगल से दूसरे जंगल तक पहुंच सकते हैं। ऐसे में किष्किंधा पहाड़ियों में बाघ की मौजूदगी को वन क्षेत्रों के बीच संभावित प्राकृतिक आवाजाही से जोड़कर देखा जा रहा है।

हालांकि, बाघ ने वास्तव में किस रास्ते से किष्किंधा पहाड़ियों तक पहुंच बनाई, इसकी पुष्टि के लिए वन विभाग को आगे निगरानी और अध्ययन करना होगा।

जंगल में बाघ की मौजूदगी से बढ़ी चिंता

बाघ के कैमरे में कैद होने के बाद वन क्षेत्र से लगे गांवों में रहने वाले लोगों की चिंता बढ़ गई है। ग्रामीणों को आशंका है कि यदि बाघ जंगल से बाहर निकलकर आबादी वाले इलाकों में पहुंचा तो मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति बन सकती है।

वन विभाग के लिए भी अब चुनौती यह है कि बाघ की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि वह मानव बस्तियों के करीब न पहुंचे। इसके लिए कैमरा ट्रैप की संख्या बढ़ाने और बाघ की आवाजाही वाले संभावित रास्तों की निगरानी करने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।

स्थानीय लोगों को भी जंगल या पहाड़ी क्षेत्रों में अकेले जाने से बचने और वन विभाग की सलाह का पालन करने की जरूरत है। खासकर रात के समय जंगल के आसपास आवाजाही को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतना जरूरी होगा।

वन विभाग ने बढ़ाई निगरानी

कैमरे में बाघ के दिखाई देने के बाद वन विभाग ने क्षेत्र की निगरानी को और गंभीरता से लेने की तैयारी की है। अधिकारियों के लिए अब यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि बाघ किस क्षेत्र में अधिक समय बिता रहा है, उसकी आवाजाही का दायरा कितना है और क्या वह लगातार किष्किंधा पहाड़ियों में रह रहा है।

कैमरा ट्रैप से मिले फुटेज के आधार पर बाघ की पहचान और गतिविधियों का अध्ययन किया जा सकता है। इससे यह पता लगाने में भी मदद मिलेगी कि वह अकेला है या क्षेत्र में किसी अन्य बाघ की भी मौजूदगी है।

पर्यटन क्षेत्र होने से बढ़ी जिम्मेदारी

किष्किंधा पहाड़ियां हम्पी क्षेत्र के ऐतिहासिक और पर्यटन महत्व वाले इलाके के करीब हैं। ऐसे में यहां बाघ की मौजूदगी वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ पर्यटकों और स्थानीय लोगों की सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।

यदि बाघ लंबे समय तक इस क्षेत्र में रहता है, तो वन विभाग को पर्यटन गतिविधियों और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाना होगा। संवेदनशील क्षेत्रों में लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करने और वन्यजीवों को किसी तरह की परेशानी से बचाने के उपाय किए जा सकते हैं।

पांच दशक बाद लौटी बाघ की दस्तक

किष्किंधा पहाड़ियों में करीब पांच दशकों बाद बाघ की मौजूदगी की पुष्टि को वन्यजीवों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। इससे यह संभावना भी सामने आई है कि आसपास के जंगलों में बाघों की प्राकृतिक आवाजाही के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हो सकती हैं।

हालांकि, बाघ की मौजूदगी से स्थानीय लोगों की सुरक्षा को लेकर सतर्कता जरूरी है। वन विभाग अब कैमरा ट्रैप और अन्य निगरानी माध्यमों से उसकी गतिविधियों पर नजर रखेगा।

फिलहाल टेम्बा इलाके में कैमरे में कैद हुई बाघ की तस्वीर ने पांच दशक पुराने वन्यजीव रिकॉर्ड को फिर चर्चा में ला दिया है। आने वाले दिनों में निगरानी से यह स्पष्ट होगा कि बाघ किष्किंधा पहाड़ियों में स्थायी रूप से ठहरा है या यह उसकी लंबी दूरी की आवाजाही का एक पड़ाव मात्र है।

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