धारवाड़। मध्य प्रदेश में मूंग की कटाई शुरू होने के साथ ही किसानों के सामने इस बार उत्पादन में बड़ी गिरावट का संकट खड़ा हो गया है। कम बारिश, लंबे समय तक बादल छाए रहने, बीमारी और कम बुवाई के कारण मूंग की पैदावार में करीब 30 प्रतिशत तक कमी आने की आशंका जताई जा रही है। फसल को नुकसान पहुंचने के साथ-साथ बाजार में कीमतों में आई गिरावट ने किसानों की परेशानी और बढ़ा दी है।
कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों के मुताबिक, इस सीजन में बारिश सामान्य से करीब 35 प्रतिशत कम रही। मूंग की फसल के लिए पर्याप्त नमी जरूरी होती है, लेकिन कई इलाकों में बारिश की कमी के कारण पौधों की शुरुआती बढ़वार प्रभावित हुई। इसके बाद लंबे समय तक आसमान में बादल छाए रहने से फसल में बीमारी फैलने की स्थिति बनी। विशेष रूप से येलो मोज़ेक बीमारी ने मूंग की फसल को काफी नुकसान पहुंचाया है।
येलो मोज़ेक के प्रकोप के कारण पौधों की पत्तियों पर पीले धब्बे पड़ने लगते हैं और पौधों की सामान्य वृद्धि प्रभावित होती है। बीमारी के गंभीर असर की स्थिति में पौधे कमजोर हो जाते हैं और फलियों का विकास भी प्रभावित हो सकता है। किसानों का कहना है कि इस बार कई खेतों में बीमारी के कारण पौधों की स्थिति सामान्य नहीं रही और उन्हें अपेक्षित उत्पादन मिलने की उम्मीद कम हो गई है।
बारिश की कमी के बावजूद कुछ क्षेत्रों में पौधों की अत्यधिक बढ़त भी किसानों के लिए समस्या बनी। फसल की सामान्य संरचना प्रभावित होने से फलियों के बनने में देरी हुई। जिन पौधों में समय पर फलियां आनी चाहिए थीं, वहां विकास की प्रक्रिया धीमी रही। इससे फसल की कटाई का समय भी प्रभावित हुआ और उत्पादन को लेकर अनिश्चितता बढ़ी।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, मूंग की फसल के लिए मौसम का संतुलित रहना महत्वपूर्ण होता है। शुरुआत में पर्याप्त नमी, उसके बाद अनुकूल तापमान और समय पर धूप फसल के विकास में मदद करती है। इस बार कम बारिश और लंबे समय तक बादल छाए रहने के कारण मौसम की परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहीं। इससे पौधों की वृद्धि और फलियों के विकास पर असर पड़ा।
फसल को केवल मौसम और बीमारी से ही नुकसान नहीं हुआ। कई क्षेत्रों में कीटों के हमले ने भी किसानों की मुश्किलें बढ़ाईं। बीमारी और कीटों के एक साथ प्रभाव के कारण किसानों को फसल बचाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करना पड़ा। कुछ किसानों ने कीटनाशकों और अन्य कृषि उपायों पर खर्च किया, लेकिन इसके बावजूद उत्पादन में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका।
मूंग की कम बुवाई भी इस बार कुल उत्पादन में गिरावट का एक महत्वपूर्ण कारण मानी जा रही है। जिन क्षेत्रों में किसानों ने कम रकबे में मूंग बोई, वहां कुल उत्पादन स्वाभाविक रूप से प्रभावित होगा। मौसम को लेकर अनिश्चितता और पिछले सीजन के बाजार भाव जैसे कई कारणों से किसानों के बीच मूंग की बुवाई को लेकर उत्साह कम रहा।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि उत्पादन घटने की आशंका के बीच किसानों को बाजार में भी राहत नहीं मिल रही है। मूंग की कीमतों में गिरावट ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। किसानों का कहना है कि एक तरफ उत्पादन कम हुआ है और दूसरी तरफ बाजार में उन्हें फसल का उचित मूल्य नहीं मिल रहा। ऐसे में खेती पर किया गया खर्च निकालना भी मुश्किल हो सकता है।
मूंग की खेती में बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई, कीटनाशक और कटाई का खर्च शामिल होता है। यदि मौसम की मार से उत्पादन कम हो जाए और बाजार में कीमत भी कमजोर रहे, तो किसानों की वास्तविक आय पर दोहरा असर पड़ता है। इस बार कई किसान इसी स्थिति से गुजरने की आशंका जता रहे हैं।
फसल की कटाई शुरू होने के साथ अब वास्तविक उत्पादन की तस्वीर धीरे-धीरे साफ होगी। खेतों से आने वाली उपज और मंडियों में पहुंचने वाले माल के आधार पर यह पता चलेगा कि उत्पादन में गिरावट कितनी रही। हालांकि शुरुआती परिस्थितियों को देखते हुए कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों का अनुमान है कि पैदावार में करीब 30 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।
किसानों के लिए फसल की गुणवत्ता भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। बीमारी और कीटों के असर से केवल उत्पादन की मात्रा ही नहीं, बल्कि दाने की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है। यदि बाजार में गुणवत्ता के आधार पर कम कीमत मिलती है, तो किसानों को अतिरिक्त आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
लंबे समय तक बादल छाए रहने की स्थिति ने फसल के लिए एक और चुनौती पैदा की। पर्याप्त धूप न मिलने से पौधों की सामान्य जैविक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। बारिश और धूप के बीच संतुलन बिगड़ने पर फलियों का विकास और दाने भरने की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है। इस बार किसानों ने कई इलाकों में ऐसी परिस्थितियां देखीं।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम के बीच किसानों को रोगरोधी किस्मों, बेहतर बीज उपचार और समय पर कीट एवं रोग प्रबंधन पर अधिक ध्यान देना होगा। साथ ही मौसम आधारित कृषि सलाह को गांव स्तर तक पहुंचाना भी जरूरी है, ताकि किसान बीमारी और कीटों के शुरुआती लक्षणों की पहचान कर समय रहते उपाय कर सकें।
सरकार और कृषि विभाग के सामने भी किसानों को राहत देने की चुनौती है। यदि उत्पादन में बड़ी गिरावट आती है और बाजार भाव कमजोर रहता है, तो किसानों की आय पर इसका सीधा असर पड़ेगा। ऐसे में मंडियों में उपज की उचित कीमत, फसल की गुणवत्ता के अनुसार पारदर्शी खरीद और किसानों को समय पर कृषि सलाह उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण होगा।
मूंग जैसी दलहन फसलें किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं। घरेलू बाजार में दालों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए इनका पर्याप्त उत्पादन जरूरी है। यदि किसी एक सीजन में मौसम की वजह से उत्पादन घटता है, तो इसका असर आगे चलकर बाजार की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल मूंग की कटाई का दौर शुरू हो चुका है और किसानों की नजर अब खेतों से निकलने वाली वास्तविक उपज तथा मंडियों में मिलने वाले भाव पर टिकी है। 35 प्रतिशत कम बारिश, येलो मोज़ेक बीमारी, लंबे समय तक बादल, कीटों के हमले और कम बुवाई ने इस सीजन में मूंग की खेती को मुश्किल बना दिया है। ऐसे में करीब 30 प्रतिशत उत्पादन गिरने का अनुमान किसानों के लिए बड़ी चिंता का विषय है। अब आने वाले हफ्तों में मंडियों में पहुंचने वाली फसल और बाजार भाव से इस नुकसान की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।