बेंगलुरु। कर्नाटक और उसके पड़ोसी राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे को लेकर विवाद कोई नया मुद्दा नहीं है। कावेरी और कृष्णा से लेकर तुंगभद्रा और महादायी तक, कर्नाटक लंबे समय से अंतर-राज्यीय जल विवादों का सामना करता आ रहा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य कम से कम 25 अंतर-राज्यीय जल विवाद मामलों में उलझा हुआ है, जिनमें से 17 मामले अभी सुप्रीम कोर्ट या विभिन्न जल विवाद न्यायाधिकरणों के सामने लंबित हैं।

इन विवादों के समाधान के लिए पिछले करीब तीन दशकों में कर्नाटक सरकार ने कानूनी लड़ाई पर 130 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं। इसके बावजूद, जब भी राज्य में बारिश कम होती है और जलाशयों में पानी की आवक घटती है, पड़ोसी राज्यों के साथ नदी जल बंटवारे का विवाद फिर से गहरा जाता है।

जल विशेषज्ञों का मानना है कि कर्नाटक के सामने समस्या केवल पानी की कमी की नहीं है, बल्कि राज्य की ओर से अपने जल अधिकारों को कानूनी और तकनीकी रूप से प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की भी है। कैप्टन राजा राव, जिन्होंने कावेरी, कृष्णा और महादायी जैसे प्रमुख नदी विवादों पर काम किया है, का कहना है कि कर्नाटक नदी जल में अपने हिस्से के दावे को पेश करने में कई बार गलतियां करता रहा है।

कर्नाटक की भौगोलिक स्थिति भी जल विवादों को जटिल बनाती है। राज्य की कई प्रमुख नदियां दूसरे राज्यों से होकर बहती हैं या उनका पानी कई राज्यों की जरूरतों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में सिंचाई, पेयजल, औद्योगिक उपयोग और पर्यावरणीय जरूरतों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होता।

कावेरी विवाद कर्नाटक के लिए सबसे पुराने और राजनीतिक रूप से संवेदनशील जल विवादों में से एक है। कावेरी नदी का पानी कर्नाटक और तमिलनाडु के अलावा केरल और पुडुचेरी की जरूरतों से भी जुड़ा है। खासकर कम बारिश वाले वर्षों में कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच पानी छोड़ने को लेकर तनाव बढ़ जाता है।

कर्नाटक का तर्क रहा है कि राज्य के अपने किसानों और बेंगलुरु जैसे तेजी से बढ़ते शहर की पेयजल जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। दूसरी ओर, निचले हिस्से में स्थित तमिलनाडु अपने हिस्से के पानी को लेकर दावा करता रहा है। मानसून कमजोर होने पर दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक बयानबाजी के साथ कानूनी और प्रशासनिक टकराव भी बढ़ जाता है।

इसी तरह कृष्णा नदी जल विवाद भी कर्नाटक के लिए महत्वपूर्ण है। कृष्णा नदी का पानी महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से जुड़ा हुआ है। नदी के पानी के बंटवारे को लेकर लंबे समय से न्यायाधिकरणों और अदालतों में मामले चलते रहे हैं। कर्नाटक उत्तरी और मध्य क्षेत्रों में सिंचाई तथा पेयजल के लिए कृष्णा नदी के पानी पर निर्भर है।

महादायी नदी विवाद में कर्नाटक का मुकाबला मुख्य रूप से गोवा से है, जबकि नदी का उद्गम क्षेत्र महाराष्ट्र से भी जुड़ा है। कर्नाटक महादायी के पानी का इस्तेमाल अपनी सूखाग्रस्त उत्तरी कर्नाटक की जरूरतों के लिए करना चाहता है। दूसरी ओर, गोवा नदी के प्राकृतिक प्रवाह और अपने पर्यावरणीय हितों को लेकर आपत्ति जताता रहा है।

तुंगभद्रा से जुड़े जल प्रबंधन और बंटवारे के मुद्दे भी कर्नाटक के लिए महत्वपूर्ण हैं। राज्य के कई कृषि क्षेत्र इन नदी प्रणालियों पर निर्भर हैं। जलाशयों में पानी कम होने पर सिंचाई की जरूरतों को पूरा करना चुनौती बन जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अंतर-राज्यीय नदी विवादों में केवल कानूनी दलील पर्याप्त नहीं होती। नदी के प्रवाह, वर्षा, जलग्रहण क्षेत्र, सिंचाई क्षेत्र, फसल पैटर्न, जनसंख्या, पेयजल जरूरत और पर्यावरणीय आवश्यकताओं से जुड़े वैज्ञानिक आंकड़े भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कैप्टन राजा राव के मुताबिक, कर्नाटक को अपने जल अधिकारों के मामलों में अधिक मजबूत तकनीकी और कानूनी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, यदि राज्य को अपने हिस्से का पानी हासिल करना है तो उसे केवल ऐतिहासिक दावों पर निर्भर रहने के बजाय वैज्ञानिक आंकड़ों और भविष्य की जरूरतों को भी मजबूती से सामने रखना होगा।

बारिश की अनिश्चितता ने समस्या को और गंभीर बना दिया है। सामान्य मानसून के दौरान जलाशयों में पर्याप्त पानी पहुंचने से राज्यों के बीच तनाव कुछ कम रहता है। लेकिन मानसून कमजोर होते ही सवाल उठने लगता है कि उपलब्ध सीमित पानी का इस्तेमाल किस तरह किया जाए।

कर्नाटक में बेंगलुरु जैसे शहरों की आबादी और पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी तरफ राज्य के बड़े हिस्से में कृषि सिंचाई के लिए नदियों और जलाशयों पर निर्भरता बनी हुई है। ऐसे में सरकार के लिए घरेलू और कृषि जरूरतों के बीच संतुलन बनाना भी जरूरी है।

130 करोड़ रुपये से अधिक की कानूनी फीस खर्च होने के बावजूद विवादों का लगातार बने रहना इस बात की ओर संकेत करता है कि केवल अदालतों और न्यायाधिकरणों के जरिए समस्या का स्थायी समाधान कठिन है। राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, साझा जल प्रबंधन और वास्तविक समय के जल आंकड़ों की पारदर्शी व्यवस्था भी जरूरी हो सकती है।

जल विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में जल संकट और बढ़ने की स्थिति में अंतर-राज्यीय विवाद और तीखे हो सकते हैं। इसलिए कर्नाटक को अपने जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों के साथ बातचीत और वैज्ञानिक सहयोग को भी प्राथमिकता देनी होगी।

कुल मिलाकर, कावेरी, कृष्णा, तुंगभद्रा और महादायी जैसे विवाद कर्नाटक के सामने मौजूद जल संकट की व्यापक तस्वीर पेश करते हैं। दशकों की कानूनी लड़ाई और करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी राज्य को हर कमजोर मानसून में नए तनाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अब चुनौती केवल अदालत में अपने हिस्से का दावा मजबूत करने की नहीं, बल्कि जल प्रबंधन, वैज्ञानिक आंकड़ों और अंतर-राज्यीय सहयोग की ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जो भविष्य के विवादों को कम कर सके।

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