बेंगलुरु। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता सिद्धारमैया से जुड़े कथित स्टिंग ऑपरेशन के मामले में बेंगलुरु पुलिस ने जांच तेज कर दी है। विवादित वीडियो के स्रोत का पता लगाने और उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित करने वाले लोगों की पहचान करने के लिए सेंट्रल क्राइम ब्रांच (CCB) की साइबर अपराध शाखा ने तकनीकी विश्लेषण शुरू किया है। पुलिस ने यूट्यूब समेत संबंधित डिजिटल प्लेटफॉर्म से वीडियो अपलोड करने वाले अकाउंट की जानकारी, आईपी एड्रेस और अन्य तकनीकी विवरण मांगे हैं। हालांकि, जांच में अभी तक वीडियो तैयार करने वाले मुख्य व्यक्ति या कथित साजिश के संबंध में कोई निर्णायक सफलता सामने नहीं आई है। पुलिस इस मामले में कुछ संदिग्धों से पूछताछ कर चुकी है। वहीं सिद्धारमैया ने वीडियो को अपनी छवि खराब करने की साजिश बताते हुए कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

कथित स्टिंग ऑपरेशन से कर्नाटक की राजनीति में हलचल

कर्नाटक में पिछले कुछ दिनों से पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से जुड़ा कथित स्टिंग ऑपरेशन राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है।

सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो प्रसारित होने के बाद सिद्धारमैया ने आरोप लगाया कि उन्हें बदनाम करने के उद्देश्य से सुनियोजित तरीके से भ्रामक सामग्री फैलाई जा रही है।

उन्होंने बेंगलुरु शहर के पुलिस आयुक्त सीमांत कुमार सिंह को शिकायत देकर मामले की जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की थी।

इसके बाद पुलिस ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए मामले की जांच सेंट्रल क्राइम ब्रांच की साइबर अपराध शाखा को सौंप दी।

पुलिस अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि वीडियो किसने बनाया, सबसे पहले किस डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया गया और इसे फैलाने में किन लोगों की भूमिका रही।

यूट्यूब से मांगा वीडियो अपलोड करने वाले का आईपी एड्रेस

मामले की जांच में सबसे महत्वपूर्ण कदम वीडियो के मूल स्रोत का पता लगाना है।

बेंगलुरु पुलिस ने कथित स्टिंग वीडियो अपलोड करने वाले व्यक्ति की पहचान करने के लिए यूट्यूब से तकनीकी जानकारी मांगी है।

पुलिस संबंधित अकाउंट का आईपी एड्रेस, उपलब्ध उपयोगकर्ता विवरण और वीडियो अपलोड करने से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड हासिल करने का प्रयास कर रही है।

जांच अधिकारियों का मानना है कि इन जानकारियों के आधार पर वीडियो अपलोड करने के लिए इस्तेमाल किए गए इंटरनेट कनेक्शन और संबंधित अकाउंट तक पहुंचा जा सकता है।

हालांकि, आईपी एड्रेस से किसी व्यक्ति की पहचान तुरंत और निश्चित रूप से स्थापित नहीं होती। इसके लिए अन्य डिजिटल साक्ष्यों और संबंधित सेवा प्रदाताओं के रिकॉर्ड का मिलान करना आवश्यक होता है।

6 अक्टूबर की शिकायत पर दर्ज हुआ मामला

जानकारी के अनुसार, सिद्धारमैया की ओर से दी गई शिकायत के आधार पर साइबर अपराध पुलिस ने मामला दर्ज किया है।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कथित स्टिंग वीडियो के जरिए गलत जानकारी प्रसारित करके उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई।

रिपोर्ट के अनुसार, शिकायत 6 अक्टूबर को दर्ज कराई गई थी। इसमें फर्जी पहचान, जालसाजी और कथित वसूली से जुड़े आरोप भी लगाए गए हैं।

पुलिस इस बात की पड़ताल कर रही है कि वीडियो तैयार करने और प्रसारित करने के पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या था।

जांच में यह भी देखा जा रहा है कि वीडियो के साथ साझा किए गए दावे किसी वास्तविक घटना से जुड़े हैं या उनमें छेड़छाड़ अथवा गलत प्रस्तुति की गई है।

पूछताछ के लिए हिरासत में लिए गए संदिग्ध

साइबर पुलिस ने जांच के दौरान सोशल मीडिया पर वीडियो प्रसारित करने वाले कुछ अकाउंट की पहचान की है।

14 अक्टूबर को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने इस मामले में दो व्यक्तियों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था।

इसके बाद जांच के दायरे में अन्य संदिग्ध भी आए। पुलिस ने कुछ व्यक्तियों से उनके सोशल मीडिया अकाउंट और वीडियो साझा करने की परिस्थितियों के संबंध में पूछताछ की।

हालांकि, हिरासत में लेकर पूछताछ करना औपचारिक गिरफ्तारी या अपराध सिद्ध होने के बराबर नहीं है।

फिलहाल वीडियो बनाने वाले व्यक्ति की अंतिम पहचान और कथित साजिश के बारे में पुलिस ने कोई निर्णायक निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किया है।

सिद्धारमैया को कोर्ट से मिली अंतरिम राहत

इस विवाद के बीच सिद्धारमैया ने बेंगलुरु की एक अदालत का दरवाजा भी खटखटाया था।

उन्होंने अदालत से कथित रूप से अपमानजनक वीडियो के प्रसारण और प्रकाशन पर रोक लगाने की मांग की थी।

13 अक्टूबर को बेंगलुरु की सिटी सिविल एंड सेशंस कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी कर संबंधित वीडियो के प्रसारण और प्रसार पर रोक लगा दी।

अदालत ने 42 मीडिया संस्थानों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और अन्य संबंधित पक्षों को विवादित सामग्री प्रकाशित या प्रसारित करने से रोकने का निर्देश दिया।

अदालत ने माना कि इस तरह की सामग्री के प्रसार से याचिकाकर्ता की प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचने की आशंका है।

हालांकि, यह एक अंतरिम न्यायिक आदेश है। इससे कथित वीडियो में किए गए दावों की सत्यता या असत्यता का अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

गृह मंत्री प्रियांक खरगे ने सीबीआई जांच की मांग खारिज की

कथित स्टिंग ऑपरेशन को लेकर कर्नाटक में राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।

राज्य के गृह मंत्री प्रियांक खरगे ने मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने की मांग खारिज कर दी है।

उन्होंने कहा कि कर्नाटक पुलिस ऐसे मामलों की जांच करने में पूरी तरह सक्षम है।

खरगे का कहना है कि सिद्धारमैया के खिलाफ वीडियो प्रसारित किए जाने के पीछे कथित साजिश के आरोपों की जांच राज्य पुलिस कर सकती है।

दूसरी ओर जनता दल सेक्युलर के नेता और केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है।

दोनों पक्ष जांच एजेंसी के चयन और मामले की राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर अलग-अलग रुख अपना रहे हैं।

कुमारस्वामी ने उठाए पुलिस जांच पर सवाल

केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने आरोप लगाया है कि कथित स्टिंग वीडियो की जांच के नाम पर जेडीएस से जुड़े कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है।

उन्होंने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए और आरोपों की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की।

कुमारस्वामी ने मांग की है कि पूरे मामले की जांच उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश की निगरानी में कराई जाए।

हालांकि, मुख्यमंत्री शिवकुमार या किसी अन्य राजनीतिक व्यक्ति की कथित संलिप्तता के संबंध में इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है।

राजनीतिक दलों के बीच चल रही बयानबाजी से अलग पुलिस की जांच का उद्देश्य वीडियो के स्रोत और उससे जुड़े डिजिटल साक्ष्यों की वास्तविकता का पता लगाना है।

जेडीएस कार्यकर्ताओं ने किया विरोध प्रदर्शन

17 अक्टूबर को जनता दल सेक्युलर के कार्यकर्ताओं ने बेंगलुरु में इस मामले को लेकर विरोध प्रदर्शन किया।

केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में कार्यकर्ता पार्टी कार्यालय से पुलिस महानिदेशक के कार्यालय की ओर मार्च करते हुए पहुंचे।

प्रदर्शनकारियों ने कथित स्टिंग ऑपरेशन की निष्पक्ष जांच और विशेष जांच दल के गठन की मांग की।

इस दौरान पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था की थी और कुछ मार्गों पर यातायात प्रभावित हुआ।

जेडीएस ने आरोप लगाया कि जांच राजनीतिक दबाव से मुक्त होनी चाहिए और सभी संबंधित पक्षों की भूमिका की निष्पक्ष पड़ताल की जानी चाहिए।

डिजिटल फॉरेंसिक जांच से सामने आ सकते हैं तथ्य

साइबर अपराध जांच में वीडियो का मूल स्रोत, मेटाडेटा, अपलोड रिकॉर्ड और डिजिटल अकाउंट की गतिविधियां महत्वपूर्ण होती हैं।

पुलिस तकनीकी विश्लेषण के माध्यम से यह पता लगा सकती है कि वीडियो में संपादन किया गया है या नहीं और उसका मूल रिकॉर्ड कहां से आया।

इसके अलावा सोशल मीडिया पर वीडियो साझा करने वाले अकाउंट की गतिविधियों तथा संबंधित व्यक्तियों के बीच संभावित संपर्कों की भी जांच की जा सकती है।

हालांकि, जांच में किसी वीडियो का एडिट होना अपने आप उसे फर्जी साबित नहीं करता। इसी प्रकार बिना संपादन वाला वीडियो भी उसके साथ लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं करता।

इसलिए तकनीकी जांच के साथ अन्य साक्ष्यों का सत्यापन आवश्यक है।

अब तकनीकी जांच के नतीजों पर नजर

कर्नाटक में सिद्धारमैया से जुड़े कथित स्टिंग ऑपरेशन का मामला अब पुलिस जांच, न्यायिक प्रक्रिया और राजनीतिक विवाद का विषय बन गया है।

एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की साजिश का आरोप लगाया है, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दलों ने जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।

बेंगलुरु साइबर पुलिस यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म से जानकारी जुटाकर वीडियो के मूल स्रोत तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।

फिलहाल इस मामले में कोई अंतिम जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है। अब डिजिटल फॉरेंसिक जांच, संबंधित प्लेटफॉर्म से मिलने वाली जानकारी और अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही आगे की कानूनी कार्रवाई तय होगी।

Tags: