बेंगलुरु : कर्नाटक में आने वाले समय में बिजली संकट की स्थिति पैदा हो सकती है। कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून के कारण राज्य में जल विद्युत उत्पादन (हाइड्रोपावर जेनरेशन) पर बड़ा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। ऊर्जा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इस साल हाइड्रोपावर उत्पादन पिछले साल की तुलना में करीब 60 प्रतिशत तक कम हो सकता है।
कर्नाटक में बिजली उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा जल विद्युत परियोजनाओं पर निर्भर करता है। लेकिन इस बार मानसून की धीमी रफ्तार और कई इलाकों में सामान्य से कम बारिश के कारण बांधों में पानी का स्तर अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ पाया है। इसका सीधा असर बिजली उत्पादन क्षमता पर पड़ रहा है।
ऊर्जा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि राज्य में बिजली उत्पादन की स्थिति बांधों में उपलब्ध पानी पर निर्भर करती है। यदि जलाशयों में पानी का स्तर कम रहता है तो हाइड्रोपावर प्लांट पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाएंगे। ऐसे में बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ सकता है।
अधिकारियों के अनुमान के मुताबिक, पिछले साल की तुलना में इस वर्ष जल विद्युत उत्पादन में बड़ी गिरावट दर्ज की जा सकती है। पिछले साल अच्छे मानसून के कारण बांधों में पर्याप्त जल भंडारण था, जिससे हाइड्रोपावर परियोजनाओं से बेहतर उत्पादन हुआ था। लेकिन इस साल कमजोर बारिश ने स्थिति बदल दी है।
कर्नाटक के कई प्रमुख बांध और जलाशय राज्य की बिजली व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें जमा पानी का इस्तेमाल सिंचाई के साथ-साथ बिजली उत्पादन के लिए भी किया जाता है। मानसून कमजोर रहने से इन जलाशयों में पानी की आवक कम हुई है।
ऊर्जा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बिजली संकट से बचने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर भी ध्यान दिया जा रहा है। राज्य सरकार थर्मल पावर, सोलर एनर्जी और अन्य स्रोतों से बिजली उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रही है, ताकि मांग को पूरा किया जा सके।
कर्नाटक में गर्मी के महीनों के बाद मानसून के दौरान बिजली की मांग में बदलाव आता है, लेकिन औद्योगिक क्षेत्रों, शहरी इलाकों और कृषि क्षेत्र में बिजली की जरूरत लगातार बनी रहती है। ऐसे में हाइड्रोपावर उत्पादन में कमी आने से अतिरिक्त दबाव पैदा हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जल विद्युत उत्पादन पूरी तरह मौसम पर निर्भर करता है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो केवल हाइड्रोपावर पर निर्भर रहना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसके लिए ऊर्जा के अन्य स्रोतों को मजबूत करना और बिजली भंडारण की क्षमता बढ़ाना जरूरी है।
कर्नाटक देश के उन राज्यों में शामिल है जहां अक्षय ऊर्जा उत्पादन की क्षमता काफी अधिक है। राज्य में सौर और पवन ऊर्जा से भी बड़ी मात्रा में बिजली बनाई जाती है। हालांकि, इन स्रोतों का उत्पादन भी मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
हाल ही में सामने आई रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि कर्नाटक पीक रिन्यूएबल एनर्जी सीजन के दौरान उपलब्ध सोलर और विंड पावर का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। ऐसे में विशेषज्ञों का सुझाव है कि राज्य को ऊर्जा प्रबंधन और ग्रिड क्षमता को और मजबूत करना होगा।
कमजोर मानसून के चलते केवल बिजली उत्पादन ही नहीं, बल्कि कृषि और जल संसाधनों पर भी असर पड़ने की आशंका है। राज्य के कई हिस्सों में किसान बारिश का इंतजार कर रहे हैं। अगर बारिश की स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो पानी और बिजली दोनों से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
ऊर्जा विभाग लगातार बांधों में पानी के स्तर और बिजली उत्पादन की स्थिति की निगरानी कर रहा है। अधिकारियों का कहना है कि जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त बिजली खरीदने और अन्य स्रोतों से आपूर्ति बढ़ाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
सरकार की कोशिश है कि घरेलू उपभोक्ताओं, किसानों और उद्योगों को पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराई जा सके। इसके लिए बिजली कंपनियों को उत्पादन और आपूर्ति व्यवस्था की समीक्षा करने के निर्देश दिए गए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, बदलते मौसम पैटर्न को देखते हुए राज्यों को लंबे समय के लिए ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति तैयार करनी होगी। केवल मानसून आधारित जल विद्युत पर निर्भरता कम करके सौर, पवन और ऊर्जा भंडारण जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना जरूरी होगा।
फिलहाल कर्नाटक में बिजली संकट की आशंका कमजोर मानसून और घटते जल विद्युत उत्पादन के कारण बढ़ गई है। आने वाले हफ्तों में बारिश की स्थिति यह तय करेगी कि राज्य की बिजली व्यवस्था पर कितना असर पड़ेगा। सरकार और ऊर्जा विभाग की नजर अब मानसून की गतिविधियों और बांधों के जलस्तर पर बनी हुई है।