बेंगलुरु। पश्चिमी घाट के संरक्षण को लेकर केंद्र और कर्नाटक सरकार के बीच मतभेद एक बार फिर सामने आ गए हैं। कर्नाटक सरकार ने के. कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों के आधार पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की ओर से जारी सातवें ड्राफ्ट नोटिफिकेशन को पूरी तरह खारिज करने का फैसला किया है। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह केंद्र के प्रस्ताव पर विस्तृत और मजबूत आपत्ति रिपोर्ट तैयार कर निर्धारित समय सीमा के भीतर भेजेगी।
कर्नाटक के मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने गुरुवार को विधानसभा में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पश्चिमी घाट से जुड़े प्रस्तावित पर्यावरणीय नियमों के संबंध में अपनी आपत्तियां मजबूती से केंद्र के सामने रखेगी। सरकार का कहना है कि पश्चिमी घाट के संरक्षण की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके लिए ऐसा मॉडल जरूरी है जिसमें पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों के हितों और राज्य की विकास संबंधी जरूरतों का भी ध्यान रखा जाए।
सातवें ड्राफ्ट नोटिफिकेशन पर आपत्ति
विधानसभा में विधायकों ए.एस. पोन्नन्ना और एच.डी. थम्मन्ना के सवालों का जवाब देते हुए रामलिंगा रेड्डी ने बताया कि केंद्र सरकार के MoEFCC ने 27 जुलाई 2026 को सातवां ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है। राज्य सरकार इस नोटिफिकेशन के खिलाफ अपनी आपत्तियां दर्ज कराएगी।
केंद्र के नियमों के मुताबिक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन प्रकाशित होने की तारीख से संबंधित राज्य सरकारों और अन्य हितधारकों को 60 दिनों के भीतर अपनी आपत्तियां या सुझाव देने होते हैं। कर्नाटक सरकार ने कहा है कि उसके पास इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अभी समय उपलब्ध है और इस अवधि के भीतर राज्य की विस्तृत रिपोर्ट केंद्र को भेज दी जाएगी।
रामलिंगा रेड्डी ने विधानसभा में कहा कि सरकार इस मुद्दे पर जल्दबाजी में फैसला नहीं लेगी और सभी संबंधित पहलुओं का अध्ययन करने के बाद मजबूत आपत्तियां दर्ज कराएगी।
पहले भी छह ड्राफ्ट हो चुके हैं जारी
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट को लेकर केंद्र सरकार की ओर से यह पहला ड्राफ्ट नोटिफिकेशन नहीं है। मंत्री के मुताबिक, पिछले छह ड्राफ्ट नोटिफिकेशन की समय सीमा समाप्त होने के बाद केंद्र ने सातवां ड्राफ्ट जारी किया है।
लगातार ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी होने के बावजूद पश्चिमी घाट के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर राज्यों और केंद्र के बीच सहमति नहीं बन पाई है। कर्नाटक सरकार पहले भी कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की कई सिफारिशों को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराती रही है।
राज्य का तर्क रहा है कि पश्चिमी घाट में रहने वाले लोगों की आजीविका, कृषि गतिविधियों और स्थानीय विकास को ध्यान में रखे बिना बड़े पैमाने पर प्रतिबंध लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा।
पर्यावरण संरक्षण बनाम विकास का सवाल
पश्चिमी घाट भारत के सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्रों में से एक है। यह क्षेत्र जैव विविधता, जंगलों, नदियों और जल संसाधनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से पश्चिमी घाट में अनियंत्रित निर्माण, खनन, औद्योगिक गतिविधियों और अन्य मानवीय हस्तक्षेप को लेकर चिंता जताते रहे हैं।
दूसरी ओर, पश्चिमी घाट क्षेत्र में रहने वाले लोगों और राज्य सरकारों की अपनी चिंताएं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और अन्य पारंपरिक गतिविधियां बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका का आधार हैं। राज्य सरकार का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण की नीतियां तैयार करते समय स्थानीय परिस्थितियों और लोगों की जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
यही वजह है कि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर कर्नाटक का रुख लगातार संवेदनशील रहा है। सरकार का मानना है कि व्यापक प्रतिबंधों से स्थानीय समुदायों पर आर्थिक असर पड़ सकता है।
60 दिनों में केंद्र को जवाब
रामलिंगा रेड्डी ने विधानसभा को बताया कि राज्य के पास केंद्र के सातवें ड्राफ्ट नोटिफिकेशन पर अपनी आपत्तियां और सुझाव भेजने के लिए 60 दिनों की समय सीमा है। उन्होंने कहा कि इस अवधि में सरकार अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी।
मंत्री के अनुसार, राज्य के पास अभी लगभग एक महीने का समय बाकी है और इसी अवधि के दौरान आपत्तियां केंद्र को सौंप दी जाएंगी। इससे संकेत मिलता है कि सरकार संबंधित विभागों और विशेषज्ञों से चर्चा के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ेगी।
राज्य सरकार का फैसला ऐसे समय आया है जब पश्चिमी घाट संरक्षण को लेकर पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन का मुद्दा फिर चर्चा में है। कर्नाटक के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिमी घाट का बड़ा हिस्सा राज्य के विभिन्न जिलों में फैला हुआ है।
स्थानीय लोगों के हितों का मुद्दा
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के विरोध में कर्नाटक में सबसे प्रमुख तर्क स्थानीय लोगों के हितों से जुड़ा रहा है। राज्य सरकार का कहना है कि किसी भी पर्यावरणीय क्षेत्र को संवेदनशील घोषित करने से पहले वहां रहने वाली आबादी और उनकी आर्थिक गतिविधियों का अध्ययन जरूरी है।
कृषि, बागवानी और अन्य स्थानीय गतिविधियों पर संभावित प्रतिबंधों को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में चिंता जताई जाती रही है। सरकार अब केंद्र के सातवें ड्राफ्ट पर अपनी आपत्तियों में इन मुद्दों को प्रमुखता से शामिल कर सकती है।
आगे बढ़ेगा केंद्र-राज्य संवाद
फिलहाल कर्नाटक सरकार ने सातवें ड्राफ्ट नोटिफिकेशन को स्वीकार करने के बजाय उसे पूरी तरह खारिज करने का रुख अपनाया है। हालांकि, अंतिम निर्णय केंद्र सरकार की प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।
राज्य की ओर से आपत्ति रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद केंद्र और कर्नाटक के बीच इस मुद्दे पर आगे बातचीत की संभावना है। पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए प्रभावी पर्यावरणीय उपायों के साथ स्थानीय समुदायों के हितों को संतुलित करना इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बना रहेगा।
कर्नाटक सरकार का स्पष्ट संदेश है कि वह पश्चिमी घाट के संरक्षण के खिलाफ नहीं है, लेकिन कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के आधार पर प्रस्तावित व्यवस्था को मौजूदा स्वरूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। अब नजर इस बात पर होगी कि राज्य सरकार अपनी आपत्ति रिपोर्ट में कौन-कौन से तर्क रखती है और केंद्र सातवें ड्राफ्ट नोटिफिकेशन पर कर्नाटक के विरोध का किस तरह जवाब देता है।