बेंगलुरु। कर्नाटक के चित्रदुर्ग, दावणगेरे और तुमकुरु जिलों में कम बारिश के कारण सुपारी की खेती करने वाले किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इन जिलों के गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में सुपारी की खेती करने वाले किसान अब अपनी फसल बचाने के लिए अतिरिक्त प्रयास कर रहे हैं।

बारिश की कमी के चलते खेतों में पानी की उपलब्धता घट गई है। ऐसे में कई किसान सुपारी के पेड़ों को बचाने के लिए पानी के टैंकर मंगवा रहे हैं, जबकि कुछ किसान दूसरी फसलों के लिए इस्तेमाल होने वाले बोरवेल के पानी को सुपारी के बागानों में लगा रहे हैं।

2.91 लाख हेक्टेयर में होती है सुपारी की खेती

चित्रदुर्ग, दावणगेरे और तुमकुरु जिलों में बड़े पैमाने पर सुपारी की खेती की जाती है। इन क्षेत्रों में करीब 2.91 लाख हेक्टेयर जमीन पर सुपारी के पेड़ लगे हुए हैं।

हालांकि, इन जिलों को सुपारी उत्पादन के पारंपरिक क्षेत्रों में नहीं माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में किसानों ने यहां बड़ी संख्या में सुपारी के बागान विकसित किए हैं।

अब कम बारिश और जल संकट के कारण इन बागानों को बचाना किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

टैंकर से पानी पहुंचा रहे किसान

बारिश नहीं होने से खेतों में नमी की कमी हो गई है और भूजल स्तर भी प्रभावित हुआ है।

कई किसान मजबूरी में निजी टैंकरों के जरिए सुपारी के पेड़ों तक पानी पहुंचा रहे हैं। इससे किसानों की लागत बढ़ रही है।

किसानों का कहना है कि सुपारी के पेड़ों को नियमित पानी की जरूरत होती है। लंबे समय तक पानी की कमी रहने पर पेड़ कमजोर हो सकते हैं और उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है।

बोरवेल के पानी पर बढ़ा दबाव

जिन किसानों के पास बोरवेल की सुविधा है, वे अब उसी पानी का इस्तेमाल सुपारी के बागानों के लिए कर रहे हैं।

हालांकि, पहले से ही सीमित भूजल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है।

किसानों को चिंता है कि अगर आने वाले समय में बारिश नहीं हुई तो बोरवेल का जलस्तर भी तेजी से नीचे जा सकता है।

उत्पादन पर पड़ सकता है असर

सुपारी एक लंबे समय वाली फसल है। इसके पेड़ों को तैयार होने में कई साल लगते हैं और एक बार बागान तैयार होने के बाद इसे नियमित देखभाल की जरूरत होती है।

किसानों का कहना है कि पानी की कमी का असर सिर्फ मौजूदा फसल पर नहीं, बल्कि भविष्य के उत्पादन पर भी पड़ सकता है।

अगर पेड़ों को पर्याप्त पानी नहीं मिला तो सुपारी के आकार और गुणवत्ता में गिरावट आ सकती है।

किसानों की बढ़ी लागत

कम बारिश के कारण किसानों का खर्च बढ़ गया है। पहले जहां प्राकृतिक बारिश से काफी हद तक सिंचाई की जरूरत पूरी हो जाती थी, वहीं अब उन्हें अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ रही है।

टैंकर से पानी मंगाने, मजदूरी और अन्य खर्चों के कारण खेती की लागत बढ़ रही है।

किसानों का कहना है कि बाजार में अच्छी कीमत मिलने के बावजूद बढ़ती लागत चिंता का विषय बनी हुई है।

जल संरक्षण की जरूरत

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में सुपारी की खेती के विस्तार के साथ जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।

बारिश के पानी का संरक्षण, तालाबों का विकास और आधुनिक सिंचाई तकनीकों का इस्तेमाल किसानों के लिए मददगार साबित हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक खेती को टिकाऊ बनाए रखने के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है।

सरकार से मदद की उम्मीद

किसान संगठनों ने सरकार से जल संकट वाले क्षेत्रों में सहायता उपलब्ध कराने की मांग की है।

उनका कहना है कि किसानों को सिंचाई सुविधाओं के विस्तार, जल संरक्षण योजनाओं और तकनीकी सहायता की जरूरत है।

किसानों को उम्मीद है कि सरकार सूखे जैसी स्थिति को देखते हुए राहत और सहायता के लिए कदम उठाएगी।

मौसम पर टिकी किसानों की उम्मीद

फिलहाल चित्रदुर्ग, दावणगेरे और तुमकुरु के सुपारी किसान बारिश का इंतजार कर रहे हैं।

यदि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश होती है तो किसानों को राहत मिल सकती है, लेकिन लंबे समय तक सूखे की स्थिति बनी रही तो सुपारी की खेती पर गंभीर असर पड़ सकता है।

कम बारिश ने इन जिलों के किसानों के सामने पानी की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है और अब उनकी नजरें मौसम के साथ-साथ सरकारी सहायता पर भी टिकी हैं।

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