उडुपी। कर्नाटक में कस्तूरीरंगन रिपोर्ट को लेकर राज्य सरकार और पश्चिमी घाट क्षेत्र में रहने वाले लोगों के बीच चर्चा तेज हो गई है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा है कि रिपोर्ट के दायरे में आने वाले इलाकों का भौतिक सर्वे यानी मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का सत्यापन कराने की मांग पर अधिकारियों के साथ चर्चा की जाएगी। इसके बाद ही सरकार इस पर कोई अंतिम फैसला लेगी। उन्होंने यह बात उडुपी जिले के हेबरी में स्थानीय निवासियों और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक में कही।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार केंद्र को अपना रुख बताने से पहले उन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की समस्याओं और चिंताओं को समझना चाहती है। बैठक में स्थानीय प्रतिनिधियों ने कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के तहत आने वाले इलाकों का जमीनी स्तर पर सर्वे कराने और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर क्षेत्रों का निर्धारण करने की मांग रखी।
स्थानीय लोगों ने उठाया भौतिक सर्वे का मुद्दा
हेबरी में हुई बैठक में अलग-अलग संगठनों के प्रतिनिधियों, जनप्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों ने पश्चिमी घाट से जुड़े मुद्दों पर मुख्यमंत्री के सामने अपनी बात रखी। प्रतिनिधियों ने कहा कि रिपोर्ट में शामिल कई इलाकों में आबादी रहती है और वहां खेती तथा अन्य स्थानीय गतिविधियां होती हैं। ऐसे में केवल नक्शे या पहले से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर क्षेत्र निर्धारित करने के बजाय मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए।
प्रतिनिधियों ने कर्नाटक में भी केरल मॉडल की तरह भौतिक सर्वे कराने की मांग रखी। उनके मुताबिक, इससे आबादी वाले क्षेत्रों और वन क्षेत्रों को अलग-अलग चिह्नित करने में मदद मिल सकती है। बैठक में विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग भी सामने आई।
केंद्र को 27 सितंबर तक भेजना है राज्य का फैसला
बैठक में मुख्यमंत्री शिवकुमार ने कहा कि राज्य सरकार को 27 सितंबर तक केंद्र सरकार को अपना निर्णय भेजना है। इसी वजह से सरकार अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों की राय और उनकी समस्याओं को समझने की प्रक्रिया में है। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों की राय को ध्यान में रखकर ही राज्य का पक्ष तैयार किया जाएगा।
शिवकुमार ने यह भी कहा कि सरकार ऐसे वादे या घोषणाएं नहीं करना चाहती जिन्हें बाद में लागू करना संभव न हो। उनका कहना था कि किसी भी निर्णय से पहले संबंधित अधिकारियों के साथ चर्चा और व्यावहारिक स्थिति का आकलन जरूरी है। बैठक में स्थानीय प्रतिनिधियों की ओर से क्षेत्रीय प्रबंधन योजना और हेबरी में तालुक अस्पताल जैसी मांगें भी रखी गईं। मुख्यमंत्री ने इन मुद्दों पर अधिकारियों के साथ चर्चा की बात कही।
क्या है कस्तूरीरंगन रिपोर्ट?
कस्तूरीरंगन समिति का गठन पश्चिमी घाट क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन से जुड़े सुझाव देने के लिए किया गया था। समिति की सिफारिशों में पश्चिमी घाट के करीब 37 प्रतिशत हिस्से को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के रूप में चिह्नित करने की बात कही गई थी।
केंद्र सरकार के एक आधिकारिक जवाब के अनुसार, कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाले हाई लेवल वर्किंग ग्रुप ने पश्चिमी घाट के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र के तौर पर चिह्नित किया था। यह क्षेत्र गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु समेत छह राज्यों में फैला है।
रिपोर्ट का मूल उद्देश्य पश्चिमी घाट की जैव विविधता और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की विकास संबंधी जरूरतों के बीच संतुलन बनाने के उपाय सुझाना था।
कर्नाटक में रिपोर्ट को लेकर स्थानीय चिंताएं
कर्नाटक के मालानाड और तटीय इलाकों में कस्तूरीरंगन रिपोर्ट को लेकर लंबे समय से स्थानीय स्तर पर चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं। हालिया बैठक में भी प्रतिनिधियों ने कहा कि रिपोर्ट के दायरे में आने वाले क्षेत्रों में आबादी और कृषि भूमि मौजूद है। इसलिए क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखते हुए फैसला लेने की जरूरत है।
स्थानीय प्रतिनिधियों के मुताबिक, भौतिक सर्वे से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि प्रस्तावित पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र में वास्तव में कौन-कौन से भू-भाग आते हैं और वहां की जमीन का मौजूदा उपयोग क्या है। इसी आधार पर उन्होंने विशेषज्ञ समिति और जमीनी सर्वे की मांग की है।
केरल मॉडल का भी दिया गया हवाला
बैठक में प्रतिनिधियों ने केरल में किए गए भौतिक सर्वे का हवाला देते हुए कर्नाटक में भी इसी तरह की प्रक्रिया अपनाने की मांग की। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, प्रतिनिधियों का दावा है कि केरल में उच्चस्तरीय समिति के जरिए जमीनी सर्वे कराया गया और आबादी वाले क्षेत्रों तथा वन क्षेत्रों को अलग करने की कोशिश की गई।
इसी मॉडल के आधार पर कर्नाटक में भी वास्तविक स्थिति का आकलन करने की मांग उठाई गई है। हालांकि, राज्य सरकार ने अभी भौतिक सर्वे कराने का अंतिम निर्णय नहीं लिया है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि इस संबंध में अधिकारियों से चर्चा के बाद फैसला किया जाएगा।
पर्यावरण और स्थानीय हितों के बीच संतुलन पर जोर
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट को लेकर मुख्य बहस पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों की आजीविका एवं विकास संबंधी जरूरतों के बीच संतुलन को लेकर है। पश्चिमी घाट देश के महत्वपूर्ण जैव विविधता वाले क्षेत्रों में शामिल है और इसके संरक्षण को लेकर केंद्र सरकार की ओर से लंबे समय से कदम उठाए जाते रहे हैं। दूसरी ओर, रिपोर्ट के दायरे में आने वाले इलाकों में रहने वाले लोगों की ओर से भूमि उपयोग, खेती और स्थानीय विकास पर संभावित प्रभावों को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं।
केंद्र सरकार ने भी पश्चिमी घाट के लिए जारी मसौदा अधिसूचनाओं में राज्यों और अन्य हितधारकों की चिंताओं को शामिल करने की प्रक्रिया अपनाई है। 2024 के मसौदा नोटिफिकेशन में छह राज्यों में कुल 56,825.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र के रूप में प्रस्तावित किया गया था। बाद में राज्यों के सुझावों और आपत्तियों पर विचार के लिए केंद्र ने समिति गठित की।
अब कर्नाटक सरकार के सामने स्थानीय लोगों की मांग, पर्यावरण संरक्षण और केंद्र को भेजे जाने वाले राज्य के आधिकारिक रुख के बीच समन्वय करने की चुनौती है। मुख्यमंत्री शिवकुमार के अनुसार, सरकार पहले अधिकारियों के साथ भौतिक सर्वे की मांग पर चर्चा करेगी और उसके बाद आगे का फैसला लिया जाएगा।