बिना अनुमति विदेश यात्रा पर कुवेम्पु यूनिवर्सिटी के कुलपति को कारण बताओ नोटिस
कर्नाटक : राज्यपाल सचिवालय ने कुवेम्पु विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर शरथ अनंतमूर्ति को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कुलपति पर आरोप है कि उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और राज्यपाल से पूर्व अनुमति लिए बिना निजी कारणों से कई बार विदेश यात्राएं कीं। सचिवालय ने उनसे इन यात्राओं और अनुमति से जुड़ी प्रक्रिया के बारे में विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है।
राज्यपाल सचिवालय द्वारा जारी नोटिस का क्रमांक जीएस 07 केपीएम 2024 (पी-1) है और इस पर 2 सितंबर 2026 की तारीख दर्ज है। नोटिस में प्रो. अनंतमूर्ति से पूछा गया है कि कुलपति पद पर रहते हुए उन्होंने निजी विदेश यात्राओं से पहले कुलाधिपति की अनुमति क्यों नहीं ली। उनसे निर्धारित अवधि में अपना पक्ष और यात्राओं से संबंधित आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा गया है।
नोटिस के अनुसार, प्रो. शरथ अनंतमूर्ति ने 19 जून 2024 से 11 जुलाई 2024 तक कनाडा की यात्रा की थी। यह यात्रा करीब 23 दिनों की बताई गई है। सचिवालय का कहना है कि यह विदेश यात्रा निजी कारणों से की गई थी और इसके लिए राज्यपाल कार्यालय से पहले अनुमति प्राप्त नहीं की गई थी। इसे कुलपति जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद से जुड़ी निर्धारित प्रक्रिया के कथित उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है।
राज्यपाल राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति की भूमिका भी निभाते हैं। इस कारण कुलपति से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक विषयों, नियुक्तियों, अवकाश और विदेश यात्राओं में राजभवन या कुलाधिपति कार्यालय की भूमिका रहती है। कुलपति विश्वविद्यालय के प्रमुख प्रशासनिक और शैक्षणिक अधिकारी होते हैं, इसलिए लंबे समय तक मुख्यालय से बाहर रहने के लिए सक्षम प्राधिकारी को पहले सूचना देने तथा आवश्यक अनुमति लेने की प्रक्रिया का पालन अपेक्षित होता है।
नोटिस में कथित तौर पर एक से अधिक निजी विदेश यात्राओं का उल्लेख किया गया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में फिलहाल कनाडा की 23 दिवसीय यात्रा का विवरण प्रमुखता से सामने आया है। अन्य यात्राओं की तारीख, अवधि और उद्देश्य के बारे में विस्तृत आधिकारिक जानकारी अभी स्पष्ट नहीं है। कुलपति की ओर से जवाब मिलने के बाद इन यात्राओं से जुड़े तथ्य सामने आ सकते हैं।
कारण बताओ नोटिस किसी आरोप पर अंतिम फैसला नहीं होता। इसके माध्यम से संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने और आरोपों पर स्पष्टीकरण देने का अवसर मिलता है। इसलिए नोटिस जारी होने मात्र से प्रो. शरथ अनंतमूर्ति के खिलाफ लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं माने जा सकते। उनके जवाब और प्रस्तुत दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद ही राज्यपाल सचिवालय आगे का निर्णय लेगा।
कुलपति अपने उत्तर में यह स्पष्ट कर सकते हैं कि कनाडा यात्रा से पहले विश्वविद्यालय स्तर पर किस अधिकारी को सूचना दी गई थी। यह भी बताया जा सकता है कि यात्रा के दौरान छुट्टी की स्वीकृति किससे ली गई और कुलपति की अनुपस्थिति में विश्वविद्यालय का प्रशासनिक कार्य किस अधिकारी को सौंपा गया था। यदि अनुमति के लिए कोई पत्राचार किया गया था तो उससे संबंधित रिकॉर्ड भी जवाब के साथ प्रस्तुत किए जाने की संभावना है।
सचिवालय यह जानना चाहेगा कि यात्रा निजी थी या उसमें किसी प्रकार का शैक्षणिक कार्यक्रम भी शामिल था। यदि यात्रा पूरी तरह निजी थी तो उसका खर्च किस स्रोत से वहन किया गया, इस संबंध में भी जानकारी मांगी जा सकती है। सरकारी या विश्वविद्यालय के संसाधनों के उपयोग का प्रश्न उठने की स्थिति में वित्तीय दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण होगी।
लंबे समय तक कुलपति के विश्वविद्यालय से बाहर रहने पर शैक्षणिक और प्रशासनिक काम प्रभावित होने की आशंका रहती है। विश्वविद्यालय में परीक्षाओं, परिणामों, नियुक्तियों, वित्तीय स्वीकृतियों और शैक्षणिक परिषद से जुड़े कई मामलों में कुलपति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसी वजह से छुट्टी और विदेश यात्रा से संबंधित नियमों का स्पष्ट रूप से पालन आवश्यक माना जाता है।
कुलाधिपति कार्यालय से पूर्व अनुमति की व्यवस्था का उद्देश्य केवल यात्रा की जानकारी रखना नहीं, बल्कि कुलपति की अनुपस्थिति के दौरान प्रशासनिक जिम्मेदारियां तय करना भी होता है। यदि कुलपति कई दिनों तक देश से बाहर रहते हैं तो विश्वविद्यालय के दैनिक कामकाज के लिए वैकल्पिक व्यवस्था आवश्यक हो सकती है। इसकी जानकारी सक्षम प्राधिकारी के पास होना संस्थागत जवाबदेही का हिस्सा है।
कुवेम्पु विश्वविद्यालय के कुलपति को जारी नोटिस ने उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रशासनिक अनुशासन और पारदर्शिता का मुद्दा भी सामने ला दिया है। विश्वविद्यालयों को शैक्षणिक स्वायत्तता प्राप्त होती है, लेकिन उनके वरिष्ठ अधिकारियों को सेवा शर्तों, अवकाश और सरकारी दिशानिर्देशों का पालन करना होता है। नियमों के पालन से विश्वविद्यालय प्रशासन में स्पष्टता और विश्वास बना रहता है।
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रो. शरथ अनंतमूर्ति का जवाब होगा। यदि वह यह साबित करते हैं कि यात्रा की अनुमति ली गई थी या उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप संबंधित अधिकारियों को सूचना दी थी, तो मामले की दिशा बदल सकती है। यदि अनुमति नहीं ली गई थी तो उन्हें इसका कारण बताते हुए परिस्थितियों का विवरण देना होगा।
राज्यपाल सचिवालय कुलपति के उत्तर में दी गई जानकारी का उपलब्ध सरकारी और विश्वविद्यालय रिकॉर्ड से मिलान कर सकता है। पासपोर्ट की यात्रा प्रविष्टियां, अवकाश आवेदन, विश्वविद्यालय कार्यालय का पत्राचार और संबंधित बैठकों के रिकॉर्ड इस प्रक्रिया में देखे जा सकते हैं। इनसे पता चलेगा कि कुलपति कब विदेश में थे और उनकी अनुपस्थिति के दौरान प्रशासनिक जिम्मेदारियां कैसे निभाई गईं।
इस मामले पर विश्वविद्यालय की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने का भी इंतजार है। कुलपति व्यक्तिगत रूप से जवाब देंगे या विश्वविद्यालय प्रशासन उनके समर्थन में कोई रिकॉर्ड उपलब्ध कराएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया मिलने के बाद ही पूरे घटनाक्रम की संतुलित तस्वीर सामने आ सकेगी।
यदि सचिवालय कुलपति के जवाब से संतुष्ट होता है तो मामले का निपटारा किया जा सकता है। जवाब असंतोषजनक पाए जाने पर नियमानुसार आगे की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। कार्रवाई का स्वरूप विश्वविद्यालय के नियमों, कुलपति की सेवा शर्तों और कथित उल्लंघन की प्रकृति पर निर्भर करेगा।
फिलहाल 2 सितंबर को जारी कारण बताओ नोटिस ने प्रो. शरथ अनंतमूर्ति की विदेश यात्राओं को जांच के दायरे में ला दिया है। कनाडा की करीब 23 दिनों की निजी यात्रा के दौरान पूर्व अनुमति नहीं लेने का आरोप नोटिस का प्रमुख आधार है। कुलपति के स्पष्टीकरण के बाद यह साफ होगा कि मामला प्रक्रियागत चूक का है या इसके पीछे कोई अन्य परिस्थिति रही है।