मैसूर। कर्नाटक के ऐतिहासिक और विश्व प्रसिद्ध मैसूर दशहरा उत्सव के तहत आयोजित होने वाला दशहरा फिल्म फेस्टिवल इस साल नहीं होगा। राज्य सरकार ने वर्ष 2026 के मैसूर दशहरा समारोह से फिल्म फेस्टिवल को हटाने का फैसला किया है। सरकार के इस निर्णय से फिल्म प्रेमियों के साथ ही कन्नड़ फिल्म उद्योग यानी सैंडलवुड से जुड़े कलाकारों और फिल्मकारों में नाराजगी देखी जा रही है। फिल्म जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि यह महोत्सव सिनेमा और दर्शकों को जोड़ने का एक महत्वपूर्ण मंच था। वहीं, प्रशासन ने कम दर्शक संख्या और आयोजन पर होने वाले भारी खर्च को इसे रद्द करने की प्रमुख वजह बताया है।

मैसूर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि कर्नाटक की कला, संस्कृति, परंपरा और विरासत का भव्य उत्सव माना जाता है। इस दौरान यूथ दशहरा, किसान दशहरा, बच्चों का दशहरा और स्पोर्ट्स दशहरा जैसे कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन्हीं आयोजनों में दशहरा फिल्म फेस्टिवल भी महत्वपूर्ण स्थान रखता था। महोत्सव के दौरान विभिन्न भाषाओं और विषयों पर आधारित फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता था। इससे दर्शकों को बड़े पर्दे पर अलग-अलग तरह की फिल्में देखने का अवसर मिलता था।

मैसूर के जिला मजिस्ट्रेट जी. लक्ष्मीकांत रेड्डी के अनुसार, प्रशासन ने फिल्म फेस्टिवल के पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों की समीक्षा की। जांच में सामने आया कि आयोजन को जनता से अपेक्षा के अनुरूप प्रतिक्रिया नहीं मिली। कई फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान दर्शकों की संख्या बेहद कम रही। बताया जाता है कि मल्टीप्लेक्स और सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली कुछ फिल्मों को देखने के लिए केवल तीन से पांच दर्शक ही पहुंचे थे।

प्रशासन का कहना है कि सीमित दर्शकों के बावजूद फिल्म फेस्टिवल आयोजित करने में हर साल करीब 40 से 45 लाख रुपये खर्च किए जाते थे। इसमें फिल्मों की स्क्रीनिंग, सिनेमाघरों की व्यवस्था, तकनीकी सुविधाओं, प्रचार-प्रसार और अन्य आयोजन संबंधी खर्च शामिल थे। लगातार कम होती दर्शक संख्या के कारण प्रशासन के सामने आयोजन की उपयोगिता को लेकर सवाल खड़े हो रहे थे। इसी आधार पर वर्ष 2026 में फिल्म फेस्टिवल आयोजित नहीं करने का निर्णय लिया गया।

सरकार के फैसले ने सैंडलवुड फिल्म इंडस्ट्री में बहस छेड़ दी है। फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि केवल दर्शक संख्या और खर्च के आधार पर सांस्कृतिक आयोजन को बंद करना उचित नहीं है। उनका कहना है कि यदि आयोजन को पर्याप्त दर्शक नहीं मिल रहे थे तो उसे रद्द करने के बजाय प्रचार की नई रणनीति बनाई जानी चाहिए थी। युवाओं, विद्यार्थियों और सिनेमा में रुचि रखने वाले लोगों को आकर्षित करने के लिए टिकट व्यवस्था तथा फिल्मों के चयन में बदलाव किया जा सकता था।

फिल्म प्रेमियों का कहना है कि दशहरा फिल्म फेस्टिवल के माध्यम से ऐसी फिल्मों को भी दर्शकों तक पहुंचने का अवसर मिलता था, जिन्हें सामान्य व्यावसायिक सिनेमाघरों में पर्याप्त स्क्रीन नहीं मिलती। क्षेत्रीय सिनेमा, कला फिल्मों, वृत्तचित्रों और अलग-अलग भाषाओं की चर्चित फिल्मों के प्रदर्शन से दर्शकों को सिनेमा की विविधता समझने का मौका मिलता था। ऐसे में फिल्म फेस्टिवल का बंद होना केवल मनोरंजन से जुड़ा मामला नहीं बल्कि सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए भी झटका माना जा रहा है।

कुछ लोगों ने आयोजन के प्रबंधन पर सवाल उठाते हुए कहा कि तीन से पांच दर्शकों का पहुंचना स्वयं इस बात का संकेत है कि फिल्म फेस्टिवल का प्रचार प्रभावी तरीके से नहीं किया गया। यदि फिल्मों की सूची, प्रदर्शन का समय और टिकट से जुड़ी जानकारी आम लोगों तक समय पर पहुंचाई जाती तो दर्शकों की संख्या बढ़ सकती थी। सोशल मीडिया अभियान, कॉलेजों से साझेदारी और फिल्मी हस्तियों की भागीदारी के माध्यम से भी महोत्सव को लोकप्रिय बनाया जा सकता था।

वहीं, प्रशासन का पक्ष है कि सार्वजनिक धन का इस्तेमाल ऐसे कार्यक्रमों में किया जाना चाहिए जिनमें लोगों की व्यापक भागीदारी हो। हर साल लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद यदि सिनेमाघरों में दर्शक नहीं पहुंच रहे हैं तो आयोजन जारी रखने के औचित्य की समीक्षा आवश्यक है। सरकार मैसूर दशहरा के अन्य लोकप्रिय आयोजनों को अधिक प्रभावी और भव्य बनाने पर ध्यान केंद्रित कर सकती है।

इस फैसले के बाद अब यह मांग उठ रही है कि सरकार फिल्म फेस्टिवल को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उसके स्वरूप में बदलाव करे। बड़े और खर्चीले आयोजन के स्थान पर सीमित स्क्रीनिंग, खुले मैदान में फिल्म प्रदर्शन, छात्रों के लिए विशेष शो या कम बजट वाला फिल्म महोत्सव आयोजित किया जा सकता है। ऑनलाइन पंजीकरण और दर्शकों की पसंद के आधार पर फिल्मों का चयन भी एक विकल्प हो सकता है।

फिलहाल वर्ष 2026 के मैसूर दशहरा में फिल्म फेस्टिवल नहीं होगा। प्रशासन इसे व्यावहारिक और वित्तीय आधार पर लिया गया निर्णय बता रहा है, जबकि फिल्म प्रेमी और सैंडलवुड से जुड़े लोग इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बढ़ती नाराजगी के बाद सरकार अपने निर्णय पर कायम रहती है या किसी नए स्वरूप में फिल्म फेस्टिवल को वापस लाने की पहल करती है।

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